भारत महान है। यहां हर मौसम में कुछ न कुछ उगता रहता है कभी आंदोलन, कभी मोर्चा, कभी गठबंधन और कभी नया ट्रेंड। पहले लोग राजनीतिक दल बनाते थे, अब सीधे हैशटैग बना लेते हैं। पहले कार्यकर्ता सड़कों पर नारे लगाते थे, अब इंस्टाग्राम रील बनाकर क्रांति कर देते हैं। लोकतंत्र का विकास इतना हो चुका है कि अब देश में राजनीतिक विचारधारा से ज्यादा मीम विचारधारा प्रभावी दिखाई देने लगी है।
इसी आधुनिक लोकतांत्रिक प्रयोगशाला से निकला है कॉकरोच जनता पार्टी। नाम सुनते ही लगता है मानो किसी कीटनाशक कंपनी ने चुनाव लड़ने का फैसला कर लिया हो। लेकिन नहीं, यह राजनीति का नया डिजिटल अवतार है। फर्क सिर्फ इतना है कि बाकी पार्टियां पांच साल में सक्रिय होती हैं, जबकि यह पार्टी रात के अंधेरे में अचानक सोशल मीडिया पर प्रकट हो जाती है, बिल्कुल उसी तरह जैसे रसोई घर की लाइट जलाते ही कॉकरोच दिखाई देते हैं।
यह पार्टी असली है या नकली, संगठन है या व्यंग्य, आंदोलन है या मीम इसका फैसला अभी तक देश के राजनीतिक वैज्ञानिक भी नहीं कर पाए हैं। लेकिन इतना तय है कि उसने नेताओं, न्यायपालिका, मीडिया और युवाओं सबको एक ही प्लेटफॉर्म पर ला खड़ा किया है।
पूरा विवाद तब शुरू हुआ जब भारत के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की एक टिप्पणी सोशल मीडिया पर वायरल हो गई। उन्होंने कथित रूप से कहा कि कुछ लोग कॉकरोच की तरह व्यवस्था में घुस जाते हैं और फिर संस्थाओं पर हमला करने लगते हैं। बस फिर क्या था, देश के युवाओं ने सोचा कि जब रोजगार नहीं मिला तो कम से कम प्रजाति ही बदल लेते हैं। देखते ही देखते कॉकरोच जनता पार्टी ट्रेंड करने लगी।
राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने इसे गंभीरता से लेने की सलाह दी। उनका कहना था कि इस आंदोलन को हल्के में लेना भूल होगी। अब प्रशांत किशोर का बयान सुनकर ऐसा लगा मानो देश में अगला चुनाव इंसानों और कॉकरोचों के बीच होने वाला हो। शायद आने वाले समय में घोषणापत्र भी कुछ ऐसा हो हर रसोई में सम्मान, हर नाली में अधिकार।
भाजपा नेता सुकांत मजूमदार ने दावा किया कि इस पार्टी के 49 प्रतिशत फॉलोअर्स पाकिस्तान से हैं और भारत से केवल 9 प्रतिशत। यह सुनकर देश का आम नागरिक सोच में पड़ गया कि आखिर बाकी 42 प्रतिशत कॉकरोच कहां के हैं? संभवतः संयुक्त राष्ट्र को अब अंतरराष्ट्रीय कॉकरोच जनगणना शुरू करनी पड़ेगी।
वहीं राजीव चंद्रशेखर ने इसे क्रॉस बॉर्डर इन्फ्लुएंस ऑपरेशन बताया। यानी अब युद्ध केवल सीमा पर नहीं, इंस्टाग्राम की स्टोरी और ट्विटर के मीम में भी लड़ा जाएगा। आने वाले समय में शायद रक्षा मंत्रालय को भी डिजिटल कॉकरोच रोधी योजना बनानी पड़े।
दूसरी ओर युवाओं का कहना है कि यह आंदोलन बेरोजगारी, पेपर लीक और व्यवस्था के खिलाफ उनकी आवाज है। बेरोजगार युवा भी अब समझ चुके हैं कि नौकरी तो मिलेगी नहीं, इसलिए कम से कम ट्रेंड ही बना लिया जाए। पहले युवा सरकारी परीक्षा की तैयारी करते थे, अब हैशटैग ट्रेंड कराने की रणनीति बनाते हैं।
