12 साल पुरानी तस्वीरों ने खोली प्रभात रंजन की अनकही कहानी

वाराणसी। सोशल मीडिया पर सामने आई एक पुरानी तस्वीर ने करीब 12 साल पहले किए गए एक सामाजिक प्रयास की यादें ताजा कर दी हैं। तस्वीरें प्रभात रंजन की सोशल मीडिया प्रोफाइल पर साझा की गई पुरानी पोस्ट से जुड़ी हैं, जिसमें वाराणसी के राजकीय बाल गृह में रहने वाले बच्चों के बीच शिक्षा, प्रशिक्षण […]

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  • September 8, 2026 2:48 pm IST, Published 37 minutes ago

वाराणसी। सोशल मीडिया पर सामने आई एक पुरानी तस्वीर ने करीब 12 साल पहले किए गए एक सामाजिक प्रयास की यादें ताजा कर दी हैं। तस्वीरें प्रभात रंजन की सोशल मीडिया प्रोफाइल पर साझा की गई पुरानी पोस्ट से जुड़ी हैं, जिसमें वाराणसी के राजकीय बाल गृह में रहने वाले बच्चों के बीच शिक्षा, प्रशिक्षण और रचनात्मक गतिविधियों की झलक दिखाई देती है। वर्ष 2014 की इस पोस्ट में बच्चों को कंप्यूटर पर प्रशिक्षण लेते, कला से जुड़ी गतिविधियों में हिस्सा लेते और संगीत सीखते देखा जा सकता है।

यह तस्वीरें ऐसे समय की याद दिलाती हैं जब बाल गृहों में रहने वाले बच्चों के लिए पढ़ाई के साथ-साथ उनके व्यक्तित्व विकास और व्यावहारिक कौशल को बढ़ावा देने की कोशिशें भी की जा रही थीं। पोस्ट में उल्लेख है कि तत्कालीन समय में विभिन्न सामाजिक संगठनों, समाजसेवी बंधुओं और अधिकारियों के सहयोग तथा नई पहल के माध्यम से महिला कल्याण विभाग के बाल गृह संस्थान में रहने वाले सामान्य एवं मानसिक रूप से दिव्यांग बच्चों की पढ़ाई के साथ बहुआयामी व्यक्तित्व निर्माण और विकास की दिशा में प्रयास किया गया था।

पुरानी तस्वीरों में दिखी बच्चों की अलग दुनिया

साझा तस्वीरों में सबसे प्रमुख दृश्य कंप्यूटर प्रशिक्षण का है। कई बच्चे एक साथ कंप्यूटर पर अभ्यास करते दिखाई दे रहे हैं। तस्वीर का यह पहलू खास इसलिए है क्योंकि करीब एक दशक से अधिक समय पहले बाल गृह के बच्चों को डिजिटल माध्यम से जोड़ने की कोशिश उस दौर में शिक्षा को पारंपरिक तरीके से आगे ले जाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयोग के रूप में देखी जा सकती है।

अन्य तस्वीरों में बच्चों को कला और रचनात्मक गतिविधियों में भाग लेते हुए देखा जा सकता है। एक तस्वीर में बच्चे पेंटिंग और क्राफ्ट जैसी गतिविधियों में व्यस्त हैं, जबकि दूसरी तस्वीर में संगीत से जुड़ी गतिविधि दिखाई देती है। एक अन्य तस्वीर में बच्चे सामूहिक रूप से मुस्कुराते और आनंद लेते नजर आ रहे हैं। इन तस्वीरों से यह संदेश मिलता है कि बच्चों के विकास को केवल किताबों और कक्षाओं तक सीमित रखने के बजाय उन्हें अलग-अलग गतिविधियों से जोड़ने पर भी ध्यान दिया गया था।

सोशल मीडिया की याद ने फिर खींचा ध्यान

आज सोशल मीडिया पर पुरानी पोस्ट और तस्वीरें अक्सर बीते वर्षों के ऐसे प्रयासों को दोबारा चर्चा में ले आती हैं, जिनकी उस समय व्यापक डिजिटल पहुंच नहीं थी। प्रभात रंजन की प्रोफाइल पर दिखाई गई पोस्ट भी इसी तरह की एक पुरानी स्मृति है। स्क्रीनशॉट में 2014 की पोस्ट के साथ ‘12 Years Ago’ की मेमोरी दिखाई दे रही है।

वर्तमान प्रोफाइल स्क्रीनशॉट में प्रभात रंजन को डिजिटल क्रिएटर के रूप में दिखाया गया है और प्रोफाइल पर वाराणसी का उल्लेख है। वहीं शिक्षा के तौर पर यूनिवर्सिटी ऑफ इलाहाबाद का नाम दिखाई देता है। स्क्रीनशॉट में व्यक्तिगत विवरण के तहत वाराणसी और गाजीपुर का भी उल्लेख है।

