प्रयागराज: यूजीसी-नेट 2026 की लॉ परीक्षा में पूछे गए एक प्रश्न को लेकर सामने आए विवाद पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) से जवाब मांगा है। अदालत ने विवादित प्रश्न तैयार करने वाले विषय विशेषज्ञ और उसकी मार्किंग स्कीम तैयार करने वाली समिति के सदस्यों से जुड़ी जानकारी अगली सुनवाई से पहले उपलब्ध कराने का निर्देश दिया है। मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर को होनी है।
न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की एकल पीठ ने यह आदेश अभ्यर्थी ऋतिक श्रीवास्तव की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याची ने अदालत के समक्ष स्वयं अपना पक्ष रखा। उसने बताया कि उसने यूजीसी-नेट लॉ परीक्षा में सभी 150 प्रश्नों के उत्तर दिए थे। विवाद प्रश्न संख्या 144 को लेकर है, जो भारतीय संविधान के संघीय स्वरूप से संबंधित था।
याची के अनुसार प्रश्न में पूछा गया था कि निम्नलिखित में से कौन-सी संघीय संविधान की विशेषता नहीं है। इसके लिए चार विकल्प दिए गए थे। इनमें पहला विकल्प शक्ति का पृथक्करण, दूसरा शक्ति का विभाजन, तीसरा लिखित एवं कठोर संविधान और चौथा कोर्ट की सर्वोच्चता था। याची ने प्रश्न के जवाब में चौथे विकल्प को चुना, जबकि एनटीए की ओर से पहले विकल्प को सही उत्तर माना गया।
अभ्यर्थी का तर्क है कि प्रश्न की भाषा स्पष्ट नहीं थी और दिए गए विकल्पों में एक से अधिक उत्तरों को सही माना जा सकता है। उसके मुताबिक, शक्ति का पृथक्करण और कोर्ट की सर्वोच्चता दोनों को लेकर संवैधानिक व्यवस्था के संदर्भ में सवाल उठता है। इसी आधार पर उसने एनटीए की उत्तर कुंजी पर आपत्ति जताई थी।
याची ने बताया कि उसने 18 अगस्त को एनटीए के पोर्टल पर विवादित प्रश्न को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी। हालांकि, उसके अनुसार इस आपत्ति का अपेक्षित समाधान नहीं हुआ। इसके बाद उसने हाईकोर्ट का रुख किया। याची का कहना है कि इस प्रश्न के मूल्यांकन का सीधा असर उसके अंतिम परिणाम पर पड़ा है।
याचिका के मुताबिक, अभ्यर्थी को परीक्षा में कुल 300 में से 202 अंक मिले हैं, जबकि संबंधित कटऑफ 204 अंक रही। याची का दावा है कि यदि विवादित प्रश्न के दो अंक उसे मिल जाते हैं तो उसका कुल स्कोर 204 हो जाता और वह जूनियर रिसर्च फेलोशिप (JRF) के लिए पात्र हो सकता था। इसी वजह से उसके लिए यह प्रश्न केवल एक सामान्य परीक्षा संबंधी आपत्ति नहीं, बल्कि परिणाम और पात्रता से जुड़ा महत्वपूर्ण मुद्दा है।
सुनवाई के दौरान एनटीए की ओर से परीक्षा सूचना पुस्तिका में दी गई मार्किंग स्कीम का हवाला दिया गया। इसमें बताया गया है कि परीक्षा के प्रश्नों को लेकर अभ्यर्थियों की ओर से दर्ज की जाने वाली चुनौतियों की समीक्षा विषय विशेषज्ञों से कराई जाती है। विशेषज्ञों की समीक्षा के आधार पर अंतिम उत्तर कुंजी तैयार की जाती है और परिणाम घोषित होने से पहले संशोधित अंतिम उत्तर कुंजी जारी की जाती है।
मार्किंग व्यवस्था में यह भी प्रावधान है कि यदि विशेषज्ञों की समीक्षा में किसी प्रश्न के एक से अधिक विकल्प सही पाए जाते हैं, तो सही विकल्प चुनने वाले संबंधित अभ्यर्थियों को अंक दिए जा सकते हैं। इसी प्रावधान को देखते हुए हाईकोर्ट ने मामले की पृष्ठभूमि और प्रश्न तैयार करने की प्रक्रिया को समझने के लिए एनटीए से अतिरिक्त जानकारी मांगी है।
अदालत ने कहा कि विवादित प्रश्न की प्रकृति और उस पर तैयार की गई मार्किंग स्कीम को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि प्रश्न तैयार करने की जिम्मेदारी किस विषय विशेषज्ञ को दी गई थी और मूल्यांकन संबंधी योजना किस समिति ने तैयार की थी। इसी के तहत एनटीए को संबंधित विषय विशेषज्ञ और मार्किंग स्कीम तैयार करने वाली समिति के सदस्यों का पूरा विवरण अदालत के समक्ष पेश करने का निर्देश दिया गया है।
कोर्ट ने एनटीए से इन विशेषज्ञों और समिति के सदस्यों के नाम, मोबाइल नंबर और पते की जानकारी अगली सुनवाई से पहले उपलब्ध कराने को कहा है। अदालत इस जानकारी के आधार पर यह समझने की कोशिश करेगी कि विवादित प्रश्न किस प्रक्रिया के तहत तैयार किया गया था और उसके सही उत्तर का निर्धारण किन विशेषज्ञों या समिति की राय के आधार पर किया गया।
फिलहाल हाईकोर्ट ने विवादित प्रश्न के सही उत्तर को लेकर कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं दिया है। अदालत के सामने मुख्य मुद्दा यह है कि प्रश्न वास्तव में अस्पष्ट था या नहीं और एनटीए की ओर से निर्धारित उत्तर को परीक्षा की घोषित मूल्यांकन प्रक्रिया के अनुरूप माना जा सकता है या नहीं। मामले की अगली सुनवाई 22 सितंबर को होगी, जहां एनटीए की ओर से मांगी गई जानकारी और स्पष्टीकरण के आधार पर आगे की कार्यवाही तय हो सकती है।