नई दिल्ली। देश में नशे की बदलती आदतों को लेकर किए गए एक हालिया सर्वेक्षण ने समाज और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। सर्वे में सामने आया है कि पुरुषों के बीच शराब के सेवन की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है, जबकि धूम्रपान के मामलों में महिलाओं की भागीदारी पहले की तुलना में अधिक देखी जा रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह बदलाव केवल स्वास्थ्य संबंधी समस्या नहीं है, बल्कि इसके सामाजिक और आर्थिक प्रभाव भी लंबे समय तक महसूस किए जा सकते हैं।
भारत सहित दुनिया के कई देशों में नशे की प्रवृत्तियों में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है। पहले जहां शराब, तंबाकू और भांग जैसे पारंपरिक नशे अधिक प्रचलित थे, वहीं अब सिंथेटिक ड्रग्स, नशीली गोलियां, इंजेक्शन और ऑनलाइन माध्यमों से उपलब्ध मादक पदार्थों का उपयोग बढ़ता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि नशे की बदलती यह प्रवृत्ति केवल स्वास्थ्य का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सामाजिक, आर्थिक और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी एक गंभीर चुनौती बन चुकी है।
हाल के वर्षों में युवाओं और किशोरों के बीच नशीले पदार्थों के सेवन में वृद्धि चिंता का विषय बनी हुई है। आसान उपलब्धता, सोशल मीडिया का प्रभाव, साथियों का दबाव, तनावपूर्ण जीवनशैली और बेरोजगारी जैसी परिस्थितियां युवाओं को नशे की ओर आकर्षित कर रही हैं। कई मामलों में देखा गया है कि लोग शुरुआत में उत्सुकता या मनोरंजन के उद्देश्य से नशा करना शुरू करते हैं, लेकिन धीरे-धीरे इसकी लत उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर बना देती है।
विशेषज्ञ बताते हैं कि सिंथेटिक ड्रग्स का खतरा सबसे अधिक बढ़ा है। ये पदार्थ कम मात्रा में भी गंभीर नुकसान पहुंचा सकते हैं। कई बार इनके सेवन से हृदय गति असामान्य हो जाती है, मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है और जान का खतरा भी पैदा हो सकता है। इसके अलावा नशीले इंजेक्शन के उपयोग से एचआईवी, हेपेटाइटिस और अन्य संक्रमण फैलने की संभावना भी बढ़ जाती है।
सर्वेक्षण के अनुसार, पुरुषों में शराब का सेवन तनाव, सामाजिक दबाव, जीवनशैली में बदलाव और मनोरंजन के साधन के रूप में तेजी से बढ़ा है। कई लोग इसे तनाव कम करने का माध्यम मानते हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि अत्यधिक शराब सेवन शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों के लिए हानिकारक साबित हो सकता है। इससे लीवर की बीमारी, हृदय रोग, उच्च रक्तचाप और मानसिक तनाव जैसी समस्याएं बढ़ने का खतरा रहता है।
वहीं दूसरी ओर, महिलाओं में धूम्रपान और तंबाकू उत्पादों के उपयोग में वृद्धि दर्ज की गई है। पहले जहां धूम्रपान मुख्य रूप से पुरुषों से जुड़ी आदत माना जाता था, वहीं अब शहरी क्षेत्रों में महिलाओं के बीच भी इसका चलन बढ़ रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार, बदलती सामाजिक सोच, कार्यस्थल का दबाव, आधुनिक जीवनशैली और सोशल मीडिया पर दिखाए जाने वाले प्रभाव इसके प्रमुख कारण हो सकते हैं।
स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि महिलाओं में धूम्रपान का असर अधिक गंभीर हो सकता है। इससे फेफड़ों की बीमारियों, कैंसर, हृदय रोग और प्रजनन संबंधी समस्याओं का खतरा बढ़ जाता है। गर्भावस्था के दौरान धूम्रपान मां और बच्चे दोनों के स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।
सरकार और विभिन्न सामाजिक संगठनों द्वारा नशा मुक्ति अभियान चलाए जा रहे हैं। कई राज्यों में नशा मुक्ति केंद्र स्थापित किए गए हैं जहां प्रभावित लोगों को उपचार और परामर्श की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इन सेवाओं का विस्तार ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों तक किया जाना चाहिए ताकि अधिक से अधिक लोगों को सहायता मिल सके।
विशेषज्ञों ने सुझाव दिया है कि सरकार, शैक्षणिक संस्थानों और सामाजिक संगठनों को मिलकर नशा मुक्ति अभियान को और मजबूत करना चाहिए। स्कूलों और कॉलेजों में जागरूकता कार्यक्रम, परामर्श सेवाएं और मानसिक स्वास्थ्य सहायता उपलब्ध कराकर युवाओं को नशे की लत से बचाया जा सकता है।
स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि नशे की बढ़ती प्रवृत्ति को रोकने के लिए केवल कानून बनाना पर्याप्त नहीं है। समाज में जागरूकता, परिवार का सहयोग और स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देना भी उतना ही आवश्यक है। यदि सामूहिक प्रयास किए जाएं, तो शराब और धूम्रपान जैसी आदतों पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है।
नशे की बदलती प्रवृत्तियां यह संकेत देती हैं कि समय के साथ चुनौतियां भी बदल रही हैं। ऐसे में समाज को सतर्क रहने और युवाओं को सही दिशा देने की आवश्यकता है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो यह समस्या आने वाले वर्षों में और अधिक गंभीर रूप धारण कर सकती है। इसलिए नशा मुक्त और स्वस्थ समाज के निर्माण के लिए सामूहिक प्रयास आज की सबसे बड़ी जरूरत बन गए हैं।