काठमांडू/नई दिल्ली : भारत और नेपाल के बीच लंबे समय से चले आ रहे सीमा विवाद को लेकर हाल के दिनों में पैदा हुए राजनीतिक विवाद के बीच नेपाल सरकार ने अपने रुख को स्पष्ट करने की कोशिश की है। नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली (बालेन शाह नहीं, जैसा कुछ रिपोर्टों में उल्लेख किया गया) के हालिया बयान के बाद दोनों देशों के बीच कूटनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई थी। अब नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने संसद में बयान देकर यह स्पष्ट किया है कि नेपाल-भारत सीमा विवाद का समाधान केवल द्विपक्षीय बातचीत के माध्यम से ही संभव है और नेपाल किसी तीसरे देश की मध्यस्थता नहीं चाहता।
नेपाल के इस स्पष्टीकरण को भारत के साथ संबंधों में आई असहजता को दूर करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। विदेश मंत्री ने संसद में कहा कि नेपाल हमेशा से यह मानता रहा है कि भारत और नेपाल के बीच मौजूद सभी विवादों का समाधान आपसी संवाद, ऐतिहासिक समझौतों और कूटनीतिक प्रक्रिया के जरिए किया जाना चाहिए।
विवाद की शुरुआत कैसे हुई
दरअसल, पिछले महीने नेपाल के प्रधानमंत्री के एक बयान ने राजनीतिक और कूटनीतिक हलकों में हलचल मचा दी थी। उन्होंने कहा था कि भारत के साथ सीमा विवाद को सुलझाने के लिए नेपाल चीन और ब्रिटेन जैसे देशों से भी ऐतिहासिक दस्तावेजों और तथ्यों के संबंध में सहयोग ले सकता है। इस बयान को भारत ने गंभीरता से लिया और स्पष्ट संकेत दिया कि भारत-नेपाल सीमा विवाद पूरी तरह द्विपक्षीय विषय है, जिसमें किसी तीसरे पक्ष की भूमिका स्वीकार नहीं की जाएगी।
प्रधानमंत्री के बयान के बाद नेपाल के भीतर भी विपक्षी दलों और कई राजनीतिक विश्लेषकों ने सरकार की आलोचना की। उनका कहना था कि इस तरह के बयान से भारत जैसे करीबी पड़ोसी देश के साथ संबंधों में अनावश्यक तनाव पैदा हो सकता है। बढ़ते विवाद के बीच नेपाल सरकार पर अपने रुख को स्पष्ट करने का दबाव बढ़ गया था।
संसद में विदेश मंत्री की सफाई
नेपाली संसद को संबोधित करते हुए विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कहा कि प्रधानमंत्री के बयान का गलत अर्थ निकाला गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि नेपाल किसी तीसरे देश को मध्यस्थ के रूप में शामिल करने की बात नहीं कर रहा था। उनका आशय केवल इतना था कि यदि ऐतिहासिक दस्तावेज, नक्शे या अन्य अभिलेख चीन या ब्रिटेन जैसे देशों के पास उपलब्ध हों, तो तकनीकी अध्ययन और तथ्यों की पुष्टि के लिए उनका उपयोग किया जा सकता है।
विदेश मंत्री ने कहा, “नेपाल-भारत सीमा एक द्विपक्षीय विषय है और इसका समाधान दोनों देशों के बीच वार्ता के माध्यम से ही निकाला जाएगा। नेपाल हमेशा शांतिपूर्ण संवाद और कूटनीतिक प्रक्रिया का समर्थक रहा है।”
उन्होंने यह भी कहा कि नेपाल अपने पड़ोसी देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है और सीमा संबंधी मुद्दों को विवाद के बजाय संवाद के माध्यम से सुलझाना चाहता है।
भारत की प्रतिक्रिया
नेपाली प्रधानमंत्री के बयान के बाद भारत ने भी अपना रुख स्पष्ट किया था। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा था कि भारत और नेपाल के बीच सीमा निर्धारण का लगभग 98 प्रतिशत कार्य पहले ही पूरा हो चुका है। केवल कुछ सीमित क्षेत्र ऐसे हैं जहां अभी भी मतभेद बने हुए हैं।
भारत का कहना है कि शेष विवादित क्षेत्रों पर भी दोनों देशों के बीच स्थापित कूटनीतिक तंत्र और वार्ता प्रक्रिया के माध्यम से समाधान खोजा जा सकता है। भारत ने यह भी दोहराया कि सीमा विवाद में किसी तीसरे पक्ष की भूमिका की आवश्यकता नहीं है।
किन क्षेत्रों को लेकर है विवाद
भारत और नेपाल के बीच मुख्य रूप से कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा क्षेत्रों को लेकर विवाद है। नेपाल इन क्षेत्रों पर अपना दावा करता रहा है, जबकि भारत इन्हें उत्तराखंड राज्य का हिस्सा मानता है।
विवाद की जड़ 1816 की सुगौली संधि से जुड़ी हुई है, जिसके आधार पर दोनों देश अपनी-अपनी व्याख्या प्रस्तुत करते हैं। नेपाल का दावा है कि महाकाली (काली) नदी के उद्गम स्थल की अलग व्याख्या के कारण सीमा निर्धारण को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है। वहीं भारत का कहना है कि ऐतिहासिक दस्तावेजों और प्रशासनिक नियंत्रण के आधार पर ये क्षेत्र भारत का अभिन्न हिस्सा हैं।
साल 2020 में यह विवाद तब और बढ़ गया था जब भारत ने लिपुलेख तक सड़क निर्माण परियोजना पूरी की थी। इसके बाद नेपाल ने नया राजनीतिक नक्शा जारी कर कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को अपने क्षेत्र में दिखाया था। उस समय दोनों देशों के बीच कूटनीतिक तनाव भी देखने को मिला था।
संबंधों को सामान्य बनाने की कोशिश
विशेषज्ञों का मानना है कि विदेश मंत्री का ताजा बयान भारत और नेपाल के बीच विश्वास बहाली की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक और सामाजिक संबंध बेहद गहरे हैं। लाखों नेपाली नागरिक भारत में काम करते हैं, जबकि दोनों देशों के बीच खुली सीमा और ऐतिहासिक रिश्ते विशेष महत्व रखते हैं।
नेपाल सरकार यह संदेश देना चाहती है कि सीमा विवाद के बावजूद वह भारत के साथ सहयोगात्मक और सकारात्मक संबंध बनाए रखने के पक्ष में है। यही कारण है कि हालिया विवाद के बाद अब नेपाल के शीर्ष नेतृत्व की ओर से लगातार यह कहा जा रहा है कि सभी मुद्दों का समाधान द्विपक्षीय वार्ता और आपसी समझदारी के आधार पर किया जाएगा।
भारत और नेपाल के बीच सीमा विवाद भले ही पुराना हो, लेकिन दोनों देशों की सरकारें इसे संवाद और कूटनीतिक प्रक्रिया के जरिए सुलझाने की प्रतिबद्धता दोहरा रही हैं। नेपाल के विदेश मंत्री की ताजा सफाई से यह संकेत मिला है कि काठमांडू फिलहाल किसी टकराव के बजाय बातचीत के रास्ते पर आगे बढ़ना चाहता है, जिससे दोनों देशों के संबंधों में आई असहजता कम हो सकती है।