नई दिल्ली। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बी.आर. सूर्यकांत को लेकर सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो और तस्वीरों के मामले में दिल्ली हाईकोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। केंद्र सरकार ने अदालत को बताया कि सोशल मीडिया पर प्रसारित किया जा रहा दावा पूरी तरह भ्रामक और तथ्यहीन है। वायरल पोस्ट में कहा गया था कि मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, सुप्रीम कोर्ट के कुछ न्यायाधीश और दो केंद्रीय मंत्री सरकारी खर्च पर लंदन में आयोजित एक बैडमिंटन टूर्नामेंट में हिस्सा लेने गए थे।
इस मामले पर सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने संकेत दिया कि सोशल मीडिया पर भ्रामक और झूठी जानकारी फैलाने वालों के खिलाफ सख्त कदम उठाए जा सकते हैं। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से पोस्ट साझा करने वाले उपयोगकर्ताओं की बुनियादी जानकारी उपलब्ध कराने को कहा जा सकता है।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति तेजस करिया की अदालत में हुई। यह याचिका बैडमिंटन एसोसिएशन ऑफ इंडिया (BAI) की ओर से दायर की गई थी, जिसमें सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और पोस्ट को हटाने की मांग की गई। याचिका में आरोप लगाया गया था कि इन पोस्टों के जरिए न्यायपालिका और संवैधानिक पदाधिकारियों की छवि धूमिल करने का प्रयास किया गया।
सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि वायरल तस्वीरें और दावे पूरी तरह झूठे हैं। उन्होंने कहा कि इनका उद्देश्य कुछ संवैधानिक पदाधिकारियों की विदेश यात्रा को लेकर एक मनगढ़ंत कहानी गढ़ना था। मेहता ने स्पष्ट किया कि सोशल मीडिया पर साझा की जा रही तस्वीरें लंदन की नहीं हैं।
उन्होंने अदालत को बताया कि ये तस्वीरें वास्तव में नवंबर 2025 में नई दिल्ली के त्यागराज स्टेडियम में आयोजित एक बैडमिंटन कार्यक्रम की हैं। इसलिए यह दावा कि मुख्य न्यायाधीश और केंद्रीय मंत्री लंदन में बैडमिंटन खेलने गए थे, पूरी तरह निराधार है।
वायरल पोस्ट में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश विक्रम नाथ, केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल और केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के नाम भी जोड़े गए थे। केंद्र सरकार ने अदालत से कहा कि इस तरह की भ्रामक सामग्री सार्वजनिक संस्थाओं और न्यायपालिका की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा सकती है।
दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए संकेत दिया कि झूठी और भ्रामक सूचनाओं के प्रसार को रोकने के लिए आवश्यक कानूनी कदम उठाए जा सकते हैं। अदालत ने कहा कि सोशल मीडिया पर गलत सूचना फैलाने की प्रवृत्ति लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए चुनौती बनती जा रही है और ऐसे मामलों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।