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परिचय दास कौन हैं? साहित्य से प्रशासन तक जानिए पूरा सफर

नालंदा/पटना, | हिंदी और भोजपुरी साहित्य के वरिष्ठ साहित्यकार एवं शिक्षाविद् प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव ‘परिचय दास’ नव नालंदा महाविहार, नालंदा में पालि एवं अन्य भाषा संकाय के संकायाध्यक्ष (डीन) हैं । साहित्य, शिक्षा और भारतीय भाषाओं से जुड़े क्षेत्र में उनकी भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही है। वे यहां हिंदी विभाग में प्रोफेसर , राजभाषा […]

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  • August 29, 2026 5:01 pm IST, Published 2 hours ago

नालंदा/पटना, | हिंदी और भोजपुरी साहित्य के वरिष्ठ साहित्यकार एवं शिक्षाविद् प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव ‘परिचय दास’ नव नालंदा महाविहार, नालंदा में पालि एवं अन्य भाषा संकाय के संकायाध्यक्ष (डीन) हैं । साहित्य, शिक्षा और भारतीय भाषाओं से जुड़े क्षेत्र में उनकी भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही है। वे यहां हिंदी विभाग में प्रोफेसर , राजभाषा प्रकोष्ठ के संयोजक , विश्व विद्यालय के सतर्कता अधिकारी हैं । वे हिंदी विभाग के अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी पूर्व में संभाल चुके हैं। विश्वविद्यालय में उन्होंने प्रोवोस्ट ऑफ हॉस्टल्स, मीडिया प्रभारी तथा जनसंपर्क प्रमुख जैसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक दायित्वों का भी निर्वहन किया है।

साहित्य से प्रशासन तक रहा है लंबा अनुभव

‘परिचय दास’ नाम से साहित्य जगत में चर्चित प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव की पहचान केवल एक विश्वविद्यालय शिक्षक के रूप में नहीं है। वह साहित्यकार, कवि, आलोचक, संपादक और संस्कृतिविद के रूप में भी सक्रिय रहे हैं। हिंदी और भोजपुरी के साथ उन्होंने मैथिली तथा भारतीय साहित्यिक परंपराओं का भी गंभीर अध्ययन किया है।
उनके साहित्यिक सरोकारों में भारतीय संस्कृति, लोकजीवन, लोकचेतना, भारतीय ज्ञान परंपरा और समकालीन सामाजिक संवेदना प्रमुख रूप से दिखाई देती है। उनकी रचनात्मकता में अकादमिक दृष्टि के साथ लोकजीवन की सहजता का मेल देखने को मिलता है।

नव नालंदा महाविहार में उनके पूर्व प्रशासनिक अनुभव को देखते हुए डीन के रूप में उनकी नई भूमिका विशेष महत्व रखती है। पालि एवं अन्य भाषा संकाय का दायित्व उन्हें भारतीय भाषाओं और ज्ञान परंपराओं के व्यापक क्षेत्र से सीधे जोड़ता है।
विश्व हिंदी सम्मेलन में कर चुके हैं भारत का प्रतिनिधित्व
प्रो. परिचय दास की साहित्यिक सक्रियता का दायरा राष्ट्रीय स्तर तक सीमित नहीं रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, भारत सरकार की ओर से उन्हें विश्व हिंदी सम्मेलन में भारत के प्रतिनिधि के रूप में फिजी भेजा गया था। यह उनके हिंदी भाषा और साहित्य से जुड़े व्यापक अनुभव को दर्शाता है।

इसके अलावा वह हिंदी अकादमी, दिल्ली सरकार तथा मैथिली-भोजपुरी अकादमी, दिल्ली सरकार में सचिव के रूप में भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभा चुके हैं। इन संस्थागत भूमिकाओं के दौरान साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के आयोजन तथा भाषा-संवर्धन से जुड़े कार्यों में उनकी सक्रिय भागीदारी रही है।

हिंदी और भोजपुरी साहित्य में अलग पहचान
परिचय दास को हिंदी और भोजपुरी साहित्य का महत्वपूर्ण हस्ताक्षर माना जाता है। उनकी रचनाओं में कविता के साथ आलोचना, संस्कृति और लोकसाहित्य के विविध पक्ष दिखाई देते हैं। साहित्य के क्षेत्र में उन्होंने ‘सुगद्य’ नामक नई विधा के आरंभ का भी उल्लेख किया है।

