नई दिल्ली। यूट्यूबर ध्रुव राठी के एक विवादित वीडियो को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट में चल रही सुनवाई ने एक बार फिर डिजिटल कंटेंट, धार्मिक भावनाओं और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी से जुड़े सवालों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। ताजा सुनवाई में Google की ओर से अदालत को बताया गया कि संबंधित वीडियो को भारत में YouTube पर रोक दिया गया है, लेकिन इसे पूरी दुनिया में ब्लॉक नहीं किया गया है। मामले में वैश्विक स्तर पर वीडियो हटाने की मांग भी उठी है।
Google ने कोर्ट में क्या बताया?
11 अगस्त 2026 को दिल्ली हाई कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान Google की ओर से बताया गया कि ध्रुव राठी के संबंधित YouTube वीडियो को भारत में उपलब्ध होने से रोक दिया गया है। कंपनी के मुताबिक यह कार्रवाई केंद्र सरकार की Grievance Appellate Committee (GAC) के निर्देश के बाद की गई। रिपोर्टों के अनुसार GAC ने 15 जुलाई को वीडियो को हटाने का निर्देश दिया था।
हालांकि, विवाद का एक अहम पहलू यह है कि वीडियो को कथित तौर पर वैश्विक स्तर पर नहीं हटाया गया है। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में यह दलील दी गई कि केवल भारत में वीडियो को रोकना पर्याप्त नहीं है और इसे दुनिया भर में हटाने का निर्देश दिया जाना चाहिए। Google ने इस मांग का विरोध करते हुए अदालत को बताया कि वैश्विक स्तर पर रोक लगाने से संबंधित मामला हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच के समक्ष लंबित है।
आखिर किस वीडियो को लेकर विवाद है?
मामला ध्रुव राठी के YouTube पर 21 मार्च 2026 को अपलोड किए गए वीडियो से जुड़ा है। वीडियो का शीर्षक “Can Hindus Eat BEEF? | Kerala Story 2 EXPOSED” बताया गया है। इसमें हिंदू धार्मिक ग्रंथों और देवी-देवताओं से जुड़े खान-पान के संदर्भ में चर्चा की गई थी। याचिकाकर्ता अमिता सचदेवा ने आरोप लगाया कि वीडियो में भगवान राम, भगवान कृष्ण और माता सीता समेत हिंदू देवी-देवताओं को लेकर आपत्तिजनक दावे किए गए।
याचिका में वीडियो की भाषा और कथित टिप्पणियों को धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाला बताया गया। इसी आधार पर वीडियो को हटाने की मांग की गई और मामले को पहले संबंधित डिजिटल शिकायत तंत्र के सामने उठाया गया था।
पहले भी हाई कोर्ट दे चुका है अहम निर्देश
यह मामला पहली बार जुलाई 2026 में दिल्ली हाई कोर्ट के सामने प्रमुखता से आया था। 3 जुलाई को न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ ने केंद्र सरकार की शिकायत अपीलीय समिति यानी GAC को निर्देश दिया था कि वह वीडियो हटाने की मांग से जुड़ी अपील पर 15 दिनों के भीतर फैसला करे। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि उसके आदेश की अनदेखी को गंभीरता से लिया जाएगा।
याचिका अधिवक्ता अमिता सचदेवा ने दायर की थी। उनका कहना था कि उन्होंने YouTube के शिकायत अधिकारी के समक्ष भी वीडियो हटाने की मांग की थी, लेकिन प्लेटफॉर्म ने कथित तौर पर कम्युनिटी गाइडलाइंस के उल्लंघन की पुष्टि नहीं की। इसके बाद उन्होंने GAC का रुख किया।
केंद्र सरकार ने क्या दलील दी थी?
जुलाई की सुनवाई में केंद्र सरकार की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल चेतन शर्मा ने दलील दी थी कि संबंधित वीडियो हिंदू देवी-देवताओं के प्रति अपमानजनक और विभाजनकारी सामग्री वाला है। सरकार की ओर से यह भी कहा गया था कि डिजिटल प्लेटफॉर्म को ऐसी सामग्री के मामले में उचित सावधानी बरतनी चाहिए।
सरकार का तर्क डिजिटल प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी और ऑनलाइन सामग्री की निगरानी से जुड़े व्यापक सवालों से भी जुड़ा है। दूसरी ओर, ऐसे मामलों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक भावनाओं की सुरक्षा के बीच संतुलन भी महत्वपूर्ण मुद्दा बन जाता है।
याचिकाकर्ता की मांग क्या है?
याचिकाकर्ता की ओर से अब मांग की गई है कि वीडियो को केवल भारत में प्रतिबंधित रखने के बजाय दुनिया भर में हटाने का आदेश दिया जाए। उनका तर्क है कि यदि सामग्री को दूसरे देशों में देखा जा सकता है तो केवल भारत में रोक लगाने से शिकायत का उद्देश्य पूरी तरह पूरा नहीं होता।
वहीं Google का कहना है कि भारत में संबंधित निर्देश के अनुरूप कार्रवाई की जा चुकी है और वैश्विक ब्लॉकिंग से जुड़ा मुद्दा अलग कानूनी कार्यवाही का हिस्सा है। इस वजह से मामला अब केवल वीडियो हटाने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इंटरनेट प्लेटफॉर्म की भौगोलिक सीमाओं और अदालत के आदेश के दायरे से जुड़े सवाल भी सामने आ गए हैं।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम धार्मिक संवेदनशीलता
यह मामला सोशल मीडिया पर कंटेंट मॉडरेशन की जटिलता को भी सामने लाता है। भारत में इंटरनेट प्लेटफॉर्म को एक तरफ उपयोगकर्ताओं की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और दूसरी तरफ कानून, सार्वजनिक व्यवस्था तथा धार्मिक भावनाओं से जुड़े नियमों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।
धार्मिक विषयों पर टिप्पणी होने की स्थिति में विवाद और कानूनी चुनौती की संभावना अधिक रहती है। ऐसे में अदालतों के सामने यह सवाल भी महत्वपूर्ण होता है कि किसी सामग्री को हटाने का आधार क्या हो, संबंधित प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी कितनी हो और किसी देश में लगाया गया प्रतिबंध किस सीमा तक लागू किया जा सकता है।
ताजा घटनाक्रम के बाद मामले में वैश्विक स्तर पर वीडियो हटाने की मांग प्रमुख मुद्दा बनी हुई है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार Google ने भारत में वीडियो को रोकने की कार्रवाई की है, जबकि वैश्विक ब्लॉकिंग से संबंधित मुद्दा अभी अदालत के समक्ष लंबित है।
इस मामले की अगली कानूनी कार्रवाई यह तय करने में महत्वपूर्ण हो सकती है कि किसी विवादित ऑनलाइन वीडियो पर भारत में लागू आदेश का प्रभाव किस सीमा तक हो सकता है। साथ ही यह मामला भविष्य में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, सरकार और न्यायपालिका के बीच डिजिटल कंटेंट को लेकर जिम्मेदारियों की दिशा भी प्रभावित कर सकता है।
फिलहाल ध्रुव राठी का यह वीडियो विवाद धार्मिक भावनाओं, डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन का बड़ा कानूनी मुद्दा बन चुका है। अदालत के समक्ष आगे होने वाली सुनवाई में वैश्विक स्तर पर वीडियो हटाने की मांग और Google की स्थिति पर महत्वपूर्ण स्पष्टता आने की उम्मीद है।