महाराष्ट्र के बीड जिले में महिला गन्ना मजदूरों के बीच गर्भाशय निकालने की सर्जरी का मुद्दा फिर चर्चा में है। मजदूरी, कठिन कामकाजी परिस्थितियों और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से जुड़ी इस समस्या पर सरकारी रिपोर्टों और अध्ययनों ने चिंता जताई है।
महाराष्ट्र के बीड जिले से जुड़ी महिला गन्ना मजदूरों की स्वास्थ्य संबंधी समस्या एक बार फिर चर्चा में है। सोशल मीडिया पर वायरल एक पोस्ट में दावा किया गया है कि बड़ी संख्या में महिलाओं ने गन्ने के खेतों में काम करने के दौरान होने वाली परेशानियों से बचने के लिए गर्भाशय निकलवाने की सर्जरी यानी हिस्टेरेक्टॉमी कराई। पोस्ट में पिछले तीन वर्षों में 13,800 से अधिक महिलाओं की सर्जरी का दावा भी किया गया है। हालांकि, उपलब्ध सरकारी दस्तावेजों और शोध रिपोर्टों को देखने पर इस आंकड़े को उसी रूप में प्रस्तुत करना सावधानी की मांग करता है।
सरकारी आंकड़ों में 13,861 महिलाओं का उल्लेख
महाराष्ट्र सरकार की 2019 में कराई गई जांच से जुड़े आंकड़ों के अनुसार, बीड जिले में सर्वे किए गए 82,309 महिला गन्ना मजदूरों में 13,861 महिलाओं की हिस्टेरेक्टॉमी हुई थी। यह आंकड़ा 2019 के सर्वे से संबंधित है और इसे पिछले तीन वर्षों का आंकड़ा बताना सही नहीं होगा।
हिस्टेरेक्टॉमी एक ऐसी सर्जरी है जिसमें महिला के गर्भाशय को चिकित्सकीय प्रक्रिया के जरिए निकाल दिया जाता है। यह कई चिकित्सकीय परिस्थितियों में आवश्यक हो सकती है, लेकिन कम उम्र में या बिना पर्याप्त चिकित्सकीय आवश्यकता के ऐसी सर्जरी को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं।
बीड में यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जिले के कई परिवार हर साल गन्ने की कटाई के मौसम में रोजगार के लिए दूसरे क्षेत्रों की ओर पलायन करते हैं। महिला और पुरुष दोनों गन्ने की कटाई जैसे कठिन शारीरिक श्रम में शामिल होते हैं।
मजदूरी और काम के दबाव का सवाल
गन्ने की कटाई का काम कई महीनों तक चलने वाला मौसमी रोजगार है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, कुछ महिला मजदूरों के सामने मासिक धर्म के दौरान काम करने, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और काम से छुट्टी लेने पर मजदूरी प्रभावित होने जैसी समस्याएं सामने आई हैं। कुछ रिपोर्टों में ठेकेदारों की ओर से काम के दौरान अनुपस्थिति को लेकर आर्थिक दबाव का भी उल्लेख किया गया है।
2019 में राज्यसभा में इस मुद्दे को उठाते हुए सांसद वंदना चव्हाण ने बीड की महिला गन्ना मजदूरों की स्थिति पर चिंता जताई थी। संसदीय रिकॉर्ड में उन्होंने बताया था कि कुछ ठेकेदार दंपतियों को एक साथ काम पर रखते थे और अनुपस्थिति की स्थिति में आर्थिक दंड की बात सामने आई थी।
यही परिस्थितियां इस बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं कि क्या कुछ महिलाओं ने वास्तव में चिकित्सा जरूरत के अलावा काम से जुड़े दबावों के कारण भी सर्जरी का विकल्प चुना।
2024 में भी सामने आया बड़ा आंकड़ा
यह समस्या केवल पुरानी घटनाओं तक सीमित नहीं है। 2025 में प्रकाशित रिपोर्टों में महाराष्ट्र के स्वास्थ्य विभाग से जुड़े आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया गया कि 2024 में गन्ना कटाई के लिए पलायन से पहले बीड की 843 महिलाओं की हिस्टेरेक्टॉमी हुई थी। रिपोर्ट के अनुसार इनमें बड़ी संख्या 30 से 35 वर्ष की महिलाओं की थी।