उनकी प्रमुख पुस्तकों में ‘अनुपस्थित दिनांक’, ‘कविता के मद्धिम आँच में’, ‘चारुता’, ‘आकांक्षा से अधिक सत्वर’, ‘धूसर कविता’, ‘संसद भवन की छत पर खड़ा होके’ और ‘एक नया विन्यास’ शामिल हैं। इन रचनाओं के माध्यम से उन्होंने समकालीन जीवन, समाज और मानवीय संवेदना को अपनी विशिष्ट शैली में अभिव्यक्त किया है।

भोजपुरी साहित्य में भी उनका योगदान उल्लेखनीय है। उनकी रचनात्मक सक्रियता ने भोजपुरी को आधुनिक साहित्यिक विमर्श से जोड़ने में भूमिका निभाई है। उनके बारे में प्रकाशित साहित्यिक सामग्री में भोजपुरी कविता, निबंध और आलोचना में नई दृष्टि विकसित करने के प्रयासों का उल्लेख मिलता है।
सिरिजन – (तिमाही भोजपुरी ई-पत्रिका)

नालंदा की ज्ञान परंपरा से गहरा जुड़ाव

प्रो. परिचय दास का कार्यक्षेत्र उस संस्थान से जुड़ा है जिसकी पहचान भारतीय ज्ञान परंपरा और नालंदा की ऐतिहासिक विरासत से है। नव नालंदा महाविहार में उनकी लंबे समय से सक्रिय भूमिका रही है।
वर्षों से वह यहां हिंदी विभाग के शैक्षणिक और साहित्यिक कार्यक्रमों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। विभिन्न कार्यक्रमों में उन्होंने भारतीय साहित्य, बौद्ध परंपरा, संस्कृति और ज्ञान-विमर्श से जुड़े विषयों पर विचार रखे हैं।

नालंदा की ज्ञान परंपरा को लेकर उनका जुड़ाव केवल संस्थागत नहीं, बल्कि वैचारिक भी रहा है। उनके लेखन में नालंदा को भारतीय ज्ञान, संस्कृति और बौद्धिक परंपरा के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में देखने की दृष्टि दिखाई देती है।

साहित्य, संस्कृति और लोकचेतना पर रहा विशेष काम

प्रो. श्रीवास्तव का अध्ययन क्षेत्र काफी व्यापक है। साहित्य के साथ उन्होंने संस्कृति, लोकसाहित्य, इतिहास, कला, पत्रकारिता और सामाजिक सरोकारों से जुड़े विषयों पर भी काम किया है।
उनकी साहित्यिक पहचान का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि वह अकादमिक गंभीरता को लोकसंवेदना से जोड़ने का प्रयास करते हैं। इसी कारण उनके लेखन में भारतीय समाज की विविधता, लोक परंपराओं और बदलते समय के प्रश्नों को महत्वपूर्ण स्थान मिलता है।
उनकी रचनात्मक यात्रा में भोजपुरी और हिंदी दोनों भाषाओं का समान महत्व दिखाई देता है। वह क्षेत्रीय भाषा और लोकसंस्कृति को साहित्य की मुख्यधारा से जोड़ने वाले रचनाकारों में अपनी जगह बनाते हैं।

कई साहित्यिक सम्मानों से हो चुके हैं सम्मानित

साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में योगदान के लिए प्रो. परिचय दास को विभिन्न सम्मान भी प्राप्त हुए हैं। इनमें श्याम नारायण पाण्डेय सम्मान, द्विभागीश अनुवाद सम्मान, भागीरथी सम्मान और ‘माटी के लाल’ सम्मान प्रमुख रूप से उल्लेखित हैं।

उनके साहित्यिक योगदान को लेकर विभिन्न संस्थाओं और मंचों पर उन्हें सम्मानित किया जाता रहा है। हाल के वर्षों में भी उन्हें साहित्य एवं कला के क्षेत्र में सम्मान मिलने की जानकारी सामने आई है।

