यह फैसला न्यायमूर्ति मंजूरानी चौहान ने अनिल कुमार की याचिका पर सुनाया। मामले के अनुसार, याची की वर्ष 2015 में सहायक अध्यापक गणित के पद पर नियुक्ति हुई थी। नियुक्ति प्रक्रिया के दौरान उसके शैक्षिक प्रमाणपत्रों का सत्यापन कराया गया था। इसके बाद 24 सितंबर 2015 को उसने पदभार ग्रहण किया। करीब एक वर्ष बाद उसकी सेवा भी स्थायी कर दी गई थी।
मामला उस समय विवादों में आया जब 2018 में अनिल कुमार के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई गई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि उन्होंने फर्जी शैक्षिक प्रमाणपत्रों के आधार पर शिक्षक पद हासिल किया है। शिकायत के बाद विभाग ने उनका वेतन रोक दिया और उनके प्रमाणपत्रों की जांच शुरू की।
जांच के दौरान उनके हाईस्कूल, इंटरमीडिएट और बीएससी के प्रमाणपत्र सही पाए गए। हालांकि, वर्ष 2011-12 में जारी बीएड की मार्कशीट के सत्यापन की रिपोर्ट उस समय लंबित थी। इसके बावजूद जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने 20 अप्रैल 2019 को उनकी सेवाएं समाप्त करने का आदेश जारी कर दिया।
हाई कोर्ट में याची की ओर से दलील दी गई कि वर्ष 2015 की नियुक्ति एक अलग चयन प्रक्रिया के माध्यम से हुई थी। इस नियुक्ति के समय उनके द्वारा प्रस्तुत शैक्षिक प्रमाणपत्रों का विभागीय स्तर पर सत्यापन कराया गया था और उनमें हाईस्कूल, इंटरमीडिएट तथा बीएससी के प्रमाणपत्र सही पाए गए थे।
याची ने यह भी बताया कि वर्ष 2004 में उसकी एक अन्य नियुक्ति हुई थी। बाद में उस नियुक्ति को बीएड प्रमाणपत्र के फर्जी पाए जाने के आधार पर रद्द कर दिया गया था। हालांकि, उसका कहना था कि पुरानी नियुक्ति और वर्ष 2015 की नियुक्ति अलग-अलग चयन प्रक्रियाओं का हिस्सा थीं और बाद वाली नियुक्ति में इस्तेमाल किए गए प्रमाणपत्रों को सत्यापन के लिए प्रस्तुत किया गया था।
राज्य सरकार की ओर से कोर्ट में इसका विरोध किया गया। सरकार ने तर्क दिया कि याची ने वर्ष 2015 में नियुक्ति प्राप्त करते समय अपनी पिछली नियुक्ति रद्द होने से संबंधित महत्वपूर्ण तथ्य विभाग से छिपाए थे। सरकार के अनुसार, इसी आधार पर उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा अध्यापक सेवा नियमावली, 1981 के नियम 11 के तहत उनकी नियुक्ति समाप्त की गई।
कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद नियम 11 के प्रावधान की व्याख्या की। न्यायालय ने कहा कि इस नियम के तहत अयोग्यता उस स्थिति में लागू होती है, जब संबंधित व्यक्ति को राज्य सरकार की सेवा से बर्खास्त किया गया हो। अदालत के मुताबिक, अनिल कुमार की पिछली नियुक्ति रद्द जरूर हुई थी, लेकिन उन्हें किसी विभागीय अनुशासनात्मक कार्रवाई के बाद सेवा से बर्खास्त या पदच्युत नहीं किया गया था।
अदालत ने इसी आधार पर पिछली नियुक्ति रद्द होने और सेवा से बर्खास्त किए जाने के बीच अंतर स्पष्ट किया। कोर्ट ने माना कि पुरानी नियुक्ति के निरस्तीकरण को स्वतः बर्खास्तगी के बराबर नहीं माना जा सकता। साथ ही, यदि वर्तमान नियुक्ति के लिए प्रस्तुत प्रमाणपत्र वास्तविक और वैध थे, तो केवल पिछली नियुक्ति के निरस्तीकरण की जानकारी नहीं दिए जाने को वर्तमान नियुक्ति समाप्त करने का पर्याप्त आधार नहीं माना जा सकता।
इस निष्कर्ष के साथ हाई कोर्ट ने अनिल कुमार की सेवा समाप्ति का आदेश रद्द कर दिया। फैसले से यह स्पष्ट हुआ कि किसी कर्मचारी की अलग और पुरानी नियुक्ति से जुड़े विवाद को बाद की नियुक्ति पर लागू करने से पहले संबंधित नियमों और नियुक्ति की परिस्थितियों की अलग से जांच जरूरी है।