नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के सेंट्रल रिज से बाहरी और आक्रामक प्रजातियों के पेड़ हटाने की अनुमति दे दी है। हालांकि, वन विभाग को यह कार्रवाई मंजूर दिल्ली इको-रिस्टोरेशन प्लान 2026-30 के तहत ही करनी होगी। अदालत ने स्पष्ट किया कि पूरी प्रक्रिया की निगरानी दिल्ली रिज मैनेजमेंट बोर्ड करेगा।
मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत और न्यायमूर्ति जयमाल्य बागची तथा न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने दिल्ली वन विभाग की याचिका पर यह आदेश दिया। पीठ ने विभाग के इस तर्क को स्वीकार किया कि सेंट्रल रिज में मौजूद कुछ आक्रामक प्रजातियों को हटाकर स्थानीय यानी देशी प्रजातियों के विकास के लिए जगह तैयार करना जरूरी है।
वन विभाग के अनुसार, विलायती कीकर (प्रोसोपिस जूलिफ्लोरा), बबूल (वैचेलिया निलोटिका) और यूकेलिप्टस जैसी प्रजातियों को हटाने से नीम, बरगद, पीपल, जामुन और अमलतास जैसी देशी प्रजातियों के विकास में मदद मिलेगी। दिल्ली के वन विभाग की पर्यावरणीय बहाली योजनाओं में भी आक्रामक प्रजातियों के प्रबंधन और देशी प्रजातियों के रोपण पर जोर दिया गया है।
सुनवाई के दौरान वन विभाग की ओर से बताया गया कि बड़े क्षेत्र में करीब 13 हजार आक्रामक पेड़ों को हटाया जाना बाकी है। विभाग के अनुसार, इनकी जगह देशी पेड़-पौधों और झाड़ियों को विकसित करने की योजना है।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि पूरी प्रक्रिया स्वीकृत इको-रिस्टोरेशन योजना के अनुसार होनी चाहिए। अदालत ने वन विभाग को अंतरिम अनुपालन रिपोर्ट पेश करने को भी कहा है। साथ ही, वन अनुसंधान संस्थान, देहरादून के निदेशक को योजना के क्रियान्वयन की समीक्षा के लिए विशेषज्ञों की टीम गठित करने को कहा गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट में चल रही अवमानना की कार्यवाही पर भी रोक लगा दी। यह कार्यवाही सेंट्रल रिज में निर्माण, सफाई, खुदाई और पेड़ हटाने से संबंधित पूर्व निर्देशों के कथित उल्लंघन को लेकर शुरू की गई थी। यह मामला हाई कोर्ट के 20 अगस्त के आदेश को चुनौती देने वाली वन विभाग की याचिका से जुड़ा था।
अवमानना याचिका सेवानिवृत्त लेफ्टिनेंट कर्नल सर्वदमन सिंह ओबेरॉय, अरावली बचाओ सिटिजन मूवमेंट के प्रबंध न्यासी, ने दायर की थी। अब सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद सेंट्रल रिज में आक्रामक प्रजातियों को हटाने और देशी वनस्पतियों की बहाली का काम निर्धारित योजना और निगरानी व्यवस्था के तहत आगे बढ़ेगा।