डीन की नई जिम्मेदारी से बढ़ी अपेक्षाएं

पालि एवं अन्य भाषा संकाय के डीन के रूप में प्रो. रवींद्र नाथ श्रीवास्तव की नियुक्ति ऐसे समय में हुई है, जब भारतीय भाषाओं, साहित्य और पारंपरिक ज्ञान प्रणालियों के अध्ययन को लेकर नए विमर्श सामने आ रहे हैं।
उनका हिंदी, भोजपुरी और भारतीय साहित्य का लंबा अनुभव इस नई जिम्मेदारी में उपयोगी साबित हो सकता है। विशेष रूप से भारतीय भाषाओं के बीच संवाद, साहित्यिक अध्ययन और सांस्कृतिक परंपराओं के अकादमिक विस्तार के क्षेत्र में उनसे महत्वपूर्ण भूमिका की अपेक्षा की जा सकती है।
इस नियुक्ति के साथ प्रो. परिचय दास के अकादमिक जीवन में एक और महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ गया है। हिंदी विभाग के प्रोफेसर और पूर्व विभागाध्यक्ष से अब पालि एवं अन्य भाषा संकाय के डीन की जिम्मेदारी तक पहुंचना उनके लंबे शैक्षणिक और साहित्यिक सफर की महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।

हिंदी और भोजपुरी साहित्य में बनाई अलग पहचान

परिचय दास को हिंदी और भोजपुरी के प्रतिष्ठित साहित्यकार के रूप में देखा जाता है। उनकी पहचान साहित्यकार के साथ-साथ संस्कृतिविद, आलोचक और संपादक के रूप में भी रही है। साहित्य और संस्कृति के बीच संबंधों को समझने तथा लोकजीवन को रचनात्मक अभिव्यक्ति देने की दिशा में उनका योगदान उल्लेखनीय माना गया है।

हिंदी, भोजपुरी और मैथिली सहित भारतीय साहित्यिक परंपराओं पर उनके अध्ययन ने उन्हें व्यापक बौद्धिक पहचान दिलाई। विशेष रूप से भोजपुरी भाषा और लोक-संस्कृति के क्षेत्र में उनकी सक्रियता उन्हें बहुआयामी रचनाकार के रूप में स्थापित करती है।

उनका साहित्य केवल अभिजात अकादमिक विमर्श तक सीमित नहीं दिखाई देता, बल्कि उसमें लोकसंवेदना और समाज के विभिन्न वर्गों से जुड़े अनुभवों को भी स्थान मिलता है। यही कारण है कि उनके साहित्यिक व्यक्तित्व में अकादमिक गंभीरता और लोकचेतना दोनों का समन्वय दिखाई देता है।

विश्व हिंदी सम्मेलन में भारत का किया प्रतिनिधित्व

प्रो. श्रीवास्तव की साहित्यिक और भाषाई सक्रियता का एक महत्वपूर्ण पक्ष अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी का प्रतिनिधित्व भी रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, भारत सरकार की ओर से उन्हें विश्व हिंदी सम्मेलन में प्रतिनिधित्व के लिए फिजी भेजा गया था।

विश्व हिंदी सम्मेलन जैसे अंतरराष्ट्रीय मंच पर प्रतिनिधित्व मिलना हिंदी भाषा और साहित्य के क्षेत्र में उनकी भूमिका को रेखांकित करता है। यह उनके साहित्यिक एवं भाषाई अनुभव की व्यापकता को भी दर्शाता है।

इसके अलावा वह हिंदी अकादमी, दिल्ली सरकार तथा मैथिली-भोजपुरी अकादमी, दिल्ली सरकार के सचिव के रूप में भी कार्य कर चुके हैं। इन जिम्मेदारियों के माध्यम से उन्हें भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़े संस्थागत कार्यों को करीब से देखने और संचालित करने का अवसर मिला।

साहित्यिक रचनाओं में दिखती है अलग प्रयोगधर्मिता

परिचय दास की प्रकाशित रचनाओं में कई कविता-संग्रह और साहित्यिक कृतियां शामिल हैं। उपलब्ध विवरण में उनकी प्रमुख पुस्तकों में ‘अनुपस्थित दिनांक’, ‘कविता के मद्धिम आंच में’, ‘चारुता’, ‘आकांक्षा से अधिक सत्वर’, ‘धूसर कविता’, ‘संसद भवन की छत पर खड़ा होके’ और ‘एक नया विन्यास’ का उल्लेख मिलता है।

