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केंद्र सरकार को हाईकोर्ट से झटका, पूर्व सैनिक की बढ़ी पेंशन का आदेश बरकरार

अदालत ने पेंशन के अधिकार से जुड़े कानूनी सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि पात्र व्यक्ति को मिलने वाली पेंशन को सरकारी कृपा या अनुग्रह राशि के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह निर्धारित नियमों और पात्रता के आधार पर मिलने वाला अधिकार है। ऐसे मामलों में देय राशि को केवल मनमाने ढंग से सीमित नहीं किया जा सकता। हालांकि, पेंशन और बकाया भुगतान का निर्धारण संबंधित मामले के तथ्यों, लागू नियमों और

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  • October 26, 2026 5:40 pm IST, Published 1 hour ago

चंडीगढ़: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने पूर्व सैनिक विनोद कुमार की दिव्यांगता पेंशन से जुड़े मामले में उन्हें राहत देते हुए केंद्र सरकार की याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने सशस्त्र बल न्यायाधिकरण के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें उनकी दिव्यांगता पेंशन 20 प्रतिशत के बजाय 50 प्रतिशत के आधार पर निर्धारित करने और बकाया राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया गया था। केंद्र सरकार ने इस आदेश को चुनौती देने के साथ बकाया भुगतान को पिछले तीन वर्षों तक सीमित रखने की मांग भी की थी, जिसे अदालत ने स्वीकार नहीं किया।

मामले की सुनवाई जस्टिस हरसिमरन सिंह सेठी और जस्टिस मिंदरजीत यादव की खंडपीठ ने की। पंचकूला निवासी विनोद कुमार ने भारतीय सेना में 21 साल से अधिक समय तक सेवाएं दी थीं। वह 30 नवंबर 2010 को सेना से सेवानिवृत्त हुए थे। उनकी दिव्यांगता पेंशन का निर्धारण 20 प्रतिशत दिव्यांगता के आधार पर किया गया था। बाद में इस मामले में सशस्त्र बल न्यायाधिकरण, चंडीगढ़ ने 11 मार्च 2026 को पेंशन संबंधी लाभ को 50 प्रतिशत के स्तर पर निर्धारित करने का आदेश दिया।

केंद्र सरकार ने हाईकोर्ट में इस फैसले पर आपत्ति जताई। सरकार की ओर से दलील दी गई कि विनोद कुमार की चिकित्सकीय जांच में रीढ़ की हड्डी से जुड़ी बीमारी के कारण उनकी दिव्यांगता 20 प्रतिशत आंकी गई थी। चिकित्सा बोर्ड ने इस बीमारी को न तो सैन्य सेवा से संबंधित माना था और न ही यह निष्कर्ष निकाला था कि सेना में सेवा देने के कारण बीमारी बढ़ी। सरकार का कहना था कि इन परिस्थितियों में न्यायाधिकरण द्वारा पेंशन लाभ बढ़ाने का आदेश उचित नहीं था।

हालांकि, हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों और लागू कानूनी सिद्धांतों पर विचार करने के बाद न्यायाधिकरण के आदेश में हस्तक्षेप करने का पर्याप्त आधार नहीं पाया। अदालत ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का भी उल्लेख किया। खंडपीठ ने माना कि केंद्र सरकार ऐसा कोई ठोस कानूनी या तथ्यात्मक आधार प्रस्तुत नहीं कर सकी, जिससे न्यायाधिकरण के फैसले को रद्द करना जरूरी हो।

इस मामले में बकाया पेंशन का मुद्दा भी महत्वपूर्ण रहा। केंद्र सरकार ने दलील दी थी कि याचिका दाखिल करने में हुई देरी को देखते हुए पूर्व सैनिक को पिछली अवधि का भुगतान केवल तीन वर्षों तक दिया जाना चाहिए। सरकार चाहती थी कि बकाया राशि की गणना इसी सीमा के भीतर की जाए। लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और न्यायाधिकरण के आदेश को बरकरार रखा।

अदालत ने पेंशन के अधिकार से जुड़े कानूनी सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि पात्र व्यक्ति को मिलने वाली पेंशन को सरकारी कृपा या अनुग्रह राशि के रूप में नहीं देखा जा सकता। यह निर्धारित नियमों और पात्रता के आधार पर मिलने वाला अधिकार है। ऐसे मामलों में देय राशि को केवल मनमाने ढंग से सीमित नहीं किया जा सकता। हालांकि, पेंशन और बकाया भुगतान का निर्धारण संबंधित मामले के तथ्यों, लागू नियमों और न्यायिक आदेशों के अनुसार ही किया जाता है।

हाईकोर्ट के फैसले के बाद विनोद कुमार को दिव्यांगता पेंशन 50 प्रतिशत के आधार पर निर्धारित करने संबंधी न्यायाधिकरण का आदेश कायम रहेगा। इसके साथ ही बकाया भुगतान को तीन साल तक सीमित करने की केंद्र सरकार की मांग भी खारिज हो गई। यह फैसला पूर्व सैनिक के लिए महत्वपूर्ण राहत है, क्योंकि इससे उनके पेंशन संबंधी दावे को न्यायिक समर्थन मिला है।

इस मामले ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि पूर्व सैनिकों की पेंशन से जुड़े विवादों में चिकित्सा आकलन, सेवा संबंधी परिस्थितियों और लागू कानूनी प्रावधानों की अहम भूमिका होती है। अदालत ने उपलब्ध तथ्यों के आधार पर न्यायाधिकरण के फैसले को कायम रखा और केंद्र सरकार की चुनौती का निपटारा कर दिया।

 

 

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