नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) में हर साल सर्दियों के मौसम के साथ गंभीर होने वाले वायु प्रदूषण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर चिंता जाहिर की है। दिवाली से पहले पटाखों के इस्तेमाल, उनके निर्माण, बिक्री और नियमों के पालन से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने केंद्र और संबंधित राज्य सरकारों को कई अहम सुझाव दिए। इस दौरान भारतीय क्रिकेटर विराट कोहली जैसे लोकप्रिय खिलाड़ियों और सार्वजनिक हस्तियों की मदद लेकर लोगों को जागरूक करने का सुझाव भी सामने आया।
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या केवल प्रतिबंध और सरकारी आदेश जारी करने से प्रदूषण की समस्या का समाधान संभव है, या इसके लिए समाज के हर वर्ग की सक्रिय भागीदारी भी जरूरी है?
विराट कोहली का नाम लेकर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
29 अक्टूबर 2026 को मामले की सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति पी.बी. वराले की पीठ ने कहा कि प्रदूषण के खिलाफ जागरूकता अभियान को प्रभावी बनाने के लिए देश की प्रतिष्ठित हस्तियों की मदद ली जा सकती है।
अदालत ने विशेष रूप से खेल जगत के लोकप्रिय चेहरों का उदाहरण देते हुए विराट कोहली जैसे क्रिकेटरों को इस अभियान से जोड़ने का सुझाव दिया। अदालत का मानना था कि जिन खिलाड़ियों को करोड़ों लोग पसंद करते हैं, उनकी अपील का आम जनता और विशेषकर युवाओं पर सकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है।
यह सुझाव केवल किसी क्रिकेटर तक सीमित नहीं था। अदालत ने कहा कि अलग-अलग क्षेत्रों में सम्मान पाने वाले सार्वजनिक व्यक्तित्व भी लोगों को जिम्मेदार तरीके से त्योहार मनाने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। हालांकि, अदालत ने विराट कोहली को कोई औपचारिक आदेश जारी कर अभियान में शामिल होने के लिए नहीं कहा। यह सरकार और संबंधित अधिकारियों के लिए एक सुझाव था कि वे लोकप्रिय हस्तियों के माध्यम से व्यापक जनजागरूकता अभियान चला सकते हैं।
हर साल आदेश, फिर भी प्रदूषण पर नियंत्रण क्यों नहीं?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर नाराजगी जाहिर की कि पटाखों को लेकर हर साल दिशा-निर्देश जारी किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनका पालन सुनिश्चित नहीं हो पाता।
पीठ ने टिप्पणी की कि अदालत के आदेशों का पालन होने के बजाय कई बार उनका उल्लंघन अधिक दिखाई देता है। ऐसे में बार-बार आदेश जारी करने का उद्देश्य तभी पूरा होगा, जब प्रशासन उन्हें प्रभावी तरीके से लागू भी करे।
अदालत ने संकेत दिया कि केवल कागजी प्रतिबंध लगाने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकल सकता। इसके लिए पुलिस, प्रशासन, प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों और संबंधित सरकारी विभागों को मिलकर काम करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने अधिकारियों से यह भी जानना चाहा कि पिछले वर्ष पटाखों को लेकर दी गई सीमित छूट के दौरान नियमों का पालन सुनिश्चित करने के लिए वास्तव में क्या कदम उठाए गए थे।
ग्रीन पटाखों के नाम पर धोखाधड़ी की आशंका
सुनवाई में ग्रीन पटाखों की बिक्री और उनकी वास्तविक गुणवत्ता को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए। अदालत के सामने यह मुद्दा रखा गया कि बाजार में कुछ उत्पादों को ग्रीन पटाखे बताकर बेचा जा रहा है, लेकिन उनकी वास्तविक पहचान और प्रमाणिकता की जांच करना आसान नहीं है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि कई उत्पादों पर लगे लेबल और क्यूआर कोड की विश्वसनीयता पर सवाल हैं। यदि किसी सामान्य पटाखे को ग्रीन पटाखे के नाम पर बेच दिया जाता है, तो उपभोक्ताओं के साथ धोखाधड़ी होने के साथ पर्यावरण को भी नुकसान पहुंच सकता है।
ग्रीन पटाखों का उद्देश्य पारंपरिक पटाखों की तुलना में प्रदूषणकारी उत्सर्जन कम करना है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि वे पूरी तरह प्रदूषण मुक्त हैं। इसलिए उनकी गुणवत्ता, निर्माण प्रक्रिया और बिक्री पर निगरानी जरूरी है। अदालत के सामने यह भी चिंता रखी गई कि नियमों का उल्लंघन करने वाले निर्माताओं और विक्रेताओं के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
बच्चों और युवाओं को जागरूक करने पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने प्रदूषण नियंत्रण के लिए नई पीढ़ी को जागरूक बनाने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। अदालत का मानना था कि बच्चों को पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों के बारे में सही जानकारी दी जानी चाहिए।
स्कूलों, कॉलेजों और शैक्षणिक संस्थानों के माध्यम से ऐसे अभियान चलाए जा सकते हैं, जिनमें विद्यार्थियों को बताया जाए कि पटाखों से निकलने वाला धुआं, सूक्ष्म कण और जहरीले तत्व सांस संबंधी समस्याओं तथा अन्य स्वास्थ्य जोखिमों को बढ़ा सकते हैं।
यदि बच्चे स्वयं पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार व्यवहार अपनाते हैं, तो वे अपने परिवार और आसपास के लोगों को भी जागरूक कर सकते हैं। इसी उद्देश्य से अदालत ने टेलीविजन, समाचार पत्रों और दूसरे प्रचार माध्यमों के जरिए व्यापक जागरूकता अभियान चलाने की आवश्यकता बताई।
पूर्ण प्रतिबंध या संतुलित व्यवस्था, क्या है अदालत का रुख?