इन रचनाओं के शीर्षक ही उनकी साहित्यिक प्रयोगधर्मिता की ओर संकेत करते हैं। उनकी कविताओं में समकालीन जीवन, मनुष्य की संवेदना, सामाजिक परिस्थितियों और बदलते समय को देखने की कोशिश दिखाई देती है।

भोजपुरी में भी उनके कई कविता-संग्रह प्रकाशित हुए हैं। उपलब्ध परिचय में ‘एक नया विन्यास’ (2004), ‘पृथ्वी से रस लेके’ (2006), ‘चारुता’ (2006), ‘युगपत समीकरण में’ (2007) और ‘संसद भवन की छत पर खड़ा हो के’ (2007) प्रमुख रूप से दर्ज हैं।

भोजपुरी में रचनात्मक लेखन के जरिए उन्होंने भाषा की साहित्यिक क्षमता को सामने लाने का प्रयास किया। भोजपुरी लोकभाषा के साथ साहित्यिक प्रयोग और आधुनिक संवेदनाओं का मेल उनके रचनात्मक व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पक्ष माना जा सकता है।

सुगद्य’ नामक नई विधा की शुरुआत 

उनके साहित्यिक योगदान का एक दिलचस्प पहलू ‘सुगद्य’ नामक नई विधा की शुरुआत से जुड़ा है। उपलब्ध सामग्री में उल्लेख है कि साहित्य में उन्होंने इस नई विधा की शुरुआत की।

साहित्य में नई विधा का प्रयोग किसी भी रचनाकार की प्रयोगधर्मिता को दर्शाता है। परिचय दास का रचनात्मक संसार इसी प्रयोगशीलता के कारण अलग पहचान बनाता है। कविता, आलोचना, संस्कृति और लोकसाहित्य के बीच उनकी सक्रियता उनके साहित्यिक व्यक्तित्व को बहुआयामी बनाती है।

आलोचना और संपादन में भी रहा योगदान

परिचय दास का काम केवल कविता लेखन तक सीमित नहीं रहा। उन्होंने आलोचना और संपादन के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण कार्य किया। उपलब्ध विवरण के अनुसार उन्होंने ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित साहित्यकार डॉ. सीताकांत महापात्र की सर्जनात्मकता पर केंद्रित ‘मनुष्यता की भाषा का मर्म’ नामक आलोचना पुस्तक का संपादन वर्ष 2000 में किया।

इसके अतिरिक्त उन्होंने भारत के उत्तर प्रदेश और बिहार सहित नेपाल में फैली थारू जनजाति के बीच सक्रिय रहकर उनके सांस्कृतिक जीवन का अध्ययन किया और ‘थारू जनजाति की सांस्कृतिक परंपरा’ विषय पर पुस्तक लेखन किया।

यह काम उनके साहित्यिक सरोकारों के विस्तार को दिखाता है। साहित्य के साथ आदिवासी संस्कृति, लोकसाहित्य, इतिहास और सामाजिक जीवन को समझने की उनकी रुचि उनके व्यक्तित्व को केवल कवि या शिक्षक की पहचान से आगे ले जाती है।

साहित्य से लेकर संस्कृति और समाज तक व्यापक सरोकार

उपलब्ध परिचय में उनके रचनात्मक कार्यक्षेत्र में साहित्य, संस्कृति, फिल्म, कला, इतिहास, लोकसाहित्य, पत्रकारिता, समाजशास्त्र, शिक्षा और नाटक जैसे अनेक क्षेत्र शामिल बताए गए हैं।

इन विविध क्षेत्रों में सक्रियता यह बताती है कि उनका साहित्यिक दृष्टिकोण किसी एक विधा तक सीमित नहीं रहा। भारतीय समाज और संस्कृति को अलग-अलग माध्यमों से समझने तथा अभिव्यक्त करने की कोशिश उनके कार्यों में दिखाई देती है।

भोजपुरी लोकगायक, चित्रकार, नाट्यकर्मी और संस्कृति-चिंतक के रूप में भी उनका परिचय दर्ज है। इस तरह उनके व्यक्तित्व में साहित्य और प्रदर्शनकारी कलाओं के कई रूप एक साथ दिखाई देते हैं।