इस बीच अन्ना हज़ारे ने पारदर्शिता की बात करते हुए कहा कि हर डिजिटल अभियान की जांच होनी चाहिए। अन्ना जी का बयान सुनकर ऐसा लगा जैसे अब लोकपाल के बाद लोक कीटनाशक कानून भी आना बाकी है। कवि और वक्ता कुमार विश्वास ने भी इस मुद्दे पर तंज कसते हुए कहा, अगर कॉकरोच है तो हिट भी है, इलाज हो जाएगा। उन्होंने बचपन की याद दिलाते हुए कहा कि कॉकरोच अंधेरे में रहता है और झुंड में चलता है। अब सोशल मीडिया पर लोगों ने इसका अर्थ अपने अपने हिसाब से निकाल लिया। कुछ ने इसे राजनीति पर हमला माना, तो कुछ ने इसे विपक्ष का चरित्र चित्रण समझ लिया।
कॉकरोच जनता पार्टी से जुड़े अभिजीत दिपके का नाम भी अचानक राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन गया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार वे पहले आम आदमी पार्टी की सोशल मीडिया टीम से जुड़े थे और अब अमेरिका में पढ़ाई कर रहे हैं। भारतीय राजनीति भी कमाल है यहां नेता विदेश जाकर पढ़ाई करते हैं और देश में मीम क्रांति शुरू हो जाती है।
भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने उन पर विदेशी समर्थन लेने के आरोप लगाए। अब भारतीय राजनीति में यह नया दौर है जहां हर वायरल पोस्ट के पीछे या तो विदेशी ताकत होती है या आईटी सेल। आम जनता केवल मोबाइल पकड़े बैठी रहती है और सोचती है कि आखिर असली कॉकरोच कौन है।
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज्यादा परेशान शायद असली कॉकरोच होंगे। वर्षों से वे चुपचाप नालियों और रसोईघरों में अपना जीवन व्यतीत कर रहे थे, लेकिन अब उनका नाम सीधे राष्ट्रीय राजनीति से जुड़ गया है। संभव है कि जल्द ही पशु अधिकार संगठन उनके सम्मान में भी कोई याचिका दायर कर दें।
देश में पहले जाति आधारित राजनीति थी, फिर धर्म आधारित राजनीति आई, उसके बाद क्षेत्रीय राजनीति आई और अब कीट आधारित राजनीति का नया अध्याय खुल चुका है। भविष्य में शायद चुनाव आयोग को भी नए चुनाव चिन्ह जारी करने पड़ें स्प्रे मशीन, चप्पल या कीटनाशक।
कॉकरोच जनता पार्टी भले ही एक सोशल मीडिया ट्रेंड हो, लेकिन इसने भारतीय लोकतंत्र का नया चेहरा दिखा दिया है। यहां अब आंदोलन धरनों से कम और मीम से ज्यादा चलते हैं। नेता प्रेस कॉन्फ्रेंस से ज्यादा ट्विटर स्पेस में सक्रिय हैं और जनता विचारधारा से ज्यादा वायरल कंटेंट पर भरोसा करने लगी है।
यह पूरा विवाद हमें यह भी बताता है कि आज के दौर में राजनीति और मनोरंजन के बीच की रेखा लगभग समाप्त हो चुकी है। लोकतंत्र अब संसद से निकलकर मोबाइल स्क्रीन में बस चुका है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले जनता नेता चुनती थी, अब ट्रेंड चुनती है। और शायद यही आधुनिक भारत की सबसे बड़ी विडंबना भी है देश की सबसे गंभीर बहसें अब हैशटैग और मीम के सहारे चल रही हैं, जबकि असली मुद्दे किसी कोने में चुपचाप बैठे अगली वायरल घटना का इंतजार कर रहे हैं।
धीरज कश्यप