नई दिल्ली। त्योहारों के मौसम में घर जाने की तैयारी कर रहे हवाई यात्रियों के लिए टिकटों की बढ़ती कीमतें बड़ी परेशानी बन गई हैं। दिवाली और अन्य प्रमुख त्योहारों के आसपास घरेलू उड़ानों के किराये में भारी बढ़ोतरी का मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गया है। यात्रियों को राहत दिलाने और हवाई टिकटों की कीमतों पर नियंत्रण लगाने की मांग को लेकर दायर याचिका पर 2 नवंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में तत्काल सुनवाई की मांग की गई। हालांकि, अदालत ने इस मामले को तुरंत सुनने से इनकार कर दिया। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति विक्रम नाथ की पीठ की ओर से की गई टिप्पणी, ‘हवाई यात्रा मत कीजिए’, ने इस पूरे मामले को चर्चा का विषय बना दिया है।
त्योहारों के समय हवाई किराये में कथित तौर पर 700 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी का मुद्दा केवल यात्रियों की जेब पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे विमानन क्षेत्र में किराया निर्धारण की पारदर्शिता और आम नागरिकों के हितों को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि दिवाली के आसपास घरेलू हवाई मार्गों पर टिकटों की कीमतों में सामान्य किराये की तुलना में दो से सात गुना तक बढ़ोतरी देखी जा रही है। कुछ मामलों में यह वृद्धि 700 प्रतिशत तक पहुंचने का दावा किया गया है।
अधिवक्ता ने दलील दी कि हवाई यात्रा आज के समय में केवल विलासिता का साधन नहीं रह गई है। रोजगार, शिक्षा, चिकित्सा, पारिवारिक जिम्मेदारियों और आपातकालीन परिस्थितियों में लोगों को हवाई यात्रा की आवश्यकता पड़ती है। ऐसे में त्योहारों के दौरान टिकटों की कीमतों में अचानक भारी वृद्धि आम यात्रियों के लिए गंभीर समस्या पैदा करती है।
याचिकाकर्ता के पक्ष ने इस स्थिति को संविधान के अनुच्छेद 14 में दिए गए समानता के अधिकार के संदर्भ में भी उठाया। उनका तर्क था कि आवश्यक परिस्थितियों में यात्रा करने वाले नागरिकों को अत्यधिक महंगे किराये का सामना करना पड़ता है।
2 नवंबर को न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, न्यायमूर्ति संदीप मेहता और न्यायमूर्ति अपरेश कुमार सिंह की पीठ के समक्ष मामले को तत्काल सूचीबद्ध करने की मांग रखी गई।
अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि हवाई किराये में 700 प्रतिशत तक वृद्धि हुई है और त्योहारों का समय होने के कारण यात्रियों को तत्काल राहत की जरूरत है। इस पर पीठ ने टिप्पणी की, ‘हवाई यात्रा मत कीजिए।’ इसके बाद अदालत ने मामले को तत्काल सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने से इनकार कर दिया और अगले मामले की ओर बढ़ गई।
यह स्पष्ट करना जरूरी है कि अदालत ने इस टिप्पणी के माध्यम से हवाई किराये को उचित या अनुचित घोषित करने वाला कोई अंतिम फैसला नहीं सुनाया है। मामले में किराया नियंत्रण की मांग और उससे जुड़े कानूनी पहलुओं पर आगे सुनवाई होनी बाकी है।
हवाई किराये में अनियमित बढ़ोतरी का मुद्दा पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में लंबित जनहित याचिका का हिस्सा है। सामाजिक कार्यकर्ता एस. लक्ष्मीनारायण की ओर से दायर इस याचिका में विमानन क्षेत्र में यात्रियों के हितों की रक्षा के लिए एक मजबूत और स्वतंत्र नियामक व्यवस्था बनाने की मांग की गई है।
याचिका में आरोप लगाया गया है कि निजी विमानन कंपनियां मांग और उपलब्ध सीटों के आधार पर डायनेमिक प्राइसिंग (Dynamic Pricing) का इस्तेमाल करती हैं। इसके कारण एक ही उड़ान और एक ही मार्ग का किराया कुछ ही समय के अंतराल में काफी बदल सकता है।
