नई दिल्ली: वैश्विक बाजारों में कमजोरी और बॉन्ड यील्ड में लगातार बढ़ोतरी का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी दिखाई दे रहा है। घरेलू इक्विटी बाजार लगातार दूसरे कारोबारी सत्र में दबाव में नजर आया। गुरुवार को कारोबार की शुरुआत सेंसेक्स और निफ्टी के सपाट से मिले-जुले रुख के साथ हुई, लेकिन कुछ ही देर में बिकवाली तेज हो गई और दोनों प्रमुख सूचकांक लाल निशान में गहरे उतर गए। दोपहर तक बाजार की गिरावट काफी बढ़ चुकी थी।
दोपहर करीब 2.30 बजे सेंसेक्स 1,147.58 अंक यानी 1.58 प्रतिशत टूटकर 71,491.12 के स्तर पर कारोबार कर रहा था। वहीं निफ्टी 50 में भी तेज गिरावट देखी गई। सूचकांक दिन के कारोबार में 22,254.30 के निचले स्तर तक पहुंचा और इस समय 393.80 अंक यानी 1.74 प्रतिशत की कमजोरी के साथ 22,209.25 पर बना हुआ था। बाजार में चौतरफा बिकवाली के कारण निवेशकों के बीच सतर्कता बढ़ती दिखाई दी।
बाजार की मौजूदा कमजोरी के पीछे घरेलू और वैश्विक दोनों कारकों को जिम्मेदार माना जा रहा है। निवेशक भारतीय रिजर्व बैंक की हालिया मौद्रिक नीति के असर का आकलन कर रहे हैं। आरबीआई की ओर से रेपो रेट में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी और मौद्रिक नीति के रुख में बदलाव के बाद ब्याज दरों को लेकर बाजार की धारणा प्रभावित हुई है। ऊंची ब्याज दरों के माहौल में सुरक्षित और फिक्स्ड इनकम वाले निवेश विकल्प शेयर बाजार की तुलना में अधिक आकर्षक दिखाई दे सकते हैं।
सेक्टोरल स्तर पर भी बाजार में कमजोरी व्यापक रही। निफ्टी मेटल इंडेक्स में करीब 3.23 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जबकि तेल एवं गैस क्षेत्र करीब 2.60 प्रतिशत नीचे रहा। रियल्टी इंडेक्स में 2.39 प्रतिशत, फार्मा में 2.13 प्रतिशत और हेल्थकेयर में 2.21 प्रतिशत की कमजोरी देखने को मिली। ऑटो सेक्टर करीब 1.78 प्रतिशत और एफएमसीजी 1.81 प्रतिशत नीचे कारोबार कर रहे थे। मीडिया इंडेक्स में भी लगभग 1.71 प्रतिशत की गिरावट रही। इससे संकेत मिलता है कि बिकवाली का असर किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा।
कारोबार की शुरुआत में मेटल, कंज्यूमर ड्यूरेबल्स और केमिकल्स जैसे कुछ क्षेत्रों में हल्की मजबूती दिखाई दी थी, लेकिन बाद में बाजार का रुख बदल गया। जैसे-जैसे प्रमुख सूचकांकों में गिरावट बढ़ी, कई सेक्टर भी दबाव में आ गए। विश्लेषकों के मुताबिक आरबीआई के अपेक्षाकृत सख्त मौद्रिक रुख से कंपनियों की फंडिंग लागत और बाजार के वैल्यूएशन पर असर पड़ सकता है।
विदेशी निवेशकों की गतिविधियां भी बाजार की दिशा को प्रभावित कर रही हैं। बाजार जानकारों के अनुसार विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की लगातार बिकवाली ने घरेलू शेयर बाजार पर अतिरिक्त दबाव बनाया है। इसके साथ ही अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी यील्ड का ऊंचे स्तर पर बने रहना भी उभरते बाजारों के लिए चुनौती माना जा रहा है। ऊंची अमेरिकी बॉन्ड यील्ड की स्थिति में वैश्विक निवेशकों के लिए डॉलर आधारित सुरक्षित परिसंपत्तियां अधिक आकर्षक हो सकती हैं।
बाजार विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में निवेशकों का ध्यान कंपनियों की कमाई, वैल्यूएशन और ब्याज दरों के असर पर अधिक रहेगा। हालांकि ग्रोथ आधारित शेयरों में निवेशकों की दिलचस्पी बनी हुई है, लेकिन ऊंचे वैल्यूएशन के कारण उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है। दूसरी ओर, फार्मा जैसे कुछ रक्षात्मक क्षेत्रों को अपेक्षाकृत कम ब्याज-संवेदनशील होने के कारण निवेशकों का समर्थन मिल सकता है। फिलहाल वैश्विक संकेत, विदेशी निवेशकों की गतिविधियां और आरबीआई की मौद्रिक नीति बाजार की अगली दिशा तय करने वाले प्रमुख कारक बने हुए हैं।