जबलपुर/ग्वालियर : एक गलती… और जिंदगी के 57 दिन सलाखों के पीछे।” मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने 16 साल पुराने एक ऐसे मामले में बड़ा फैसला सुनाया है, जिसने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्वालियर के इंजीनियर अजय सिंह को एयरपोर्ट पर सिर्फ इसलिए गिरफ्तार कर लिया गया था क्योंकि उनके बैग में रखे आमचूर पाउडर और मसालों को अधिकारियों ने ड्रग्स समझ लिया था। अब हाईकोर्ट ने इसे नागरिक अधिकारों का गंभीर उल्लंघन मानते हुए राज्य सरकार को अजय सिंह को 10 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है।
यह मामला वर्ष 2010 का है। अजय सिंह अपने काम के सिलसिले में यात्रा कर रहे थे। एयरपोर्ट पर सुरक्षा जांच के दौरान उनके बैग में रखे पाउडरनुमा पदार्थ पर अधिकारियों को शक हुआ। बिना पूरी वैज्ञानिक पुष्टि के सुरक्षा एजेंसियों ने उसे मादक पदार्थ मान लिया। देखते ही देखते एक सम्मानित इंजीनियर पर एनडीपीएस एक्ट जैसी गंभीर धाराएं लगा दी गईं और उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
अजय सिंह लगातार कहते रहे कि वह कोई ड्रग्स नहीं बल्कि आमचूर और घरेलू मसाले हैं, लेकिन उनकी बात पर भरोसा नहीं किया गया। जांच एजेंसियों ने फोरेंसिक रिपोर्ट आने से पहले ही उन्हें अपराधी मान लिया। सबसे दुखद पहलू यह रहा कि लैब रिपोर्ट आने में लंबा समय लग गया और इसी देरी के कारण अजय सिंह को पूरे 57 दिन जेल में बिताने पड़े।
जब फोरेंसिक जांच पूरी हुई तो सच्चाई सामने आई। रिपोर्ट में साफ हो गया कि जब्त किया गया पदार्थ कोई नशीला पदार्थ नहीं था। वह सिर्फ आमचूर और मसाले थे। रिपोर्ट सामने आते ही मामला पूरी तरह बदल गया और अजय सिंह को रिहा कर दिया गया। लेकिन तब तक उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा, मानसिक शांति और करियर को गहरा नुकसान पहुंच चुका था।
इस घटना के बाद अजय सिंह ने न्याय के लिए लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी। आखिरकार मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने माना कि जांच एजेंसियों की लापरवाही, तकनीकी खामियां और फोरेंसिक जांच में देरी ने एक निर्दोष व्यक्ति की जिंदगी को बुरी तरह प्रभावित किया। अदालत ने कहा कि किसी भी नागरिक की स्वतंत्रता संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित है और बिना ठोस प्रमाण किसी को अपराधी मान लेना कानून की भावना के खिलाफ है।
कोर्ट ने अपने फैसले में टिप्पणी करते हुए कहा कि “राज्य की जिम्मेदारी है कि जांच प्रक्रिया निष्पक्ष, वैज्ञानिक और समयबद्ध हो। यदि व्यवस्था की खामियों के कारण किसी निर्दोष को जेल जाना पड़े, तो यह केवल प्रशासनिक भूल नहीं बल्कि नागरिक अधिकारों का हनन है।”
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को तीन महीने के भीतर 10 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। साथ ही अदालत ने प्रदेश की फोरेंसिक लैब व्यवस्था और जांच प्रणाली को आधुनिक बनाने की जरूरत पर भी जोर दिया। कोर्ट ने कहा कि भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए तेज और विश्वसनीय जांच तंत्र विकसित करना बेहद जरूरी है।
यह फैसला केवल अजय सिंह की जीत नहीं माना जा रहा, बल्कि उन हजारों लोगों के लिए उम्मीद का संदेश है जो कभी-कभी जांच एजेंसियों की जल्दबाजी और सिस्टम की कमियों का शिकार बन जाते हैं। अदालत ने साफ कर दिया कि किसी निर्दोष की जिंदगी और सम्मान के साथ खिलवाड़ करने की कीमत सरकार और व्यवस्था को चुकानी होगी।