हालांकि उन्होंने गठबंधन के भीतर मतभेदों की बात स्वीकार करते हुए कुछ नेताओं की भूमिका पर भी सवाल उठाए। राणे ने राजनीतिक तंज कसते हुए कहा कि तीन दलों की सरकार में कभी-कभी ऐसी परिस्थितियां बन जाती हैं और गठबंधन के भीतर भी कुछ लोग शकुनि मामा जैसी भूमिका निभा रहे हैं। बीजेपी के आरोपों के बाद शिवसेना ने भी पलटवार किया। पुणे में पार्टी नेता रवींद्र धंगेकर ने बीजेपी प्रवक्ता नवनीत बान पर तीखी टिप्पणी की और उन पर पैसे लेकर काम करने का आरोप लगाया। धंगेकर ने दावा किया कि गठबंधन की हार की असली वजह जनता के बीच बीजेपी को लेकर बढ़ती नाराजगी है। उन्होंने बीजेपी के उम्मीदवार के चयन पर भी सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि पार्टी ने ऐसे व्यक्ति को चुनाव मैदान में उतारा, जिसकी छवि उसके राजनीतिक प्रतिनिधित्व के अनुकूल नहीं थी। धंगेकर के अनुसार, मौजूदा सरकार के कामकाज से भी लोगों में असंतोष पैदा हो रहा है।
धंगेकर ने सत्ता की कमान पूरी तरह एकनाथ शिंदे को सौंपने की मांग भी उठाई। उनका तर्क है कि शिंदे के नेतृत्व में शुरू की गई योजनाओं, खासकर महिलाओं के लिए चलाई जा रही ‘लाडकी बहिन योजना’ को जनता के बीच समर्थन मिला है। ऐसे में सरकार की पूरी जिम्मेदारी शिंदे को दी जानी चाहिए। इस बयान से महायुति के भीतर नेतृत्व और सत्ता में हिस्सेदारी को लेकर चल रही खींचतान भी चर्चा में आ गई है। महाराष्ट्र सरकार में मंत्री उदय सामंत ने भी बीजेपी की चुनावी रणनीति पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि बीजेपी अपने पारंपरिक मतदाताओं को भी एकजुट रखने में सफल नहीं रही। सामंत ने नागपुर में पार्टी के करीब नौ हजार वोट कम होने का दावा किया। उनका कहना था कि तीनों सहयोगी दल यदि आपसी तालमेल के साथ चुनाव लड़ें तो बेहतर परिणाम मिल सकते हैं। उन्होंने पुणे में स्मिता जाधव के समर्थन में शिवसेना नेताओं द्वारा प्रचार किए जाने का भी उल्लेख किया और स्थानीय स्तर पर पार्टी के फैसलों का बचाव किया।
सामंत ने यह भी संकेत दिया कि यदि एकनाथ शिंदे अनुमति देते हैं तो शिवसेना के नेता गठबंधन से जुड़े विवादों पर चर्चा के लिए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर सकते हैं। इससे साफ है कि सहयोगी दलों के बीच बढ़ते मतभेद को अब केंद्रीय नेतृत्व के स्तर पर सुलझाने की जरूरत महसूस की जा रही है|विवाद बढ़ता देख मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने अपनी पार्टी के नेताओं और प्रवक्ताओं को सहयोगी दलों के खिलाफ सार्वजनिक बयानबाजी से बचने का निर्देश दिया है। देर रात हुई बैठक में उन्होंने स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं से चुनाव के दौरान हुई गलतियों की विस्तृत रिपोर्ट भी मांगी। शिंदे ने साफ किया कि गठबंधन के भीतर सार्वजनिक रूप से होने वाली बयानबाजी का फायदा विपक्षी दलों को मिल सकता है।
दूसरी तरफ बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व ने भी महाराष्ट्र बीजेपी अध्यक्ष रवींद्र चव्हाण से पूरे घटनाक्रम पर जवाब मांगा है। पार्टी के वरिष्ठ नेता गठबंधन में पैदा हुई नाराजगी को दूर करने के लिए जल्द ही आपात बैठक कर सकते हैं। फिलहाल महायुति के सामने सबसे बड़ी चुनौती आपसी विश्वास बहाल करने की है। चुनावी नतीजों के बाद शुरू हुई बयानबाजी ने गठबंधन की एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना होगा कि बीजेपी, शिवसेना और एनसीपी अपने मतभेदों को बातचीत से सुलझा पाते हैं या महाराष्ट्र की सत्ता में साझेदारी को लेकर यह खींचतान आगे भी जारी रहती है।