IIT बॉम्बे में 7 महीने में 3 मौतें, छात्रों का विरोध तेज

मुंबई : देश के प्रमुख तकनीकी शिक्षण संस्थानों में शामिल भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) बॉम्बे में छात्र सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और संस्थागत जवाबदेही को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल उठे हैं। पिछले कुछ महीनों में कैंपस में छात्रों की मौत की घटनाओं के बाद शनिवार को बड़ी संख्या में छात्र विरोध-प्रदर्शन के लिए सामने […]

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  • September 19, 2026 2:42 pm IST, Published 1 hour ago

मुंबई : देश के प्रमुख तकनीकी शिक्षण संस्थानों में शामिल भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) बॉम्बे में छात्र सुरक्षा, मानसिक स्वास्थ्य और संस्थागत जवाबदेही को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल उठे हैं। पिछले कुछ महीनों में कैंपस में छात्रों की मौत की घटनाओं के बाद शनिवार को बड़ी संख्या में छात्र विरोध-प्रदर्शन के लिए सामने आए। प्रदर्शनकारी छात्रों ने संस्थान के प्रशासन से पारदर्शिता, जवाबदेही और घटनाओं की निष्पक्ष जांच की मांग की है।

मामला उस समय और गंभीर हो गया जब द्वितीय वर्ष के छात्र साहिल वाकोड़़े की मौत की खबर सामने आई। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, परीक्षा के दौरान मोबाइल फोन से कथित तौर पर उत्तर खोजने और उसे ChatGPT पर अपलोड करने के आरोप में छात्र को पकड़ा गया था। इसके बाद छात्र की मौत हो गई। इस घटना को लेकर छात्रों के बीच कई सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, घटना के कारणों और परिस्थितियों को लेकर पुलिस जांच तथा संस्थान की ओर से सामने रखी गई जानकारी को ही अंतिम आधार माना जाना चाहिए।

परीक्षा के दौरान मोबाइल इस्तेमाल का आरोप

पुलिस और संस्थान से मिली जानकारी के अनुसार, साहिल वाकोड़़े को परीक्षा के दौरान मोबाइल फोन का इस्तेमाल करते हुए पकड़ा गया था। आरोप है कि उसने अपने प्रश्नपत्र की तस्वीर खींचकर उत्तर पाने के लिए उसे ChatGPT पर अपलोड किया था।

यह मामला सामने आने के बाद छात्र को लेकर संस्थान स्तर पर बातचीत और काउंसलिंग की प्रक्रिया होने की बात कही गई। संस्थान की ओर से उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, छात्र के खिलाफ तत्काल कोई औपचारिक अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू नहीं की गई थी। विभागाध्यक्ष और संबंधित प्रोफेसर ने छात्र से बातचीत की थी तथा उसे यह भरोसा दिया गया था कि घटना का उसके करियर पर प्रतिकूल असर नहीं पड़ने दिया जाएगा।

इसके बाद छात्र हॉस्टल लौट गया। बाद में उसके कमरे से उसका शव बरामद किया गया। घटना की जानकारी सामने आने के बाद कैंपस में चिंता और आक्रोश का माहौल बन गया।

इस पूरे मामले में यह महत्वपूर्ण है कि परीक्षा में कथित अनुचित साधन के आरोप और छात्र की मौत को सीधे तौर पर एक-दूसरे का कारण मानने से बचा जाए। किसी भी निष्कर्ष के लिए जांच में सामने आने वाले तथ्यों, परिस्थितियों और संबंधित पक्षों के बयानों को देखना जरूरी होगा।

सात महीनों में तीन मौतों से बढ़ी चिंता

साहिल वाकोड़़े की मौत के बाद छात्रों ने कैंपस में मानसिक स्वास्थ्य, सुरक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को लेकर व्यापक चर्चा शुरू कर दी है। प्रदर्शनकारी छात्रों का कहना है कि यह घटना अलग-थलग मामला नहीं है।

उपलब्ध विवरण के अनुसार, पिछले सात महीनों के दौरान IIT बॉम्बे के पवई कैंपस में छात्र की मौत का यह तीसरा मामला बताया जा रहा है। इससे पहले फरवरी 2026 में एक छात्र की आत्महत्या की घटना सामने आई थी। इसके बाद जुलाई 2026 में 20 वर्षीय एक अन्य छात्र की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत की जानकारी सामने आई।

अब सितंबर में साहिल वाकोड़़े की मौत ने छात्रों की चिंता को और बढ़ा दिया है। लगातार सामने आ रही घटनाओं के कारण छात्र यह सवाल उठा रहे हैं कि संस्थान में विद्यार्थियों की मानसिक और भावनात्मक सुरक्षा के लिए मौजूद व्यवस्थाएं कितनी प्रभावी हैं और किसी संकट की स्थिति में छात्रों तक सहायता कितनी जल्दी पहुंचती है।

हालांकि, अलग-अलग घटनाओं की परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। इसलिए तीनों मामलों को एक ही कारण या एक जैसी परिस्थितियों से जोड़कर देखना जांच पूरी होने से पहले उचित नहीं होगा।

