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दिल्ली के O-ज़ोन पर सख्ती: 15 लाख लोगों के घरों पर मंडराया बुलडोजर का खतरा, बढ़ी चिंता

नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में यमुना के बाढ़ क्षेत्र (फ्लडप्लेन) में रहने वाले लाखों लोगों के सामने आवास को लेकर बड़ी चिंता खड़ी हो गई है। यमुना किनारे वजीराबाद से लेकर कालिंदी कुंज (ओखला) तक कई स्थानों पर लगाए गए ‘Zone O Area’ के बोर्ड और जारी किए गए नोटिसों ने लोगों की नींद उड़ा […]

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  • June 14, 2026 3:00 pm IST, Published 3 hours ago

नई दिल्ली। राजधानी दिल्ली में यमुना के बाढ़ क्षेत्र (फ्लडप्लेन) में रहने वाले लाखों लोगों के सामने आवास को लेकर बड़ी चिंता खड़ी हो गई है। यमुना किनारे वजीराबाद से लेकर कालिंदी कुंज (ओखला) तक कई स्थानों पर लगाए गए ‘Zone O Area’ के बोर्ड और जारी किए गए नोटिसों ने लोगों की नींद उड़ा दी है। इन बोर्डों में साफ लिखा गया है कि यह क्षेत्र O-ज़ोन के अंतर्गत आता है और यहां किसी भी प्रकार के निर्माण की अनुमति नहीं है। इसके बाद यह आशंका जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में बड़े पैमाने पर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई की जा सकती है।

जानकारी के अनुसार, दिल्ली मास्टर प्लान में यमुना के बाढ़ प्रभावित क्षेत्र को O-ज़ोन (River Zone) के रूप में चिह्नित किया गया है। इस क्षेत्र का उद्देश्य यमुना नदी के प्राकृतिक प्रवाह, पर्यावरण संरक्षण और बाढ़ नियंत्रण को सुरक्षित रखना है। नियमों के तहत यहां स्थायी निर्माण, व्यावसायिक गतिविधियां और अनधिकृत कॉलोनियों के विकास पर रोक है। हालांकि वर्षों से इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में आबादी बस चुकी है और कई कॉलोनियां विकसित हो चुकी हैं।

बताया जा रहा है कि O-ज़ोन के दायरे में आने वाले इलाकों में लगभग 90 से अधिक कॉलोनियां शामिल हैं, जहां करीब 15 लाख लोग निवास करते हैं। इनमें बड़ी संख्या ऐसे परिवारों की है जो वर्षों से यहां रह रहे हैं और जिनके लिए यह मकान ही जीवनभर की कमाई का आधार है। ऐसे में बुलडोजर कार्रवाई की आशंका ने लोगों के बीच असुरक्षा और भय का माहौल पैदा कर दिया है।

इस पूरे मामले की जड़ में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) और दिल्ली हाईकोर्ट के वे निर्देश हैं, जिनमें यमुना के बाढ़ क्षेत्र को अतिक्रमण मुक्त रखने और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने पर जोर दिया गया है। अदालतों ने कई बार कहा है कि फ्लडप्लेन क्षेत्र में अनियंत्रित निर्माण से नदी का प्राकृतिक स्वरूप प्रभावित होता है, जलभराव और बाढ़ का खतरा बढ़ता है तथा पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है। इसी के मद्देनजर संबंधित एजेंसियां समय-समय पर कार्रवाई करती रही हैं।

वहीं दूसरी ओर स्थानीय निवासियों और सामाजिक संगठनों का कहना है कि यदि बड़े पैमाने पर ध्वस्तीकरण अभियान चलाया गया तो लाखों लोग बेघर हो सकते हैं। उनका तर्क है कि कई परिवार दशकों से इन क्षेत्रों में रह रहे हैं और उनके पास रहने के लिए कोई दूसरा विकल्प नहीं है। लोगों ने सरकार से मांग की है कि किसी भी कार्रवाई से पहले पुनर्वास और वैकल्पिक आवास की ठोस व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।

विशेषज्ञों का मानना है कि यमुना फ्लडप्लेन की सुरक्षा पर्यावरणीय दृष्टि से आवश्यक है, लेकिन इसके साथ ही मानवीय पहलुओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसलिए प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती पर्यावरण संरक्षण और लोगों के पुनर्वास के बीच संतुलन बनाने की होगी।

फिलहाल प्रशासन की ओर से सभी कॉलोनियों पर तत्काल कार्रवाई की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन O-ज़ोन बोर्डों और नोटिसों ने दिल्ली की राजनीति और आम जनता के बीच नई बहस छेड़ दी है। आने वाले दिनों में सरकार, DDA, अदालतों और संबंधित एजेंसियों के फैसले यह तय करेंगे कि यमुना किनारे बसे लाखों लोगों का भविष्य किस दिशा में जाएगा।

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