रांची/नई दिल्ली। रात में बिस्तर पर जाने के बाद मोबाइल फोन पर रील्स, शॉर्ट वीडियो और सोशल मीडिया स्क्रॉल करने की आदत तेजी से आम हो रही है। खासकर युवाओं में देर रात तक मोबाइल इस्तेमाल करने की यह दिनचर्या अब नींद और लाइफस्टाइल को लेकर स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता का विषय बन रही है। इसी मुद्दे को लेकर रांची में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. निशांत त्रिपाठी ने युवाओं की बदलती डिजिटल आदतों और उनके संभावित स्वास्थ्य प्रभावों पर बात की।
सोशल मीडिया पर साझा की गई जानकारी के मुताबिक, डॉ. त्रिपाठी ने कहा कि आज बड़ी संख्या में युवा रात में सोने के समय भी मोबाइल फोन पर सक्रिय रहते हैं। कई लोग बिस्तर पर जाने के बाद लगातार एक से दो घंटे तक रील्स और सोशल मीडिया कंटेंट देखते रहते हैं। ऐसी आदत का सीधा असर नींद के समय और दैनिक जीवनशैली पर पड़ सकता है।
हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि केवल रात में रील्स देखने को सीधे तौर पर हार्ट अटैक का कारण साबित नहीं किया गया है। उपलब्ध वैज्ञानिक अध्ययनों में मुख्य रूप से ज्यादा स्क्रीन टाइम और खराब नींद के बीच संबंध सामने आया है। इसलिए इस विषय को हृदय स्वास्थ्य के व्यापक जोखिम कारकों और जीवनशैली के संदर्भ में समझना जरूरी है।
देर रात मोबाइल देखने से नींद पर पड़ सकता है असर
स्क्रीन टाइम और नींद के संबंध पर प्रकाशित एक हालिया व्यवस्थित समीक्षा एवं मेटा-विश्लेषण में 21 कोहोर्ट अध्ययनों और करीब 5.48 लाख प्रतिभागियों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। इसमें ज्यादा स्क्रीन टाइम का संबंध कम नींद, देर से सोने और नींद शुरू होने में परेशानी जैसे परिणामों से पाया गया। शोधकर्ताओं ने हालांकि यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे अध्ययनों से हर स्थिति में सीधा कारण-परिणाम साबित नहीं होता।
एक अन्य व्यवस्थित समीक्षा में स्मार्टफोन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के अधिक इस्तेमाल तथा खराब नींद के बीच संबंध पाया गया। इसमें अलग-अलग देशों से 41,716 प्रतिभागियों को शामिल करने वाले 55 शोध-पत्रों का विश्लेषण किया गया था।
इसका मतलब यह है कि रात में लगातार फोन देखने की आदत को केवल आंखों पर पड़ने वाले प्रभाव तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। यदि मोबाइल के कारण व्यक्ति देर से सोता है या पर्याप्त नींद नहीं ले पाता, तो उसकी पूरी दिनचर्या प्रभावित हो सकती है।
युवाओं में क्यों बढ़ रही है देर रात स्क्रॉलिंग?
रील्स और शॉर्ट वीडियो का फॉर्मेट इस तरह बनाया जाता है कि उपयोगकर्ता एक वीडियो खत्म होते ही अगला वीडियो देखने लगे। कुछ मिनट का इस्तेमाल कब लंबी स्क्रॉलिंग में बदल जाता है, इसका पता कई बार उपयोगकर्ता को खुद नहीं चलता।
रात के समय यह आदत ज्यादा समस्या पैदा कर सकती है, क्योंकि उस वक्त शरीर को आराम और नियमित नींद की आवश्यकता होती है। मोबाइल की लगातार सक्रियता सोने के समय को आगे बढ़ा सकती है। शोधों में भी स्क्रीन टाइम बढ़ने के साथ देर से सोने और कम नींद के बीच संबंध दर्ज किया गया है।
युवाओं के लिए पर्याप्त नींद विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। विशेषज्ञों की अंतरराष्ट्रीय सिफारिशों में 18 से 25 वर्ष के युवाओं और 26 से 64 वर्ष के वयस्कों के लिए आमतौर पर 7 से 9 घंटे की नींद की सलाह दी जाती है।
क्या रील्स से सीधे बढ़ता है हार्ट अटैक का खतरा?
