एक ही मामले में दूसरी बार इस्तीफा,नागेंद्र बोले- आरोप पूरी तरह निराधार

कर्नाटक की राजनीति में बी नागेंद्र के मंत्री पद से इस्तीफे के ऐलान ने एक बार फिर सियासी हलचल बढ़ा दी है। खास बात यह है कि उन्होंने मंत्री पद संभालने के करीब 25 दिन बाद ही पद छोड़ने की घोषणा की है। नागेंद्र इससे पहले भी सिद्धारमैया सरकार में मंत्री रह चुके हैं और […]

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  • August 29, 2026 2:05 pm IST, Published 2 hours ago

कर्नाटक की राजनीति में बी नागेंद्र के मंत्री पद से इस्तीफे के ऐलान ने एक बार फिर सियासी हलचल बढ़ा दी है। खास बात यह है कि उन्होंने मंत्री पद संभालने के करीब 25 दिन बाद ही पद छोड़ने की घोषणा की है। नागेंद्र इससे पहले भी सिद्धारमैया सरकार में मंत्री रह चुके हैं और कर्नाटक महर्षि वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति विकास निगम से जुड़े कथित वित्तीय अनियमितता मामले के कारण उन्हें पहले भी मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। अब दोबारा उसी विवाद के बीच उनका इस्तीफा सामने आया है।

इस्तीफे की घोषणा से पहले नागेंद्र ने मीडिया से बातचीत की और इस दौरान वह भावुक दिखाई दिए। उन्होंने अपने ऊपर लगाए जा रहे आरोपों को खारिज करते हुए खुद को निर्दोष बताया। उनका कहना था कि विपक्ष लगातार उन्हें निशाना बना रहा है और लगाए जा रहे आरोपों के कारण पार्टी को राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ रहा है। इसी वजह से उन्होंने अपनी इच्छा से मंत्री पद छोड़ने का फैसला किया।

नागेंद्र ने विपक्ष और भारतीय जनता पार्टी पर भी निशाना साधा। उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ ताकतें आदिवासी नेतृत्व को आगे बढ़ते नहीं देखना चाहतीं। हालांकि, उनके इस्तीफे का मुख्य राजनीतिक कारण वाल्मीकि निगम से जुड़े कथित वित्तीय अनियमितता के आरोप ही माने जा रहे हैं। विपक्ष लंबे समय से इस मामले को लेकर सरकार पर दबाव बना रहा था और नागेंद्र के इस्तीफे की मांग कर रहा था।

यह विवाद पहली बार वर्ष 2024 में सामने आया था। उस समय बी नागेंद्र सिद्धारमैया सरकार में जनजातीय कल्याण विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। इसी दौरान कर्नाटक महर्षि वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति विकास निगम से जुड़े वित्तीय लेनदेन पर सवाल उठे। आरोप लगाया गया कि निगम के बैंक खाते से करीब 187 करोड़ रुपये की राशि कथित तौर पर अनधिकृत तरीके से स्थानांतरित की गई।

मामले ने उस समय गंभीर रूप ले लिया जब निगम के अकाउंट्स ऑफिसर चंद्रशेखर पी ने आत्महत्या कर ली। उनके द्वारा छोड़े गए कथित सुसाइड नोट में निगम में वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े आरोपों का उल्लेख सामने आया। इसके बाद मामले को लेकर राजनीतिक दबाव बढ़ा और तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने नागेंद्र से मंत्री पद से इस्तीफा देने को कहा था। नागेंद्र ने जून 2024 में मंत्री पद छोड़ दिया था।

बाद में राज्य की राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव के बीच नागेंद्र को दोबारा मंत्रिमंडल में शामिल किया गया। उपमुख्यमंत्री डीके शिवकुमार के नेतृत्व वाले मौजूदा राजनीतिक समीकरण में उन्हें फिर से मंत्री की जिम्मेदारी मिली। हालांकि, उनके दोबारा मंत्री बनने के साथ ही विपक्ष ने पुराने मामले को फिर उठाया और सरकार से उनके हटाए जाने की मांग तेज कर दी।अब करीब 25 दिन बाद उनका दोबारा इस्तीफा देने का ऐलान राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। एक ही मामले के कारण दूसरी बार मंत्री पद छोड़ने की स्थिति ने सरकार और कांग्रेस संगठन के सामने भी सवाल खड़े किए हैं।

विपक्ष इसे सरकार की जवाबदेही से जोड़ रहा है, जबकि नागेंद्र लगातार अपने ऊपर लगे आरोपों को निराधार बताते रहे हैं। मामले की जांच और उससे जुड़े कानूनी पहलुओं के बीच नागेंद्र का कहना है कि उन्होंने पार्टी की प्रतिष्ठा को ध्यान में रखते हुए पद छोड़ने का निर्णय लिया है। उनका तर्क है कि आरोपों की वजह से कांग्रेस को राजनीतिक रूप से नुकसान हो रहा था और वह नहीं चाहते कि उनकी वजह से पार्टी को शर्मिंदगी का सामना करना पड़े।

वाल्मीकि निगम मामले ने कर्नाटक में सरकारी निगमों के वित्तीय प्रबंधन और निगरानी व्यवस्था को लेकर भी बहस छेड़ी है। सरकारी संस्थाओं के खातों से बड़े स्तर पर धन के लेनदेन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी वजह से इस मामले में राजनीतिक दलों के साथ-साथ जांच एजेंसियों की कार्रवाई पर भी नजर बनी हुई है।

बी नागेंद्र के इस्तीफे से फिलहाल कर्नाटक की राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप का दौर और तेज होने की संभावना है। कांग्रेस के लिए यह मामला राजनीतिक चुनौती बना हुआ है, जबकि विपक्ष इसे सरकार पर दबाव बनाने के अवसर के तौर पर देख रहा है। दूसरी ओर नागेंद्र अपने बचाव में लगातार यह कहते रहे हैं कि वह निर्दोष हैं और उनके खिलाफ लगाए गए आरोप राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित हैं।

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