याचिकाकर्ता ने त्योहारों के दौरान किराये पर अस्थायी सीमा तय करने की मांग भी की है। इसके अलावा, हवाई टिकटों के मूल्य निर्धारण की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने और यात्रियों से लिए जाने वाले अतिरिक्त शुल्क की समीक्षा करने की मांग उठाई गई है।
इस मामले में अगली सुनवाई 16 नवंबर 2026 को निर्धारित है। याचिकाकर्ता का कहना है कि त्योहारों के दौरान यात्रा की जरूरत पहले से पता होती है, इसलिए सरकार और संबंधित विमानन नियामक संस्थाओं को समय रहते प्रभावी कदम उठाने चाहिए।
याचिका में हवाई किराये में बढ़ोतरी को समझाने के लिए कुछ घरेलू उड़ानों के उदाहरण भी पेश किए गए हैं। इनमें दिल्ली से कोलकाता के बीच सामान्य दिनों में लगभग 10 से 11 हजार रुपये में मिलने वाले टिकट का किराया 6 नवंबर की यात्रा के लिए 78,694 रुपये तक पहुंचने का दावा किया गया है।
इसी तरह बेंगलुरु से दिल्ली की उड़ान के लिए अलग-अलग समय पर किराये में बड़े अंतर का उल्लेख किया गया है। याचिका के मुताबिक, 6 नवंबर को सुबह 5 बजे की उड़ान का टिकट लगभग 15,901 रुपये में उपलब्ध था, जबकि उसी दिन दोपहर 3:45 बजे की उड़ान का किराया करीब 40,506 रुपये बताया गया।
मुंबई से दिल्ली और दिल्ली से मुंबई के हवाई किराये में भी बड़े अंतर के उदाहरण दिए गए हैं। याचिका में मुंबई से दिल्ली के टिकट की कीमत 11,531 रुपये से बढ़कर 60,577 रुपये और दिल्ली से मुंबई के टिकट की कीमत 5,223 रुपये से बढ़कर 26,793 रुपये होने का दावा किया गया है।
हालांकि, ये आंकड़े याचिका में प्रस्तुत उदाहरण हैं। इन्हें सभी एयरलाइंस और सभी उड़ानों के लिए लागू सामान्य किराया नहीं माना जाना चाहिए। टिकट की कीमत यात्रा की तारीख, बुकिंग के समय, उपलब्ध सीटों और उड़ान की मांग के अनुसार बदल सकती है।
विमानन कंपनियां आमतौर पर टिकटों की कीमत निर्धारित करने के लिए डायनेमिक प्राइसिंग मॉडल का इस्तेमाल करती हैं। इस व्यवस्था में मांग, उपलब्ध सीटों, बुकिंग के समय और परिचालन संबंधी परिस्थितियों के आधार पर किराये में बदलाव किया जाता है।
सामान्य परिस्थितियों में यह व्यवस्था कंपनियों को सीटों की उपलब्धता और बाजार की मांग के अनुसार कीमतें निर्धारित करने की सुविधा देती है। लेकिन त्योहारों, छुट्टियों और आपातकालीन परिस्थितियों में जब यात्रियों की संख्या अचानक बढ़ जाती है, तब टिकटों की कीमतें काफी ऊपर जा सकती हैं।
याचिकाकर्ता ने इसी व्यवस्था की पारदर्शिता पर सवाल उठाया है। उनका कहना है कि एक ही मार्ग पर एक ही दिन उड़ान संचालित करने वाली कंपनियों के टिकटों की कीमतों में इतना अंतर क्यों होता है कि सामान्य यात्री के लिए यात्रा करना मुश्किल हो जाए।
याचिका में यह भी कहा गया है कि विमानन कंपनियां ईंधन की बढ़ती कीमतों को किराये में वृद्धि का कारण बताती हैं, लेकिन एक ही दिन और एक ही मार्ग पर संचालित होने वाली उड़ानों के किराये में भारी अंतर को केवल ईंधन की लागत से उचित नहीं ठहराया जा सकता।
याचिका में केवल हवाई टिकटों के किराये का मुद्दा नहीं उठाया गया है, बल्कि यात्रियों को मिलने वाली मुफ्त चेक-इन बैगेज सुविधा का विषय भी शामिल किया गया है।
याचिकाकर्ता ने घरेलू इकोनॉमी क्लास के यात्रियों के लिए पहले उपलब्ध 25 किलोग्राम मुफ्त चेक-इन सामान की सुविधा बहाल करने की मांग की है। उनका कहना है कि इसे घटाकर 15 किलोग्राम किए जाने से यात्रियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है।
त्योहारों के दौरान लोग अपने परिवार के लिए उपहार, कपड़े और अन्य घरेलू सामान लेकर यात्रा करते हैं। ऐसे में मुफ्त सामान की सीमा कम होने पर उन्हें अतिरिक्त बैगेज शुल्क देना पड़ता है।