सुनवाई का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी रहा कि सुप्रीम कोर्ट फिलहाल दिल्ली-NCR में पटाखों पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने के पक्ष में नहीं दिखाई दिया। अदालत ने त्योहारों से जुड़ी लोगों की भावनाओं को समझते हुए संतुलित व्यवस्था की आवश्यकता बताई।
पीठ का मानना था कि पर्यावरण और जनस्वास्थ्य की सुरक्षा के साथ लोगों की धार्मिक एवं सांस्कृतिक भावनाओं का भी ध्यान रखा जाना चाहिए। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि नियमों के उल्लंघन को नजरअंदाज किया जाए।
अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया कि यदि संबंधित अधिकारी प्रतिबंधों और निर्धारित नियमों को जमीन पर लागू नहीं करते हैं, तो भविष्य में उसे अधिक कठोर रुख अपनाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है।
इस सुनवाई के दौरान अदालत ने अपना आदेश सुरक्षित रख लिया। इसलिए पटाखों के इस्तेमाल को लेकर अंतिम व्यवस्था के संबंध में अदालत के आदेश का इंतजार करना जरूरी है।
दिल्ली-NCR के लोगों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
दिल्ली और आसपास के शहरों में अक्टूबर से जनवरी के बीच वायु गुणवत्ता अक्सर चिंता का विषय बन जाती है। मौसम में बदलाव, वाहनों से निकलने वाला धुआं, निर्माण गतिविधियां, औद्योगिक उत्सर्जन, पराली जलाना और पटाखों का धुआं मिलकर प्रदूषण की स्थिति को और गंभीर बना सकते हैं।
इसका प्रभाव केवल बाहर काम करने वाले लोगों पर ही नहीं, बल्कि बच्चों, बुजुर्गों और पहले से सांस संबंधी परेशानी झेल रहे लोगों पर भी पड़ सकता है।
ऐसे में प्रदूषण नियंत्रण को केवल दिवाली या सर्दियों तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए पूरे वर्ष लगातार निगरानी, नियमों का पालन और नागरिकों की भागीदारी आवश्यक है।
क्या विराट कोहली की अपील बदल सकती है लोगों की सोच?
विराट कोहली देश के सबसे लोकप्रिय क्रिकेटरों में शामिल हैं। खेल के मैदान पर उनकी उपलब्धियों के कारण बड़ी संख्या में युवा उन्हें अपना आदर्श मानते हैं। ऐसे में यदि लोकप्रिय खिलाड़ी पर्यावरण संरक्षण और स्वच्छ हवा का संदेश देते हैं, तो इसका व्यापक सामाजिक प्रभाव हो सकता है।
हालांकि, किसी एक सेलिब्रिटी की अपील से प्रदूषण की समस्या समाप्त नहीं हो सकती। इसके लिए सरकार को सख्त निगरानी व्यवस्था बनानी होगी, अवैध पटाखों की बिक्री पर कार्रवाई करनी होगी और नागरिकों को भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी का व्यापक संदेश यही है कि स्वच्छ हवा केवल सरकारी आदेशों से नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और सामाजिक सहयोग से सुनिश्चित हो सकती है। दिवाली की खुशियां मनाते समय पर्यावरण और दूसरों के स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है।