दवा के पर्चे हिंदी में लिखने की अपील, वायरल फोटो से मचा बवाल

तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री ब्रजेश पाठक की ओर से डॉक्टरों से मरीजों के पर्चे पर दवाओं के नाम हिंदी अथवा देवनागरी लिपि में लिखने की अपील के बीच सोशल मीडिया पर एक मेडिकल स्टोर की कथित दवा-पर्ची चर्चा का विषय बन गई है।

Advertisement
Gauravshali Bharat
Gauravshali Bharat News
  • September 27, 2026 9:44 pm IST, Published 2 hours ago

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री एवं स्वास्थ्य मंत्री ब्रजेश पाठक की ओर से डॉक्टरों से मरीजों के पर्चे पर दवाओं के नाम हिंदी अथवा देवनागरी लिपि में लिखने की अपील के बीच सोशल मीडिया पर एक मेडिकल स्टोर की कथित दवा-पर्ची चर्चा का विषय बन गई है। वायरल तस्वीर में गैस की दवा के साथ हिंदी में कुछ ऐसे शब्द लिखे दिखाई दे रहे हैं, जिनसे दवाओं की पहचान और मरीजों की सुरक्षा को लेकर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, वायरल तस्वीर की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

इस घटनाक्रम ने चिकित्सा क्षेत्र में हिंदी के इस्तेमाल, दवाओं के सही नाम लिखने और मरीजों को स्पष्ट निर्देश देने जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर नई बहस शुरू कर दी है।

स्वास्थ्य मंत्री ने डॉक्टरों को लिखा पत्र

ब्रजेश पाठक ने 25 सितंबर 2026 को प्रदेश के चिकित्सकों के नाम दो पन्नों का पत्र जारी किया। इसमें उन्होंने दवाओं और चिकित्सकीय जांचों के नाम हिंदी अथवा देवनागरी लिपि में लिखने का आग्रह किया। उन्होंने यह पत्र अपने आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट पर भी साझा किया। उनका कहना है कि मरीजों को यह जानकारी होनी चाहिए कि उन्हें कौन-सी दवा दी जा रही है और कौन-सी जांच कराने की सलाह दी गई है।

स्वास्थ्य मंत्री ने चिकित्सकों से मरीजों के साथ उनकी मातृभाषा में संवाद करने का भी आग्रह किया। उन्होंने विशेष रूप से अवधी और भोजपुरी जैसी स्थानीय भाषाओं का उल्लेख किया। इस पहल का उद्देश्य मरीजों और चिकित्सकों के बीच संवाद को अधिक सहज बनाना है।

मेडिकल स्टोर की कथित पर्ची पर उठे सवाल

इसी बीच सोशल मीडिया पर प्रसारित एक तस्वीर में दवाओं की पैकिंग पर लाल स्याही से हिंदी में कुछ शब्द लिखे दिखाई दे रहे हैं। तस्वीर के साथ किए गए दावे के अनुसार, एक मेडिकल स्टोर ने गैस की दवा के पैकेट पर कथित तौर पर ‘पादने की दवा’ लिख दिया।तस्वीर में दो अलग-अलग दवाओं की पैकिंग दिखाई दे रही है। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि तस्वीर किस मेडिकल स्टोर की है, इसे कब लिया गया और पैकेट पर लिखे शब्द किस व्यक्ति ने लिखे हैं।यह भी प्रमाणित नहीं हुआ है कि इस तस्वीर का स्वास्थ्य मंत्री की अपील से कोई प्रत्यक्ष संबंध है। इसलिए वायरल पोस्ट को किसी मेडिकल स्टोर की प्रमाणित घटना के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा।

हिंदी में दवा लिखने और अनुवाद करने में अंतर

स्वास्थ्य मंत्री की अपील के बाद एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आया है कि हिंदी में दवा लिखने का सही तरीका क्या होना चाहिए।

दवाओं के वैज्ञानिक और प्रचलित नामों को देवनागरी लिपि में लिखना तथा उनके नामों का मनमाने ढंग से अनुवाद करना दो अलग-अलग बातें हैं।

उदाहरण के लिए, किसी दवा का नाम हिंदी में लिखते समय उसकी पहचान, सक्रिय घटक और निर्धारित मात्रा स्पष्ट रहनी चाहिए। केवल बीमारी के सामान्य लक्षण के आधार पर दवा को कोई नया नाम देना मरीजों के लिए भ्रम पैदा कर सकता है।

किसी दवा का उपयोग कई अलग-अलग चिकित्सकीय परिस्थितियों में किया जा सकता है। ऐसे में उसके पैकेट पर केवल एक लक्षण लिख देने से उसकी सही पहचान नहीं हो सकती।

मरीजों को कैसे मिलेगा फायदा?

उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों और ग्रामीण स्वास्थ्य केंद्रों में बड़ी संख्या में ऐसे मरीज आते हैं, जिन्हें अंग्रेजी में लिखे चिकित्सकीय निर्देश समझने में परेशानी हो सकती है।

हिंदी में स्पष्ट निर्देश मिलने से मरीजों को यह समझने में सहायता मिल सकती है कि कौन-सी दवा कब लेनी है, कितनी मात्रा में लेनी है और इलाज के दौरान किन सावधानियों का पालन करना है।

हालांकि, केवल भाषा बदल देना पर्याप्त नहीं है। डॉक्टर की लिखावट स्पष्ट होना, दवा की सही मात्रा दर्ज करना और मरीज को उसके इस्तेमाल का तरीका समझाना भी उतना ही आवश्यक है।

डॉक्टरों के सामने व्यावहारिक चुनौतियां

हिंदी में पर्चे लिखने की पहल के साथ कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी जुड़ी हैं। चिकित्सा क्षेत्र में अनेक दवाओं और जांचों के नाम अंग्रेजी में प्रचलित हैं। उनके हिंदी लिप्यंतरण में एकरूपता बनाए रखना आवश्यक होगा।

इस पहल पर चिकित्सकों की ओर से व्यावहारिक कठिनाइयों का मुद्दा भी उठाया गया है। एक ही दवा के अलग-अलग ब्रांड उपलब्ध होने के कारण उसका सही नाम, सक्रिय घटक और मात्रा स्पष्ट लिखना जरूरी है। चिकित्सकों, फार्मासिस्टों और मरीजों के बीच दवा की पहचान को लेकर कोई भ्रम नहीं होना चाहिए।

डिजिटल पर्चे और कंप्यूटर आधारित प्रिस्क्रिप्शन भी इस दिशा में उपयोगी हो सकते हैं। इनमें दवाओं के नाम हिंदी और अंग्रेजी, दोनों भाषाओं में दर्ज करने की व्यवस्था विकसित की जा सकती है।

वायरल तस्वीर ने उठाया जिम्मेदारी का मुद्दा

सोशल मीडिया पर वायरल कथित दवा-पर्ची ने चिकित्सा संबंधी जानकारी साझा करने में जिम्मेदारी के महत्व को सामने रखा है।किसी दवा के बारे में मजाकिया या अस्पष्ट शब्द लिखने से मरीज उसके वास्तविक उपयोग को गलत समझ सकता है। दवाओं की पहचान उनके प्रमाणित नाम, सक्रिय घटक और चिकित्सकीय निर्देशों के आधार पर ही की जानी चाहिए। इसके अतिरिक्त सोशल मीडिया पर प्रसारित तस्वीरों की प्रामाणिकता की जांच करना भी जरूरी है। बिना पुष्टि के किसी मेडिकल स्टोर, चिकित्सक या संस्था को जिम्मेदार ठहराना भ्रामक हो सकता है।

क्या हिंदी में पर्चे लिखना अनिवार्य होगा?

फिलहाल ब्रजेश पाठक की ओर से सामने आया पत्र चिकित्सकों से किया गया आग्रह है। उपलब्ध रिपोर्टों में इसे सभी डॉक्टरों के लिए लागू किसी नए अनिवार्य सरकारी आदेश के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है।

स्वास्थ्य मंत्री ने मरीजों की सुविधा के साथ भारतीय भाषाओं के प्रयोग को बढ़ावा देने की बात कही है। इस पहल को प्रभावी बनाने के लिए दवाओं के मानकीकृत नाम, स्पष्ट चिकित्सकीय निर्देश और मरीजों को उनकी भाषा में सही जानकारी उपलब्ध कराने जैसे विषय महत्वपूर्ण होंगे।

वायरल तस्वीर की वास्तविकता चाहे जो भी हो, इस घटनाक्रम ने एक आवश्यक विषय पर ध्यान आकर्षित किया है। चिकित्सा संबंधी जानकारी ऐसी भाषा में उपलब्ध होनी चाहिए जिसे मरीज आसानी से समझ सके, लेकिन भाषा की सरलता के साथ दवाओं की सही पहचान और उपचार की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी आवश्यक है।

Advertisement