यहां सबसे महत्वपूर्ण बात दावे और वैज्ञानिक प्रमाण के बीच अंतर समझना है। सोशल मीडिया पोस्ट में देर रात रील्स देखने और हार्ट अटैक के खतरे को एक साथ जोड़ा गया है, लेकिन उपलब्ध शोध से यह कहना उचित नहीं होगा कि केवल रील्स देखने से किसी व्यक्ति को हार्ट अटैक हो जाएगा।
हृदय स्वास्थ्य पर असर डालने वाले कई स्थापित जोखिम कारक होते हैं, जिनमें उच्च रक्तचाप, मधुमेह, धूम्रपान, अस्वास्थ्यकर खान-पान, शारीरिक निष्क्रियता, मोटापा और अन्य व्यक्तिगत जोखिम शामिल हो सकते हैं। वहीं लगातार कम नींद और खराब नींद की गुणवत्ता भी लंबे समय में स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय हो सकती है।
इसलिए विशेषज्ञों की चेतावनी को मोबाइल की एक आदत को अकेले हार्ट अटैक का कारण मानने के बजाय स्वस्थ जीवनशैली और बेहतर नींद की दिशा में सावधानी के रूप में देखना ज्यादा उचित है।
रात में मोबाइल इस्तेमाल करने की आदत कैसे कम करें?
यदि कोई व्यक्ति सोने के समय लगातार रील्स देखने का आदी है, तो मोबाइल इस्तेमाल को अचानक पूरी तरह बंद करने के बजाय धीरे-धीरे स्क्रीन टाइम कम किया जा सकता है। सोने से पहले फोन को बिस्तर से कुछ दूरी पर रखना, अनावश्यक नोटिफिकेशन बंद करना और सोशल मीडिया के लिए समय सीमा तय करना उपयोगी कदम हो सकते हैं।
इसके अलावा सोने और जागने का समय नियमित रखने, दिन में पर्याप्त शारीरिक गतिविधि करने तथा रात के समय शांत वातावरण तैयार करने पर भी ध्यान दिया जा सकता है।
यदि मोबाइल इस्तेमाल के साथ लगातार नींद न आना, अत्यधिक दिन की नींद, सीने में दर्द, सांस लेने में परेशानी, तेज धड़कन या बेहोशी जैसे लक्षण दिखाई दें तो केवल स्क्रीन टाइम को कारण मानकर स्वयं उपचार करने के बजाय चिकित्सकीय सलाह लेना जरूरी है।
डिजिटल आदतों पर ध्यान देने की जरूरत
आज स्मार्टफोन पढ़ाई, नौकरी, मनोरंजन और संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। इसलिए मोबाइल का इस्तेमाल पूरी तरह छोड़ना व्यावहारिक समाधान नहीं है। चुनौती यह है कि उपयोग और जरूरत के बीच संतुलन बनाया जाए।
डॉ. निशांत त्रिपाठी के हवाले से सामने आई सलाह इसी बदलती जीवनशैली की ओर ध्यान खींचती है। रात में एक से दो घंटे रील्स देखने की आदत को सामान्य मानने के बजाय यह देखना जरूरी है कि उससे नींद का समय, शारीरिक गतिविधि और रोजमर्रा की दिनचर्या प्रभावित तो नहीं हो रही।
वैज्ञानिक प्रमाण फिलहाल ज्यादा स्क्रीन टाइम और खराब नींद के बीच संबंध को समर्थन देते हैं, जबकि रील्स को सीधे हार्ट अटैक का कारण बताने के लिए अधिक विशिष्ट प्रमाण की जरूरत होगी।
निष्कर्ष: रात में मोबाइल और रील्स का अत्यधिक इस्तेमाल कम करना, पर्याप्त नींद लेना और नियमित शारीरिक गतिविधि बनाए रखना समग्र स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है। खासकर युवाओं को यह समझने की जरूरत है कि मनोरंजन के कुछ मिनट कब देर रात की आदत में बदल जाते हैं।