नई दिल्ली: वंदे मातरम् के सभी छह छंदों के गायन को लेकर दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि वह यह तय करने के सवाल में नहीं जाएगी कि राष्ट्रीय गीत का स्वरूप दो छंदों तक सीमित होना चाहिए या छह छंदों तक। हालांकि, कोर्ट ने इस संवैधानिक सवाल पर विचार करने की सहमति जताई कि किसी व्यक्ति को राष्ट्रीय गीत नहीं गाने पर आपराधिक कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है या नहीं।
यह मामला कर्नाटक संगीत के प्रसिद्ध गायक टी.एम. कृष्णा की ओर से दायर याचिका से जुड़ा है। कृष्णा ने केंद्र सरकार की ओर से वंदे मातरम् के पूर्ण छह छंदों के गायन से संबंधित निर्देशों और 2026 में किए गए कानूनी संशोधन को चुनौती दी है। याचिका में दलील दी गई है कि छह छंदों को अनिवार्य रूप से गाने की व्यवस्था नागरिकों की अंतरात्मा और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े मौलिक अधिकारों के सवाल खड़े करती है।
याचिका में कहा गया है कि इन छंदों को अनिवार्य रूप से गाने के लिए बाध्य करना धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था और नागरिकों की अंतरात्मा की स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक अधिकारों के संदर्भ में परखा जाना चाहिए। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 14, 15(1), 19(1)(a), 21 और 25(1) का भी हवाला दिया गया है। याचिका में राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, 1971 में 2026 में किए गए संशोधन को भी चुनौती दी गई है। संशोधित प्रावधान के तहत राष्ट्रीय गान या राष्ट्रीय गीत के गायन को जानबूझकर रोकने अथवा ऐसे गायन में लगे समूह के कार्यक्रम में व्यवधान डालने पर तीन साल तक की सजा, जुर्माना या दोनों का प्रावधान किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में 1986 के बिजो इमैनुएल बनाम केरल राज्य फैसले का उल्लेख किया। उस मामले में अदालत ने उन स्कूली बच्चों के अधिकारों की रक्षा की थी, जिन्होंने अपनी धार्मिक मान्यताओं के कारण राष्ट्रगान नहीं गाया था, लेकिन उसके दौरान सम्मानपूर्वक खड़े रहे थे। न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची ने संकेत दिया कि उस फैसले में स्थापित कानूनी सिद्धांत अभी भी लागू है। अदालत ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति अपनी अंतरात्मा या मौलिक अधिकारों के आधार पर राष्ट्रीय गीत गाने से इनकार करता है, तो उसके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई का सवाल संवैधानिक कसौटी पर देखा जा सकता है।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि राष्ट्रीय गीत के रूप में वंदे मातरम् की स्थिति या उसके कितने छंद गाए जाने चाहिए, इस पर अदालत अपनी ओर से कोई निर्णय नहीं देगी। पीठ के अनुसार, राष्ट्रीय गीत से जुड़ी नीति और व्यवस्था तय करना राज्य तथा लोकतांत्रिक प्रक्रिया का विषय है। अदालत का परीक्षण मुख्य रूप से इस बात तक सीमित रहेगा कि इसके पालन से जुड़े दंडात्मक प्रावधान मौलिक अधिकारों के अनुरूप हैं या नहीं।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिका का विरोध किया। उन्होंने कहा कि कानून बनाने की प्रक्रिया संवैधानिक व्यवस्था के तहत होती है और इस विषय पर उठाई गई आपत्तियों को उसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल की एक टिप्पणी को लेकर याचिकाकर्ता के वकील ने आपत्ति भी दर्ज कराई।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से याचिका पर जवाब दाखिल करने को कहा है। हालांकि, इस स्तर पर केंद्र को औपचारिक नोटिस जारी नहीं किया गया। सरकार को जवाब देने के लिए दो सप्ताह का समय दिया गया है।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने वंदे मातरम् के छंदों की संख्या या राष्ट्रीय गीत की सामग्री को लेकर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। मामले में केंद्र का जवाब आने के बाद इस पर अदालत की आगे की सुनवाई महत्वपूर्ण होगी।