हालांकि, सोशल मीडिया प्रोफाइल में दर्ज जानकारियों को किसी व्यक्ति की वर्तमान पेशेवर या सामाजिक भूमिका का अंतिम प्रमाण नहीं माना जाना चाहिए। इसलिए पुरानी पोस्ट को उसी समय के प्रयास और उपलब्ध तस्वीरों के संदर्भ में देखना अधिक उचित है।

शिक्षा के साथ व्यक्तित्व विकास पर जोर

बाल संरक्षण संस्थानों में रहने वाले बच्चों के लिए शिक्षा का अर्थ केवल औपचारिक पढ़ाई नहीं है। ऐसे बच्चों को सामाजिक वातावरण, रचनात्मक गतिविधियों, तकनीकी ज्ञान, खेल और सांस्कृतिक गतिविधियों से जोड़ना उनके आत्मविश्वास को बढ़ाने में मदद कर सकता है।

2014 की इन तस्वीरों में भी यही व्यापक दृष्टिकोण दिखाई देता है। कंप्यूटर प्रशिक्षण बच्चों को तकनीक से जोड़ने का प्रयास दिखाता है, जबकि कला और संगीत जैसी गतिविधियां रचनात्मक अभिव्यक्ति का अवसर देती हैं। सामूहिक गतिविधियां बच्चों में सहयोग, संवाद और सामाजिक जुड़ाव की भावना विकसित करने में सहायक हो सकती हैं।

आज जब डिजिटल शिक्षा, स्किल डेवलपमेंट और समावेशी शिक्षा पर लगातार जोर दिया जा रहा है, तब वर्षों पुरानी यह तस्वीर एक अलग संदर्भ में महत्वपूर्ण नजर आती है। इसमें उस समय की कोशिशों की एक झलक मिलती है, जब संसाधनों के सीमित होने के बावजूद बच्चों को नई गतिविधियों से जोड़ने की पहल की जा रही थी।

दिव्यांग बच्चों के लिए समावेशी सोच का संकेत

पोस्ट में सामान्य बच्चों के साथ मानसिक रूप से दिव्यांग बच्चों के लिए भी शिक्षा और बहुआयामी व्यक्तित्व विकास की दिशा में प्रयास का उल्लेख है।

समावेशी शिक्षा का मूल विचार यही है कि हर बच्चे को उसकी क्षमता और जरूरत के अनुसार सीखने तथा अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर मिले। कला, संगीत, कंप्यूटर और सामूहिक गतिविधियां इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

हालांकि उपलब्ध तस्वीरें किसी कार्यक्रम की पूरी प्रक्रिया, अवधि या उसके परिणामों का विस्तृत रिकॉर्ड नहीं देतीं। इसलिए इन तस्वीरों के आधार पर केवल इतना कहा जा सकता है कि पोस्ट में ऐसे प्रयास का उल्लेख और उससे संबंधित गतिविधियों की तस्वीरें साझा की गई थीं।

12 साल बाद भी तस्वीरें क्यों हैं खास?

पुरानी तस्वीरों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे किसी बड़े आयोजन की चमक-दमक से ज्यादा बच्चों के रोजमर्रा के सीखने और आगे बढ़ने की कोशिश को सामने लाती हैं। कंप्यूटर के सामने बैठे बच्चे, संगीत सीखता बच्चा, कला गतिविधि में जुटे विद्यार्थी और सामूहिक रूप से मुस्कुराते चेहरे—ये सभी तस्वीरें उस दौर के एक प्रयास की कहानी अपने तरीके से बयान करती हैं।

सोशल मीडिया की ‘मेमोरी’ सुविधा ने इस पुराने रिकॉर्ड को फिर सामने ला दिया। इसी वजह से करीब 12 साल पहले की यह पोस्ट वर्तमान में भी लोगों का ध्यान खींचने वाली सामग्री बन सकती है। खासकर वाराणसी और सामाजिक कार्यों से जुड़े पाठकों के लिए यह तस्वीरें शहर के पुराने सामाजिक प्रयासों की एक झलक प्रस्तुत करती हैं।

आज के दौर में संदेश और भी प्रासंगिक

आज बच्चों की शिक्षा में डिजिटल लर्निंग, स्किल डेवलपमेंट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और तकनीकी प्रशिक्षण तेजी से शामिल हो रहे हैं। ऐसे समय में 2014 की ये तस्वीरें यह याद दिलाती हैं कि तकनीक और रचनात्मक गतिविधियों को बच्चों की शिक्षा से जोड़ने की सोच नई नहीं है।

इन तस्वीरों का महत्व किसी दावे से ज्यादा उस विचार में है, जिसमें बाल गृह में रहने वाले बच्चों को केवल संरक्षण देने के बजाय उन्हें सीखने, अपनी प्रतिभा पहचानने और व्यक्तित्व विकसित करने के अवसर देने की कोशिश दिखाई देती है।

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