बिलासपुर: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने मातृत्व अवकाश से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में महिला कर्मचारियों के अधिकारों को लेकर अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल लीव बैलेंस कम होने या तकनीकी आधार पर किसी महिला कर्मचारी को मातृत्व लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (FCI) की अपील खारिज करते हुए महिला कर्मचारी के वेतन से काटी गई 80,254 रुपये की राशि वापस करने का निर्देश दिया है।
मामला एफसीआई के रायपुर कार्यालय में असिस्टेंट ग्रेड-2 के पद पर कार्यरत किरण गौतम शर्मा से जुड़ा है। वह जुड़वा बच्चों की गर्भवती थीं। गर्भावस्था के दौरान एक भ्रूण का मिसकैरेज हो गया, जबकि दूसरे भ्रूण की स्थिति हाई रिस्क बताई गई। चिकित्सकीय परिस्थितियों के कारण उन्हें लंबे समय तक बेड रेस्ट की आवश्यकता पड़ी।
इसी वजह से उन्हें लंबी अवधि तक अवकाश पर रहना पड़ा। एफसीआई ने उनकी 68 दिन की अनुपस्थिति को एक्स्ट्रा ऑर्डिनरी लीव की श्रेणी में माना और इसी आधार पर उनके वेतन से 80,254 रुपये की कटौती कर दी। वेतन कटौती और मातृत्व अवकाश को लेकर महिला कर्मचारी ने न्यायालय का रुख किया था। मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने 13 मई 2026 को उनके पक्ष में फैसला सुनाया था।
सिंगल बेंच ने महिला को 90 दिन के सवेतन मातृत्व अवकाश का लाभ देने और वेतन से की गई कटौती को समाप्त करने का निर्देश दिया था। इस फैसले से असंतुष्ट एफसीआई ने इसे डिवीजन बेंच के समक्ष चुनौती दी। डिवीजन बेंच में मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रविंद्र कुमार अग्रवाल ने मामले की सुनवाई की। अदालत ने एफसीआई की अपील को खारिज करते हुए सिंगल बेंच के आदेश को बरकरार रखा।
डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में मातृत्व लाभ के महत्व को रेखांकित किया। अदालत ने कहा कि मातृत्व लाभ केवल कर्मचारी को दिया जाने वाला सामान्य अवकाश नहीं है, बल्कि यह महिला के स्वास्थ्य, सम्मान और गरिमा से जुड़ा अधिकार है। कोर्ट ने माना कि गर्भावस्था के दौरान गंभीर चिकित्सकीय परिस्थितियों के कारण महिला को लंबे समय तक आराम की जरूरत पड़ सकती है। ऐसी परिस्थितियों में केवल छुट्टी के खाते में उपलब्ध दिनों की संख्या या किसी तकनीकी नियम का हवाला देकर मातृत्व लाभ से इनकार करना उचित नहीं होगा।
अदालत का फैसला ऐसे मामलों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां महिला कर्मचारियों को गर्भावस्था या प्रसव से संबंधित परिस्थितियों के कारण निर्धारित अवकाश से अधिक समय तक छुट्टी की जरूरत पड़ती है। हाईकोर्ट के आदेश के बाद एफसीआई को महिला कर्मचारी के वेतन से काटी गई 80,254 रुपये की राशि वापस करनी होगी। इसके साथ ही उन्हें अदालत द्वारा निर्धारित 90 दिन के सवेतन मातृत्व अवकाश का लाभ भी मिलेगा।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट का यह फैसला कार्यस्थल पर महिला कर्मचारियों के मातृत्व अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण संदेश देता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि मातृत्व से जुड़े अधिकारों को केवल प्रशासनिक या तकनीकी आधार पर कमजोर नहीं किया जा सकता। फैसले का व्यापक महत्व इसलिए भी है क्योंकि गर्भावस्था के दौरान प्रत्येक महिला की स्वास्थ्य स्थिति अलग हो सकती है। कुछ मामलों में सामान्य अवधि की तुलना में अधिक चिकित्सकीय देखभाल और आराम की जरूरत पड़ सकती है। ऐसे मामलों में कर्मचारी के स्वास्थ्य और मातृत्व अधिकारों को प्राथमिकता देना जरूरी है।
कोर्ट के फैसले से यह भी स्पष्ट होता है कि सेवा नियमों की व्याख्या करते समय महिला कर्मचारी की वास्तविक परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मातृत्व लाभ का उद्देश्य ही महिला और बच्चे के स्वास्थ्य तथा सुरक्षा को सुनिश्चित करना है। इस मामले में हाईकोर्ट ने एफसीआई की अपील खारिज कर दी और महिला कर्मचारी के पक्ष में पहले दिए गए आदेश को प्रभावी रखा। साथ ही वेतन से काटी गई राशि वापस करने का निर्देश दिया गया। फैसला महिला कर्मचारियों के मातृत्व अधिकार, स्वास्थ्य और कार्यस्थल पर सम्मान से जुड़े मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक टिप्पणी के रूप में देखा जा रहा है।