यह आंकड़ा इस बात की ओर ध्यान खींचता है कि महिला गन्ना मजदूरों की प्रजनन स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को केवल पुराने मामले के रूप में नहीं देखा जा सकता। हालांकि हर हिस्टेरेक्टॉमी को जबरन या अनावश्यक बताना भी तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा, क्योंकि सर्जरी के व्यक्तिगत चिकित्सकीय कारण अलग-अलग हो सकते हैं।
सरकारी स्तर पर निगरानी और जवाबदेही
जुलाई 2025 में राज्यसभा में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय से बीड की महिला प्रवासी गन्ना मजदूरों की प्रजनन स्वास्थ्य स्थिति को लेकर सवाल पूछा गया था। केंद्र सरकार ने अपने जवाब में कहा कि मीडिया रिपोर्टों और शोध अध्ययनों में बीड की कुछ महिला गन्ना मजदूरों के हिस्टेरेक्टॉमी कराने की बात सामने आई है। साथ ही यह भी बताया गया कि स्वास्थ्य राज्य का विषय है और महाराष्ट्र सरकार ने बीड में महिला गन्ना मजदूरों की हिस्टेरेक्टॉमी सर्जरी की निगरानी की जानकारी दी है।
इससे यह स्पष्ट होता है कि मामला केवल सोशल मीडिया दावों तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी स्तर पर भी इसे लेकर सवाल और निगरानी की प्रक्रिया मौजूद रही है।
शोध में भी कामकाजी परिस्थितियों पर चिंता
2024 में प्रकाशित एक शोध में बीड जिले की महिला गन्ना मजदूरों के प्रजनन स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं का अध्ययन किया गया। शोधकर्ताओं ने 80 महिला गन्ना मजदूरों का अध्ययन किया, जिनमें 40 ऐसी महिलाएं थीं जिनकी हिस्टेरेक्टॉमी हुई थी और 40 ऐसी थीं जिनकी नहीं हुई थी।
2026 में प्रकाशित एक अन्य अकादमिक अध्ययन ने भी महाराष्ट्र के प्रवासी गन्ना मजदूरों के बीच हिस्टेरेक्टॉमी के मुद्दे को श्रम व्यवस्था, आर्थिक दबाव और महिलाओं के प्रजनन स्वास्थ्य के संदर्भ में देखा। अध्ययन में 36 लोगों के साक्षात्कार शामिल थे, जिनमें 25 महिला गन्ना मजदूर शामिल थीं जिनकी हिस्टेरेक्टॉमी हुई थी।
हालांकि, किसी शोध में शामिल सीमित संख्या के साक्षात्कारों को पूरे जिले की सभी महिलाओं पर सीधे लागू नहीं किया जा सकता।
असली सवाल: स्वास्थ्य सुविधा और सुरक्षित काम
बीड की यह कहानी केवल हिस्टेरेक्टॉमी के आंकड़ों तक सीमित नहीं है। इसके पीछे महिला मजदूरों के लिए काम की परिस्थितियां, स्वच्छता, मासिक धर्म के दौरान सुविधाएं, स्वास्थ्य जांच, पर्याप्त चिकित्सकीय सलाह और काम से जुड़ी आर्थिक सुरक्षा जैसे कई मुद्दे जुड़े हुए हैं।
यदि किसी महिला को वास्तव में चिकित्सकीय कारण से हिस्टेरेक्टॉमी की जरूरत है तो उसे विशेषज्ञ डॉक्टर की सलाह, पूरी जानकारी और स्वतंत्र सहमति के आधार पर उपचार मिलना जरूरी है। वहीं, यदि किसी महिला को केवल मजदूरी कटने या काम छूटने के डर से ऐसी सर्जरी का दबाव महसूस हो, तो यह श्रम और स्वास्थ्य अधिकारों से जुड़ा गंभीर प्रश्न बन जाता है।
इसलिए वायरल पोस्ट में बताए गए “पिछले तीन वर्षों में 13,800 से अधिक” आंकड़े को सीधे वर्तमान आंकड़ा मानने के बजाय 2019 के आधिकारिक सर्वे में दर्ज 13,861 मामलों और 2024 में सामने आए 843 मामलों जैसे अलग-अलग आंकड़ों के संदर्भ में देखना चाहिए। उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि बीड की महिला गन्ना मजदूरों के स्वास्थ्य और कामकाजी परिस्थितियों का मुद्दा वास्तविक और लंबे समय से जांच का विषय रहा है।