नई दिल्ली : 32वें अंतरराष्ट्रीय थैलेसीमिया दिवस के अवसर पर आज दिल्ली विधान सभा में नेशनल थैलेसीमिया वेलफेयर सोसाइटी (NTWS) के सहयोग से एक जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस संबंध में दिल्ली विधान सभा के माननीय अध्यक्ष श्री विजेन्द्र गुप्ता ने बताया कि गर्भवती महिलाओं के लिए थैलेसीमिया जांच अनिवार्य किए जाने संबंधी प्रस्ताव पर सदन में चर्चा की जाएगी तथा इस विषय पर विधेयक लाने पर विचार किया जाएगा, ताकि थैलेसीमिया मेजर से प्रभावित बच्चों के जन्म को रोका जा सके। यह निर्णय नेशनल थैलेसीमिया वेलफेयर सोसाइटी द्वारा किए गए अनुरोध के उपरांत लिया गया है।
कार्यक्रम में पूर्व केंद्रीय गृह राज्य मंत्री श्री हंसराज गंगाराम अहीर; राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार की वरिष्ठ विशेषज्ञ श्रीमती विनीता श्रीवास्तव; दिल्ली विधानसभा के सचिव श्री रंजीत सिंह, इंडियन सोसाइटी ऑफ हेमेटोलॉजी एंड ब्लड ट्रांसफ्यूजन के उपाध्यक्ष एवं एम्स दिल्ली के हेमेटोलॉजी विभागाध्यक्ष डॉ. मनोरंजन महापात्र; नेशनल थैलेसीमिया वेलफेयर सोसाइटी की उपाध्यक्ष डॉ. स्वरण अनिल; भारत सरकार के पूर्व उप आयुक्त एवं दिल्ली राज्य दिव्यांगजन आयुक्त श्री टी.डी. धरियाल; तथा नेशनल थैलेसीमिया वेलफेयर सोसाइटी के महासचिव डॉ. जे.एस. अरोड़ा सहित चिकित्सक, स्वास्थ्यकर्मी, छात्र, थैलेसीमिया मरीज एवं उनके परिवारजन उपस्थित थे।
भारत सरकार के पूर्व गृह राज्य मंत्री श्री हंसराज गंगाराम अहीर ने कहा कि वे इस विषय को सर्वोच्च स्तर पर उठाएंगे ताकि देश के प्रत्येक थैलेसीमिया रोगी को आयरन केलेशन की सभी दवाएं उपलब्ध एवं सुलभ कराई जा सकें।
अपने उद्घाटन संबोधन में नेशनल थैलेसीमिया वेलफेयर सोसाइटी की उपाध्यक्ष डॉ. स्वरण अनिल ने कहा कि चिकित्सा समुदाय की निष्ठा और समर्पण के कारण थैलेसीमिया योद्धाओं का जीवन स्तर अब काफी बेहतर हुआ है। उन्होंने समाज से नियमित रक्तदान करने की अपील की ताकि थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों को रक्त की कमी का सामना न करना पड़े। उन्होंने नर्सों और स्वास्थ्यकर्मियों के प्रति भी आभार व्यक्त किया, जो थैलेसीमिया मरीजों की सेवा में निरंतर संवेदनशीलता और समर्पण का परिचय दे रहे हैं।
भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधिकरण की वरिष्ठ विशेषज्ञ श्रीमती विनीता श्रीवास्तव ने देशभर में रक्त की उपलब्धता और पहुंच को बेहतर बनाने में ई-रक्तकोष पोर्टल की भूमिका को रेखांकित किया और इसे रक्त संक्रमण सेवाओं को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण तकनीकी पहल बताया।
इंडियन सोसायटी ऑफ हेमेटोलॉजी एंड ब्लड ट्रांसफ्यूजन के उपाध्यक्ष एवं एम्स दिल्ली के हेमेटोलॉजी विभागाध्यक्ष श्री टी.डी. धरियाल ने जानकारी दी कि थैलेसीमिया मरीजों को दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के अंतर्गत कई लाभ प्राप्त हैं, जिनमें शिक्षा में आरक्षण और भेदभाव से संरक्षण शामिल है। उन्होंने कहा कि यदि थैलेसीमिया मरीजों के अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो वे अन्य मान्यता प्राप्त दिव्यांग व्यक्तियों की तरह राज्य दिव्यांगजन आयुक्त से संपर्क कर सकते हैं।
सभा को संबोधित करते हुए नेशनल थैलेसीमिया वेलफेयर सोसाइटी के महासचिव डॉ. जे.एस. अरोड़ा ने कहा कि थैलेसीमिया के प्रबंधन एवं रोकथाम के लिए मानक दिशानिर्देश अब उपलब्ध हैं और आवश्यकता इस बात की है कि इन जानकारियों को व्यवहार में लागू किया जाए। उन्होंने कहा कि इन दिशानिर्देशों को प्रभावी रूप से लागू करने के लिए संस्थागत स्तर पर छोटे-छोटे प्रयासों की आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि एक थैलेसीमिया पीड़ित बच्चे के उपचार पर प्रतिवर्ष ₹50,000 से ₹2 लाख तक का खर्च आता है तथा यदि उपचार न मिले तो प्रभावित बच्चों की आयु केवल एक से पाँच वर्ष तक सीमित रह सकती है। डॉ. अरोड़ा ने यह भी कहा कि पर्याप्त रक्त चढ़ाने और उचित आयरन केलेशन थेरेपी मिलने पर थैलेसीमिया मरीज सामान्य जीवन के करीब जीवन व्यतीत कर सकते हैं।
कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों ने बताया कि लगभग 5 करोड़ भारतीय थैलेसीमिया ट्रेट के वाहक हैं, हालांकि उनमें इसके लक्षण दिखाई नहीं देते। खतरा तब उत्पन्न होता है जब पति और पत्नी दोनों ही वाहक हों। ऐसी स्थिति में प्रत्येक गर्भावस्था में 25 प्रतिशत संभावना होती है कि बच्चा थैलेसीमिया मेजर से प्रभावित होगा, जिसके लिए जीवनभर रक्त चढ़ाने की आवश्यकता पड़ती है। यह भी बताया गया कि भारत में प्रतिवर्ष लगभग 12,000 से 15,000 थैलेसीमिया मेजर से प्रभावित बच्चों का जन्म होता है।
विशेषज्ञों ने इस बात पर बल दिया कि गर्भधारण से पूर्व या गर्भावस्था के प्रारंभिक चरण में वाहक जांच के माध्यम से थैलेसीमिया मेजर से प्रभावित बच्चे के जन्म को रोका जा सकता है। यदि केवल एक अभिभावक वाहक है, तो किसी विशेष सावधानी की आवश्यकता नहीं होती क्योंकि बच्चा थैलेसीमिया मेजर से प्रभावित नहीं होगा। किंतु यदि दोनों अभिभावक वाहक हों, तो आनुवंशिक परामर्श के बाद गर्भावस्था के 10–11 सप्ताह में प्रसवपूर्व जांच कराई जा सकती है। यदि भ्रूण में थैलेसीमिया मेजर की पुष्टि होती है, तो परिवार कानूनी रूप से चिकित्सीय गर्भसमापन का विकल्प चुन सकता है। दिल्ली के लोकनायक अस्पताल में प्रसवपूर्व जांच की सुविधा निःशुल्क उपलब्ध है।