विवाहित बेटी को अनुकंपा नौकरी से वंचित नहीं कर सकते

बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि किसी महिला को केवल विवाहित होने के आधार पर नौकरी के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने दो मामलों में मृत कर्मचारियों की विवाहित बेटियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए संबंधित बैंक को उन्हें […]

Advertisement
Gauravshali Bharat
Gauravshali Bharat News
  • September 1, 2026 12:22 pm IST, Published 48 minutes ago

बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अनुकंपा नियुक्ति से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि किसी महिला को केवल विवाहित होने के आधार पर नौकरी के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। अदालत ने दो मामलों में मृत कर्मचारियों की विवाहित बेटियों के पक्ष में फैसला सुनाते हुए संबंधित बैंक को उन्हें अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति देने का निर्देश दिया है।

मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने 30 जुलाई को यह आदेश पारित किया। अदालत के सामने बिलासपुर की शीना डेविड और रायपुर की अंकिता मिश्रा की याचिकाएं थीं। दोनों महिलाओं ने अपने पिता की सेवा के दौरान मृत्यु के बाद अनुकंपा नियुक्ति के लिए दावा किया था, लेकिन उनके विवाहित होने के आधार पर दावों को स्वीकार नहीं किया गया था।

मामला छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण बैंक से जुड़ा हुआ है। दोनों याचिकाकर्ताओं के पिता बैंक में कार्यरत थे और नौकरी के दौरान उनका निधन हो गया था। इसके बाद परिवार की परिस्थितियों को देखते हुए बेटियों ने अनुकंपा नियुक्ति की मांग की। बैंक की ओर से उनके दावे इस आधार पर खारिज किए गए कि वे शादीशुदा हैं। इसके बाद दोनों महिलाओं ने न्यायिक रास्ता अपनाया। मामले में हाई कोर्ट की एकल पीठ के सात मई 2026 के आदेश को भी चुनौती दी गई थी। खंडपीठ ने सुनवाई के बाद एकल पीठ के आदेश को रद्द कर दिया और दोनों मामलों में विवाहित बेटियों के दावे को केवल वैवाहिक स्थिति के आधार पर खारिज करने के रवैये को स्वीकार नहीं किया।

अदालत ने अपने फैसले में यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की कि सिर्फ शादी हो जाने के कारण किसी बेटी को अनुकंपा नियुक्ति की प्रक्रिया से बाहर करना उचित नहीं है। पीठ ने ऐसे आधार पर दावे को अस्वीकार किए जाने को मनमाना और भेदभावपूर्ण माना। अदालत के अनुसार, किसी महिला की वैवाहिक स्थिति अपने आप में यह साबित नहीं करती कि उसे परिवार की आर्थिक कठिनाइयों या आश्रित परिवार के सदस्य के रूप में सहायता की जरूरत नहीं है।

अनुकंपा नियुक्ति का उद्देश्य किसी कर्मचारी की सेवा के दौरान मृत्यु होने पर उसके परिवार को अचानक पैदा हुई आर्थिक कठिनाई से उबरने में सहायता देना है। सामान्य नियुक्ति प्रक्रिया से अलग, यह व्यवस्था मृत कर्मचारी के आश्रित परिवार को राहत देने के उद्देश्य से बनाई गई है। ऐसे में पात्रता तय करते समय केवल वैवाहिक स्थिति को निर्णायक आधार बनाना अदालत को उचित नहीं लगा।

इस फैसले का महत्व इसलिए भी है क्योंकि कई मामलों में विवाहित बेटियों के दावों को पारिवारिक स्थिति या सेवा नियमों की व्याख्या के आधार पर अलग नजर से देखा जाता रहा है। हाई कोर्ट के इस फैसले से यह संदेश गया है कि महिला की शादी को उसके अधिकारों को खत्म करने का स्वतः आधार नहीं बनाया जा सकता।

हालांकि अनुकंपा नियुक्ति का अर्थ यह नहीं है कि कर्मचारी की मृत्यु के बाद परिवार का हर सदस्य स्वतः सरकारी नौकरी का हकदार हो जाता है। नियुक्ति के लिए संबंधित सेवा नियमों, पात्रता, परिवार की आर्थिक स्थिति और अन्य निर्धारित शर्तों को पूरा करना जरूरी होता है। लेकिन अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि केवल शादीशुदा होने के आधार पर बेटी के दावे को खारिज नहीं किया जा सकता।

शीना डेविड और अंकिता मिश्रा के मामलों में अदालत के निर्देश के बाद अब बैंक को नियुक्ति संबंधी प्रक्रिया आगे बढ़ानी होगी। इस फैसले से उन महिलाओं के मामलों में भी कानूनी बहस को दिशा मिल सकती है, जिन्हें केवल उनकी वैवाहिक स्थिति के आधार पर अनुकंपा नियुक्ति से बाहर कर दिया गया हो।

फैसले में लैंगिक समानता और समान व्यवहार के सिद्धांत पर भी जोर दिखाई देता है। अदालत का रुख यह बताता है कि किसी महिला की शादी को उसके आर्थिक अधिकारों या परिवार के प्रति जिम्मेदारियों का अंतिम पैमाना नहीं माना जा सकता। किसी भी दावे पर निर्णय लेते समय वास्तविक परिस्थितियों और लागू नियमों को ध्यान में रखना जरूरी है। कुल मिलाकर, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट का यह फैसला अनुकंपा नियुक्ति के मामलों में विवाहित बेटियों के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

 

Advertisement