याचिका में मांग की गई है कि त्योहारों के दौरान यात्रियों को राहत देने के लिए मुफ्त सामान की सीमा को फिर से 25 किलोग्राम किया जाए।
हवाई किराये को लेकर बढ़ती बहस के बीच केंद्र सरकार ने विमानन क्षेत्र के नियमन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। 1 नवंबर 2026 को भारतीय वायुयान नियम, 2026 अधिसूचित किए गए हैं। ये नियम 1 जनवरी 2027 से प्रभावी होंगे।
नए नियमों के तहत सरकार को असाधारण परिस्थितियों में जनहित को ध्यान में रखते हुए विमानन कंपनियों के किराये के संबंध में निर्देश जारी करने का अधिकार दिया गया है। इसके साथ ही विमानन कंपनियों को परिचालन लागत और अन्य निर्धारित कारकों को ध्यान में रखते हुए किराया तय करने तथा संबंधित टैरिफ की जानकारी नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) को देने का प्रावधान किया गया है।
इस नए नियामक ढांचे को विमानन क्षेत्र में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि, नए नियमों के लागू होने से घरेलू उड़ानों के किराये पर तत्काल कोई निश्चित अधिकतम सीमा लागू होने की बात नहीं कही जा सकती।
केंद्र सरकार की ओर से पहले सुप्रीम कोर्ट को बताया गया था कि भारतीय वायुयान अधिनियम, 2024 के तहत विमानन क्षेत्र के लिए नए नियम तैयार किए जा रहे हैं। 16 अक्टूबर की सुनवाई में सरकार ने नियमों को लेकर प्रशासनिक मंजूरी मिलने की जानकारी दी थी। अदालत ने सरकार से अगली सुनवाई पर अधिसूचित नियमों को पेश करने के लिए कहा था।
भारत में हवाई यात्रा का विस्तार तेजी से हुआ है। छोटे शहरों को बड़े महानगरों से जोड़ने के लिए नई उड़ानें शुरू हुई हैं। मध्यम वर्ग के लिए भी हवाई यात्रा पहले की तुलना में अधिक सुलभ हुई है। लेकिन त्योहारों और छुट्टियों के समय टिकटों की कीमतों में अचानक होने वाली बढ़ोतरी इस सुविधा को महंगा बना देती है।
विशेष रूप से ऐसे परिवार प्रभावित होते हैं जिन्हें शादी, बीमारी, पारिवारिक कार्यक्रम या किसी अन्य जरूरी कारण से अचानक यात्रा करनी पड़ती है। कई बार रेलगाड़ियों में आरक्षित सीटें उपलब्ध नहीं होतीं और बस यात्रा में काफी समय लगता है। ऐसे में हवाई यात्रा ही सुविधाजनक विकल्प बचती है।
यात्रियों का मानना है कि कंपनियों को व्यावसायिक लाभ कमाने का अधिकार है, लेकिन किराया निर्धारण की व्यवस्था इतनी पारदर्शी होनी चाहिए कि किसी विशेष अवसर पर यात्रियों को असामान्य आर्थिक दबाव का सामना न करना पड़े।
सुप्रीम कोर्ट में 16 नवंबर 2026 को होने वाली अगली सुनवाई इस मामले में महत्वपूर्ण मानी जा रही है। अदालत के सामने हवाई किराये में अचानक होने वाली बढ़ोतरी, डायनेमिक प्राइसिंग, अतिरिक्त शुल्क और यात्रियों के अधिकारों से जुड़े मुद्दे हैं।
अब देखना होगा कि सरकार नए विमानन नियमों के माध्यम से यात्रियों को किस तरह की सुरक्षा और राहत देती है तथा अदालत इस मामले में आगे क्या रुख अपनाती है।
फिलहाल इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या त्योहारों के समय हवाई यात्रा आम नागरिकों की पहुंच से बाहर होती जा रही है? हवाई टिकटों की कीमतों में पारदर्शिता और उचित नियंत्रण की मांग के बीच लाखों यात्रियों को उम्मीद है कि आने वाले समय में उन्हें राहत मिलेगी।
निष्कर्ष: हवाई किराये में 700 प्रतिशत तक वृद्धि का दावा और सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने विमानन क्षेत्र में किराया निर्धारण की व्यवस्था पर राष्ट्रीय बहस छेड़ दी है। अब यात्रियों की निगाहें 16 नवंबर की सुनवाई और नए विमानन नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन पर रहेंगी।