सम्मान और पुरस्कारों से भी मिली पहचान

साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में योगदान के लिए प्रो. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव ‘परिचय दास’ को कई सम्मान प्राप्त होने का उल्लेख मिलता है। इनमें श्याम नारायण पाण्डेय सम्मान, द्विभागीश अनुवाद सम्मान, भगीरथ सम्मान और ‘माटी के लाल’ सम्मान प्रमुख हैं।

इसके अतिरिक्त उपलब्ध परिचय में यह भी उल्लेख है कि उन्हें 1996 में भारतीय दलित साहित्य अकादमी की ओर से साहित्य-संस्कृति के क्षेत्र में सम्मानित किया गया था।

सम्मानों की यह श्रृंखला उनके लंबे साहित्यिक और सांस्कृतिक योगदान की ओर संकेत करती है। हालांकि किसी भी रचनाकार की वास्तविक पहचान उसके पुरस्कारों से अधिक उसकी रचनाओं और विचारों से बनती है, लेकिन साहित्यिक सम्मान उनके कार्यों को व्यापक मंच पर पहचान दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

पूर्वांचल की मिट्टी से निकला बहुआयामी साहित्यिक व्यक्तित्व

उपलब्ध परिचय के अनुसार, प्रो. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव ‘परिचय दास’ का जन्म ग्राम रामपुर काँधी देवलास, तहसील मुहम्मदाबाद गोहना, जनपद मऊ में हुआ। ग्रामीण परिवेश से निकलकर हिंदी और भोजपुरी साहित्य के व्यापक क्षेत्र में अपनी पहचान बनाना उनके जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिना जा सकता है।

उन्होंने हिंदी में प्रथम श्रेणी से एमए करने के बाद गोरखपुर विश्वविद्यालय से यूजीसी फेलो के रूप में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। अकादमिक शिक्षा और साहित्यिक रचनाशीलता का यह मेल उनके पूरे व्यक्तित्व में दिखाई देता है।

क्यों खास है परिचय दास का साहित्यिक सफर?

प्रो. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव ‘परिचय दास’ की खासियत यह है कि उनकी पहचान किसी एक क्षेत्र से तय नहीं होती। वह शिक्षक हैं तो साहित्यकार भी, आलोचक हैं तो संस्कृतिविद भी, कवि हैं तो लोकसंस्कृति के अध्येता भी।

एक ओर उन्होंने विश्वविद्यालय और संस्थान में अकादमिक एवं प्रशासनिक जिम्मेदारियां निभाईं, वहीं दूसरी ओर हिंदी और भोजपुरी में साहित्य सृजन किया। लोकजीवन और संस्कृति के अध्ययन से लेकर अंतरराष्ट्रीय हिंदी मंच तक उनकी सक्रियता उनके व्यापक अनुभव का परिचय देती है।

उनका साहित्यिक सफर इस बात का उदाहरण है कि क्षेत्रीय भाषा, लोकसंस्कृति और आधुनिक अकादमिक चिंतन एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे को समृद्ध करने वाले क्षेत्र हो सकते हैं। हिंदी और भोजपुरी दोनों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उन्हें समकालीन भारतीय साहित्य के बहुआयामी रचनाकारों की पंक्ति में विशिष्ट स्थान देती है।

परिचय दास के रूप में प्रसिद्ध प्रो. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव का व्यक्तित्व साहित्य, शिक्षा, संस्कृति और लोकचेतना के कई आयामों को समेटे हुए है। नव नालंदा महाविहार में अकादमिक जिम्मेदारियों से लेकर हिंदी और भोजपुरी साहित्य में रचनात्मक हस्तक्षेप, विश्व हिंदी सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व और विभिन्न साहित्यिक-सांस्कृतिक सम्मानों तक उनका सफर काफी व्यापक रहा है।

उनकी रचनाएं और साहित्यिक प्रयोग यह बताते हैं कि उन्होंने भाषा को केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं माना, बल्कि उसे समाज, संस्कृति और लोकजीवन से जोड़कर देखने का प्रयास किया। यही बहुआयामी दृष्टि प्रो. रवीन्द्रनाथ श्रीवास्तव ‘परिचय दास’ को एक विशिष्ट साहित्यिक और सांस्कृतिक व्यक्तित्व के रूप में सामने लाती है।

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