नई दिल्ली। महिलाओं में डिप्रेशन, तनाव या सामान्य कमजोरी जैसे दिखने वाले लक्षण कभी-कभी बेहद गंभीर बीमारी ओवेरियन कैंसर (अंडाशय कैंसर) का संकेत भी हो सकते हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि कई महिलाएं शुरुआती संकेतों को मानसिक तनाव, हार्मोनल बदलाव या उम्र से जुड़ी सामान्य परेशानी समझकर नजरअंदाज कर देती हैं, जिससे बीमारी का पता देर से चलता है।
ओवेरियन कैंसर को अक्सर “साइलेंट किलर” कहा जाता है, क्योंकि इसके शुरुआती लक्षण स्पष्ट नहीं होते और आसानी से दूसरी समस्याओं से मिलते-जुलते लगते हैं। हालिया अध्ययनों में सामने आया है कि कई मरीजों में लगातार थकान, कमजोरी, भूख कम लगना, ध्यान केंद्रित न कर पाना, चिड़चिड़ापन और मानसिक उदासी जैसे लक्षण दिखाई दिए, जिन्हें शुरुआत में डिप्रेशन माना गया। लेकिन बाद में जांच में असली वजह ओवेरियन कैंसर निकली।
डॉक्टरों के अनुसार कैंसर का प्रभाव सिर्फ शरीर पर ही नहीं, मानसिक स्थिति पर भी पड़ता है। जब शरीर के अंदर लगातार सूजन, दर्द या हार्मोनल बदलाव होते हैं, तो मरीज को मानसिक थकावट और भावनात्मक अस्थिरता महसूस हो सकती है। यही कारण है कि कई बार ओवेरियन कैंसर के शुरुआती संकेत मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्या जैसे लगते हैं।
विशेषज्ञ बताते हैं कि कुछ लक्षण ऐसे हैं जिन्हें बिल्कुल नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इनमें लगातार पेट फूलना, थोड़ी मात्रा में खाने पर पेट भर जाना, पेल्विक या पेट के निचले हिस्से में दर्द, बार-बार पेशाब लगना, कब्ज या पाचन संबंधी समस्या शामिल हैं। अगर ये लक्षण 2 से 3 सप्ताह से ज्यादा समय तक बने रहें, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
सबसे बड़ी चिंता यह है कि ओवेरियन कैंसर अक्सर एडवांस स्टेज में पकड़ में आता है। देर से पहचान होने पर इलाज जटिल और जोखिमपूर्ण हो जाता है। वहीं, यदि शुरुआती चरण में बीमारी का पता चल जाए, तो इलाज की सफलता दर काफी बढ़ जाती है और मरीज के ठीक होने की संभावना भी अधिक रहती है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि केवल मानसिक लक्षण देखकर निष्कर्ष पर पहुंचना सही नहीं है। यदि डिप्रेशन या तनाव का इलाज चल रहा हो लेकिन थकान, कमजोरी, पेट दर्द या अन्य शारीरिक समस्याएं लगातार बनी रहें, तो विस्तृत मेडिकल जांच जरूर करानी चाहिए।
जागरूकता, नियमित स्वास्थ्य जांच और शरीर के संकेतों को गंभीरता से लेना ही ओवेरियन कैंसर जैसी खतरनाक बीमारी से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है। महिलाओं को अपने शरीर में होने वाले छोटे-छोटे बदलावों पर भी ध्यान देना चाहिए, क्योंकि समय पर पहचान ही जीवन बचा सकती है।