गाजियाबाद। उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद से साइबर ठगी का एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है। साइबर अपराधियों ने 84 वर्षीय रिटायर्ड बैंक मैनेजर और उनकी पत्नी को कथित तौर पर 12 दिनों तक डिजिटल अरेस्ट में रखकर करीब 2.20 करोड़ रुपये की ठगी कर ली। आरोपियों ने खुद को पुलिस, ईडी और न्यायपालिका से जुड़ा अधिकारी बताकर बुजुर्ग दंपति को इतना भयभीत कर दिया कि उन्होंने अपनी जीवनभर की जमा पूंजी तक साइबर ठगों के खातों में ट्रांसफर कर दी। इतना ही नहीं, ठगों के दबाव में आकर उन्होंने लगभग 70 लाख रुपये उधार लेकर भी आरोपियों के बताए खातों में भेज दिए।
पुलिस के अनुसार, साइबर अपराधियों ने सबसे पहले बुजुर्ग दंपति से फोन पर संपर्क किया। इसके बाद उन्हें वीडियो कॉल के माध्यम से कथित जांच प्रक्रिया का हिस्सा बताते हुए लगातार निगरानी में रखा गया। आरोपियों ने दावा किया कि उनके नाम से गंभीर वित्तीय अपराध और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे मामले जुड़े हैं। गिरफ्तारी और कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर उन्हें घर से बाहर न निकलने और किसी से संपर्क न करने की हिदायत दी गई।
पूरे घटनाक्रम के दौरान ठगों ने वीडियो कॉल पर फर्जी अदालत और पूछताछ का माहौल तैयार किया। कथित अधिकारियों की वर्दी, सरकारी कार्यालय जैसी पृष्ठभूमि और कानूनी भाषा का इस्तेमाल कर दंपति का विश्वास जीत लिया गया। रोजाना कई घंटे तक वीडियो कॉल पर पूछताछ के नाम पर उन्हें मानसिक दबाव में रखा गया। इसी दौरान उनसे बैंक खातों की जानकारी, निवेश और जमा पूंजी का विवरण लिया गया।
ठगों ने बुजुर्ग दंपति से कहा कि यदि वे अपनी संपत्ति और बैंक खातों को जांच के लिए “सुरक्षित सरकारी खाते” में ट्रांसफर नहीं करेंगे तो उन्हें तत्काल गिरफ्तार कर लिया जाएगा। गिरफ्तारी के डर और लगातार मानसिक दबाव के कारण पीड़ित दंपति ने अलग-अलग किश्तों में करीब 2.20 करोड़ रुपये आरोपियों के बताए खातों में भेज दिए। इसके अलावा आरोपियों के निर्देश पर उन्होंने रिश्तेदारों और परिचितों से लगभग 70 लाख रुपये उधार लेकर भी ट्रांसफर कर दिए।
जब कई दिनों बाद कथित जांच समाप्त होने का कोई संकेत नहीं मिला और आरोपियों से संपर्क टूटने लगा, तब पीड़ितों को अपने साथ हुई ठगी का एहसास हुआ। इसके बाद उन्होंने परिजनों को पूरी घटना बताई और साइबर पुलिस से शिकायत दर्ज कराई। शिकायत मिलने के बाद पुलिस ने साइबर अपराध की विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है। जिन बैंक खातों में धनराशि भेजी गई, उनकी जानकारी जुटाई जा रही है और संबंधित बैंकों से समन्वय कर रकम को ट्रैक करने का प्रयास किया जा रहा है।
साइबर विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल अरेस्ट नाम से कोई वैधानिक प्रक्रिया नहीं होती। पुलिस, ईडी, सीबीआई, आयकर विभाग या किसी भी सरकारी एजेंसी द्वारा वीडियो कॉल पर किसी नागरिक को डिजिटल अरेस्ट नहीं किया जाता। यदि कोई व्यक्ति फोन या वीडियो कॉल पर खुद को सरकारी अधिकारी बताकर बैंक खाते में पैसे ट्रांसफर करने, गोपनीयता बनाए रखने या किसी से बात न करने का दबाव बनाता है, तो यह साइबर ठगी का स्पष्ट संकेत हो सकता है।
विशेषज्ञ नागरिकों को सलाह देते हैं कि ऐसे किसी भी कॉल पर घबराने के बजाय उसकी सत्यता की जांच करें। किसी भी अनजान व्यक्ति के कहने पर बैंक खाते, ओटीपी, पासवर्ड या निजी वित्तीय जानकारी साझा न करें। यदि कोई संदिग्ध कॉल प्राप्त हो तो तुरंत कॉल काटें और अपने नजदीकी पुलिस थाने, साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 या राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराएं।
यह घटना एक बार फिर साबित करती है कि साइबर अपराधी अब तकनीक के साथ-साथ मनोवैज्ञानिक दबाव का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। विशेष रूप से वरिष्ठ नागरिक ऐसे मामलों में अधिक निशाना बन रहे हैं। इसलिए परिवारों को भी अपने बुजुर्ग सदस्यों को डिजिटल अरेस्ट और ऑनलाइन ठगी के नए तरीकों के बारे में जागरूक करना चाहिए, ताकि वे किसी भी प्रकार के साइबर जाल में फंसने से बच सकें।