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कानून ढाल है, तलवार नहीं, हाईकोर्ट ने बेटे पर पांच लाख जुर्माना लगाया

मुंबई: संपत्ति विवाद से जुड़े एक मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने बुजुर्ग पिता के अधिकारों की रक्षा करते हुए बेटे की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने मामले में बेटे की ओर से कानूनी प्रावधान के कथित दुरुपयोग पर कड़ी नाराजगी जताई और उस पर पांच लाख रुपये का हर्जाना लगाया। अदालत ने निर्देश […]

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  • August 29, 2026 1:45 pm IST, Published 57 minutes ago

मुंबई: संपत्ति विवाद से जुड़े एक मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने बुजुर्ग पिता के अधिकारों की रक्षा करते हुए बेटे की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने मामले में बेटे की ओर से कानूनी प्रावधान के कथित दुरुपयोग पर कड़ी नाराजगी जताई और उस पर पांच लाख रुपये का हर्जाना लगाया। अदालत ने निर्देश दिया कि जुर्माने की पूरी राशि 78 वर्षीय पिता को दी जाए। इसके साथ ही बेटे को पिता के फ्लैट से बाहर करने का आदेश भी बरकरार रखा गया।

मामला 78 वर्षीय सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी और उनके 54 वर्षीय बेटे जितेंद्र मेघ के बीच संपत्ति विवाद से जुड़ा था। विवाद मुंबई स्थित फ्लैट को लेकर लंबे समय से चल रहा था। बेटे की ओर से पिता की मानसिक स्थिति को लेकर सवाल उठाए गए और अदालत से उनकी मानसिक स्थिति की जांच कराने की मांग की गई। इसके लिए बेटे ने मेंटल हेल्थकेयर एक्ट, 2017 की धारा 105 का हवाला दिया था।

याचिका के समर्थन में जुलाई 2024 के एक मेडिकल प्रमाणपत्र का भी उल्लेख किया गया। इस दस्तावेज में पिता को डायबिटीज और इंसुलिन से जुड़ी कुछ ऐसी अस्थायी परेशानियों का जिक्र था, जिनमें कभी-कभी भूलने, पसीना आने या भ्रम जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती थी। बेटे ने इन्हीं परिस्थितियों को आधार बनाकर पिता की मानसिक क्षमता पर सवाल उठाने की कोशिश की।

हालांकि, मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों को अलग नजरिए से देखा। हाई कोर्ट ने माना कि पिता को होने वाली समस्याएं शारीरिक और अस्थायी प्रकृति की थीं। अदालत के अनुसार, इन लक्षणों को अपने आप में मानसिक बीमारी या मानसिक अक्षमता के प्रमाण के तौर पर नहीं देखा जा सकता। अदालत ने इसी आधार पर बेटे की याचिका को स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

यह मामला बॉम्बे हाई कोर्ट की जस्टिस नितिन जामदार और जस्टिस मिलिंद जाधव की खंडपीठ के सामने आया। पीठ ने पूर्व में दिए गए सिंगल जज के फैसले को बरकरार रखते हुए बेटे की याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कानूनी प्रावधानों के उद्देश्य और उनके इस्तेमाल को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

अदालत ने स्पष्ट किया कि मेंटल हेल्थकेयर एक्ट का मूल उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं वाले लोगों के अधिकारों की रक्षा करना है। इस कानून का इस्तेमाल किसी व्यक्ति को दबाव में लाने या निजी विवाद में दूसरे पक्ष के खिलाफ हथियार के रूप में करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। अदालत की टिप्पणी का सार यही था कि कानून सुरक्षा देने वाली ढाल है, उसे किसी के खिलाफ तलवार की तरह इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

हाई कोर्ट ने बेटे पर पांच लाख रुपये का जुर्माना लगाए जाने के फैसले को भी बरकरार रखा। अदालत ने निर्देश दिया कि यह राशि सीधे बुजुर्ग पिता को दी जाए। अदालत का मानना था कि कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से बुजुर्ग व्यक्ति को परेशान करने की कोशिश गंभीर विषय है और ऐसे मामलों में अदालत को उचित संदेश देना जरूरी है। अदालत ने यह भी सुनिश्चित किया कि बेटे को पिता के फ्लैट से बेदखल किया जाए। संपत्ति को लेकर चल रहे विवाद के बीच पिता के अधिकारों को प्राथमिकता देते हुए यह आदेश दिया गया। मामले में अदालत का रुख इस बात की ओर भी संकेत करता है कि बुजुर्गों को उनकी संपत्ति और सम्मान से वंचित करने के लिए कानूनी प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल स्वीकार नहीं किया जाएगा।

यह फैसला बुजुर्गों के संपत्ति अधिकारों और कानूनी सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। पारिवारिक संपत्ति विवाद कई बार लंबे समय तक चलते हैं और ऐसे मामलों में व्यक्तिगत रिश्तों के साथ कानूनी अधिकार भी प्रभावित होते हैं। अदालत ने अपने आदेश के जरिए यह स्पष्ट किया कि किसी कानून की तकनीकी धाराओं का इस्तेमाल केवल निजी लाभ हासिल करने के लिए नहीं किया जा सकता।

इस मामले में पांच लाख रुपये का हर्जाना और फ्लैट से बेदखली का आदेश बेटे के लिए बड़ा झटका है। वहीं, बुजुर्ग पिता के लिए यह फैसला उनके संपत्ति अधिकारों और सम्मान की कानूनी सुरक्षा को मजबूत करता है। अदालत की सख्त टिप्पणी से यह संदेश भी जाता है कि न्यायिक प्रक्रिया का इस्तेमाल किसी बुजुर्ग व्यक्ति को दबाव में लाने या परेशान करने के लिए नहीं किया जा सकता।

 

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