प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने धार्मिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक जमीन के इस्तेमाल से जुड़े एक मामले में स्पष्ट किया है कि किसी धर्म के अनुसार अंतिम संस्कार करने का अधिकार होने का मतलब यह नहीं है कि कोई समुदाय स्थानीय निकाय की किसी विशेष जमीन पर कब्रिस्तान बनाने की मांग कानूनी अधिकार के रूप में कर सकता है। अदालत ने कहा कि सार्वजनिक उपयोग के लिए निर्धारित भूमि के इस्तेमाल में बदलाव करना प्रशासन का विषय है और इस संबंध में फैसला लेते समय अधिकारियों को व्यापक जनहित को ध्यान में रखना चाहिए।
न्यायमूर्ति जे जे मुनीर और न्यायमूर्ति इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने क्रिश्चियन कम्युनिटी वेलफेयर सोसाइटी की याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। संस्था ने गाजियाबाद में दर्ज बंजर भूमि के एक हिस्से को ईसाई कब्रिस्तान के लिए इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दिए जाने के फैसले को चुनौती दी थी। याचिका सोसाइटी के अध्यक्ष विनय कुमार पाल के माध्यम से दाखिल की गई थी। यह संस्था सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन एक्ट, 1860 के तहत पंजीकृत है।
मामला गाजियाबाद की मोदी नगर तहसील के जलालाबाद परगना के अंतर्गत विसोखर गांव में स्थित 0.3420 हेक्टेयर जमीन से संबंधित था। राजस्व अभिलेखों में इस भूमि का दर्जा बंजर बताया गया है। याचिकाकर्ता संस्था ने अदालत के समक्ष दलील दी थी कि आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले ईसाई समुदाय के लोगों को मृत परिजनों का अंतिम संस्कार करने में परेशानी हो रही है। इसके पीछे वजह यह बताई गई कि बेगमाबाद बुढ़ाना स्थित ईसाई कब्रिस्तान में उपलब्ध जगह पर्याप्त नहीं रह गई है।
संस्था की ओर से यह भी कहा गया कि मोदी नगर नगर पालिका परिषद के बोर्ड ने 22 जनवरी 2018 को ईसाई कब्रिस्तान के लिए जमीन आवंटित करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी थी। याचिकाकर्ता का पक्ष था कि समुदाय की जरूरत को देखते हुए संबंधित जमीन को कब्रिस्तान के उपयोग में लाने की अनुमति दी जानी चाहिए। हालांकि, अदालत ने धार्मिक जरूरत और सार्वजनिक भूमि पर किसी विशेष समुदाय के दावे के बीच अंतर को स्पष्ट किया।
खंडपीठ ने कहा कि ग्राम सभा या स्थानीय निकाय के अधीन आने वाली भूमि के उपयोग में बदलाव संभव हो सकता है, लेकिन ऐसा निर्णय अपने आप नहीं लिया जा सकता। इसके लिए संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों को जमीन की स्थिति, स्थानीय परिस्थितियों और अन्य प्रासंगिक पहलुओं पर विचार करना होगा। साथ ही, यह देखना भी जरूरी है कि प्रस्तावित बदलाव से आम नागरिकों के हितों पर क्या प्रभाव पड़ेगा।
अदालत के अनुसार, यदि किसी क्षेत्र में कब्रिस्तान के लिए वास्तव में जगह की कमी है, तो संबंधित अधिकारी इस तरह के अनुरोध पर विचार कर सकते हैं। हालांकि, ऐसा विचार करना और मांग स्वीकार करना दो अलग-अलग बातें हैं। केवल आवश्यकता बताने से किसी समुदाय को स्थानीय निकाय की जमीन के किसी खास हिस्से पर अधिकार नहीं मिल जाता। भूमि के इस्तेमाल से जुड़ा निर्णय नियमानुसार और सार्वजनिक हित को ध्यान में रखकर लिया जाना चाहिए।
पीठ ने धार्मिक स्वतंत्रता के महत्व को स्वीकार करते हुए कहा कि अपने धर्म की मान्यताओं और परंपराओं के अनुसार अंतिम संस्कार करना धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा हो सकता है। लेकिन इस अधिकार के आधार पर किसी व्यक्ति या समुदाय को यह मांग करने का स्वतः कानूनी हक नहीं मिल जाता कि स्थानीय निकाय की एक निश्चित जमीन को उसी के लिए कब्रिस्तान के रूप में आरक्षित कर दिया जाए।
इस मामले में अदालत ने स्पष्ट किया कि धार्मिक आस्था और परंपराओं का सम्मान जरूरी है, लेकिन सार्वजनिक जमीन के आवंटन का प्रश्न प्रशासनिक प्रक्रिया तथा सामूहिक जनहित के आधार पर तय किया जाएगा। किसी विशेष समुदाय की आवश्यकता पर विचार करते समय अधिकारियों को दूसरे नागरिकों की जरूरतों और जमीन के संभावित सार्वजनिक उपयोग को भी ध्यान में रखना होगा।
इन्हीं तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट ने क्रिश्चियन कम्युनिटी वेलफेयर सोसाइटी की याचिका खारिज कर दी। अदालत की टिप्पणी का मुख्य आशय यह है कि धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार महत्वपूर्ण होने के बावजूद सार्वजनिक भूमि के किसी खास हिस्से पर कब्रिस्तान बनाने का स्वतः दावा स्थापित नहीं करता।