नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने डिजिटल समाचार पोर्टल ‘न्यूजक्लिक’ (NewsClick) और इसके संस्थापक-संपादक प्रबीर पुरकायस्थ को एक बहुत बड़ी कानूनी राहत दी है। अदालत ने विदेशी फंडिंग मामले में दर्ज दिल्ली पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) की एफआईआर और उसके आधार पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) द्वारा शुरू की गई मनी लॉन्ड्रिंग की जांच को पूरी तरह से रद्द कर दिया है।
मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस नीना बंसल कृष्णा की एकल पीठ ने जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर बेहद सख्त और तल्ख टिप्पणियां कीं। कोर्ट ने कहा:
“यह पूरी कार्रवाई स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता पर शक्तियों का मनमाना हमला और दुरुपयोग थी। जांच एजेंसियां किसी ठोस साक्ष्य के बिना ही व्यापक और अंतहीन जांच करती रहीं। एफआईआर को जारी रखना कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग था।”
अदालत ने यह भी साफ किया कि धोखाधड़ी (Cheating) के मामलों में कोई एक ऐसा पक्ष होना चाहिए जिसके साथ धोखा हुआ हो, लेकिन इस पूरे मामले में ऐसी कोई शिकायत या पीड़ित पक्ष ही मौजूद नहीं था।
न्यूजक्लिक और प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की शुरुआत साल 2020 में हुई थी, जिसकी कड़ियाँ कुछ इस प्रकार जुड़ी थीं:
अगस्त 2020 (दिल्ली पुलिस की FIR): आर्थिक अपराध शाखा ने आरोप लगाया कि न्यूजक्लिक को एक अमेरिकी कंपनी (वर्ल्डवाइड मीडिया होल्डिंग्स LLC) से ₹9.59 करोड़ का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) मिला। आरोप था कि ₹10 के शेयर को ₹11,510 के भारी-भरकम प्रीमियम पर खरीदा गया ताकि मीडिया में 26% FDI की कानूनी सीमा को बाईपास किया जा सके।
ED की एंट्री और छापेमारी: इस एफआईआर के आधार पर प्रवर्तन निदेशालय ने मनी लॉन्ड्रिंग (PMLA) के तहत केस दर्ज किया। न्यूजक्लिक के दफ्तरों, निदेशकों और शेयरधारकों के ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापेमारी की गई, जहां से डिजिटल साक्ष्य और दस्तावेज सीज किए गए।
₹38 करोड़ का दावा: ED ने अपनी जांच में दावा किया था कि न्यूजक्लिक को 3 साल के भीतर कुल ₹38.05 करोड़ का विदेशी फंड मिला (जिसमें ₹9.59 करोड़ FDI और ₹28.46 करोड़ एक्सपोर्ट ऑफ सर्विसेज के नाम पर थे)।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कर दिया कि अगर एफआईआर में लगाए गए सभी आरोपों को पूरी तरह सच भी मान लिया जाए, तब भी कानूनन धोखाधड़ी (Section 420) या आपराधिक विश्वासघात (Criminal Breach of Trust) का कोई मामला नहीं बनता है।
इस फैसले को भारतीय मीडिया जगत में प्रेस की आजादी के लिए एक ऐतिहासिक जीत के रूप में देखा जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला उन मामलों में एक नजीर (Precedent) बनेगा जहां बिना किसी ठोस और प्राथमिक सबूत के मीडिया घरानों के खिलाफ केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल किया जाता है।