सड़कों पर उतरे छात्र, पारदर्शिता की मांग

घटना के बाद 400 से अधिक छात्रों के विरोध-प्रदर्शन में शामिल होने की जानकारी सामने आई है। प्रदर्शनकारी छात्रों ने प्रशासन से घटनाओं पर स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक करने और जवाबदेही तय करने की मांग की।

प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने कहा कि वे संस्थान से पारदर्शिता चाहते हैं और यह जानना चाहते हैं कि पिछले कुछ महीनों में हुई घटनाओं के बाद प्रशासन ने क्या कदम उठाए हैं। कुछ छात्रों ने यह भी मांग की कि भविष्य में ऐसी परिस्थितियों को रोकने के लिए स्पष्ट और प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए।

एक छात्र के हवाले से सामने आई जानकारी के मुताबिक, प्रदर्शनकारी यह जानना चाहते हैं कि ऐसी घटनाएं क्यों हो रही हैं और इनके पीछे परिस्थितियां क्या हैं। छात्रों ने प्रशासन से यह भी मांग की है कि मामलों की जांच निष्पक्ष तरीके से हो और रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।

छात्रों ने डायरेक्टर और डीन से मांगी लिखित रिपोर्ट

प्रदर्शनकारी छात्रों की प्रमुख मांगों में संस्थान के डायरेक्टर और डीन की ओर से लिखित रिपोर्ट जारी करना भी शामिल है। छात्र चाहते हैं कि पिछले मामलों की परिस्थितियों, संस्थान द्वारा उठाए गए कदमों और भविष्य के लिए बनाई जाने वाली व्यवस्था के बारे में स्पष्ट जानकारी दी जाए।

छात्रों का कहना है कि केवल घटना के बाद काउंसलिंग या बातचीत पर्याप्त नहीं है। उनका जोर ऐसी व्यवस्था विकसित करने पर है जिसमें तनाव, शैक्षणिक दबाव या किसी अन्य परेशानी से जूझ रहे विद्यार्थियों को समय रहते सहायता मिल सके।

इसके साथ ही छात्र प्रशासनिक प्रक्रियाओं को अधिक पारदर्शी बनाने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि किसी छात्र पर अनुशासनात्मक या शैक्षणिक कार्रवाई की स्थिति में प्रक्रिया स्पष्ट होनी चाहिए और विद्यार्थी को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए।

निलंबन के आरोपों पर भी उठे सवाल

प्रदर्शनकारी छात्रों की ओर से यह आरोप भी लगाया गया कि साहिल वाकोड़़े को एक वर्ष के निलंबन की धमकी दी गई थी और हॉस्टल खाली करने के लिए कहा गया था। छात्रों का दावा है कि इस तरह की कार्रवाई की आशंका से उसका पाठ्यक्रम चार वर्ष के बजाय लंबा खिंच सकता था और इससे उस पर मानसिक दबाव बढ़ा।

हालांकि, ये प्रदर्शनकारी छात्रों द्वारा लगाए गए आरोप हैं। दूसरी ओर, संस्थान की ओर से सामने आई जानकारी में कहा गया है कि छात्र के खिलाफ कोई औपचारिक अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू नहीं की गई थी। संस्थान के अनुसार, विभागाध्यक्ष और संबंधित प्रोफेसर ने छात्र से बातचीत की थी और काउंसलिंग की गई थी।

यही विरोधाभासी दावे इस मामले में जांच और स्पष्ट तथ्यों की आवश्यकता को और महत्वपूर्ण बनाते हैं। किसी भी आरोप या दावे को अंतिम तथ्य मानने से पहले संबंधित दस्तावेजों और जांच के निष्कर्षों को सामने आना जरूरी होगा।

ChatGPT के इस्तेमाल से जुड़ा नया सवाल

इस मामले में एक अलग पहलू परीक्षा के दौरान आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस टूल के कथित इस्तेमाल का भी है। ChatGPT और अन्य AI आधारित प्लेटफॉर्म अब विद्यार्थियों के बीच तेजी से इस्तेमाल किए जा रहे हैं। ऐसे में शिक्षण संस्थानों के सामने यह चुनौती है कि AI के वैध शैक्षणिक उपयोग और परीक्षा में अनुचित इस्तेमाल के बीच स्पष्ट सीमा तय की जाए।

परीक्षा के दौरान मोबाइल फोन या किसी बाहरी डिजिटल साधन का इस्तेमाल संस्थान के निर्धारित नियमों के अधीन होता है। यदि किसी छात्र पर परीक्षा में अनुचित साधन अपनाने का आरोप लगता है, तो संस्थान के पास उसके लिए निर्धारित प्रक्रिया होनी चाहिए।

लेकिन अनुशासनात्मक प्रक्रिया के साथ छात्र के मानसिक स्वास्थ्य और गरिमा को भी ध्यान में रखना महत्वपूर्ण है। किसी भी कार्रवाई के दौरान विद्यार्थी को प्रक्रिया, आरोप और संभावित परिणामों की स्पष्ट जानकारी मिलना जरूरी है। साथ ही, गंभीर तनाव की स्थिति में तत्काल सहायता उपलब्ध कराना भी संस्थागत जिम्मेदारी का हिस्सा हो सकता है।

मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बढ़ी बहस

IIT जैसे उच्च प्रतिस्पर्धी संस्थानों में पढ़ाई, परीक्षा, भविष्य के करियर और व्यक्तिगत अपेक्षाओं से जुड़ा दबाव विद्यार्थियों के अनुभव का हिस्सा हो सकता है। ऐसे माहौल में मानसिक स्वास्थ्य सहायता को केवल संकट के समय की व्यवस्था के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

कैंपस में नियमित काउंसलिंग, प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिकों तक आसान पहुंच, गोपनीय सहायता व्यवस्था और छात्रों के लिए भरोसेमंद शिकायत तंत्र जैसे उपाय महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

साथ ही, छात्रों को भी यह समझना जरूरी है कि किसी परीक्षा, ग्रेड, अनुशासनात्मक कार्रवाई या करियर संबंधी समस्या का समाधान बातचीत और संस्थागत सहायता के जरिए खोजा जा सकता है। किसी विद्यार्थी को गंभीर तनाव महसूस हो तो उसे अकेले इससे जूझने के बजाय परिवार, मित्र, शिक्षक, काउंसलर या उपलब्ध हेल्पलाइन से संपर्क करना चाहिए।

पुलिस ने शुरू की मामले की जांच

साहिल वाकोड़़े की मौत के मामले में स्थानीय पुलिस की ओर से जांच शुरू किए जाने की जानकारी सामने आई है। हॉस्टल के कमरे से साक्ष्य जुटाए जाने की बात भी कही गई है।

जांच के दौरान पुलिस के सामने घटना से जुड़े कई पहलुओं को स्पष्ट करना होगा। इनमें छात्र की अंतिम गतिविधियां, उसके साथ हुई बातचीत, परीक्षा से संबंधित घटनाक्रम, संस्थान की ओर से की गई कार्रवाई और उसके बाद की परिस्थितियां शामिल हो सकती हैं।

जांच पूरी होने तक किसी व्यक्ति या संस्था पर जिम्मेदारी तय करना उचित नहीं होगा। यदि किसी स्तर पर लापरवाही या नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है, तो संबंधित प्रक्रिया के अनुसार कार्रवाई का रास्ता खुला रहेगा।

प्रशासन के सामने अब कई अहम चुनौतियां

इस घटना के बाद IIT बॉम्बे प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती छात्रों का भरोसा बनाए रखना है। इसके लिए केवल बयान जारी करना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि छात्रों की ओर से उठाए गए सवालों पर स्पष्ट जानकारी और संस्थागत स्तर पर ठोस कदमों की जरूरत होगी।

विशेषज्ञों के अनुसार, उच्च शिक्षण संस्थानों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को अकादमिक व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा बनाने की आवश्यकता है। छात्रों के लिए ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जहां वे बिना भय के अपनी समस्या साझा कर सकें।

इसके अलावा, अनुशासनात्मक मामलों में स्पष्ट प्रक्रिया, अपील का विकल्प, नियमित काउंसलिंग और संकट की स्थिति में त्वरित सहायता जैसी व्यवस्थाएं छात्रों के लिए सुरक्षा कवच का काम कर सकती हैं।

IIT बॉम्बे में हुए विरोध-प्रदर्शन ने छात्र सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे को एक बार फिर केंद्र में ला दिया है। अब निगाहें पुलिस जांच और संस्थान की ओर से उठाए जाने वाले अगले कदमों पर रहेंगी।

छात्रों की मांग है कि पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच हो, प्रशासन अपनी रिपोर्ट सार्वजनिक करे और भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए प्रभावी व्यवस्था लागू की जाए। वहीं संस्थान की ओर से उपलब्ध जानकारी में अनुशासनात्मक कार्रवाई से संबंधित छात्रों के दावों से अलग स्थिति बताई गई है।

इस पूरे मामले में सबसे जरूरी बात यही है कि जांच के निष्कर्ष आने से पहले किसी एक पक्ष के दावे को अंतिम सत्य न माना जाए। एक प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान में पढ़ने वाले हर छात्र की सुरक्षा, गरिमा और मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देने के साथ-साथ किसी भी अनुशासनात्मक मामले में निष्पक्ष और पारदर्शी प्रक्रिया सुनिश्चित करना आवश्यक है।

महत्वपूर्ण: यदि कोई विद्यार्थी खुद को अत्यधिक तनाव, निराशा या संकट में महसूस कर रहा हो, तो उसे अकेले न रहकर तुरंत किसी भरोसेमंद व्यक्ति, परिवार, शिक्षक, काउंसलर या स्थानीय आपात सहायता सेवा से संपर्क करना चाहिए। आत्महत्या या आत्मघाती विचारों से जुड़ी स्थिति में तत्काल पेशेवर मदद लेना जरूरी है।

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