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वैदिक ज्ञान परंपरा और आचार्य परंपरा पर मंथन, राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन

नई दिल्ली : दिल्ली शिक्षक विश्वविद्यालय और संस्कृत संवर्धन प्रतिष्ठान (Samskrit Promotion Foundation) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी “वैदिक वाङ्मय में शिक्षा” का दूसरा एवं अंतिम दिन भारतीय ज्ञान परंपरा, वैदिक शिक्षा, आचार्य परंपरा तथा आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में भारतीय दृष्टिकोण की प्रासंगिकता पर गंभीर विमर्श के साथ संपन्न हुआ। कार्यक्रम में […]

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  • July 25, 2026 8:30 pm IST, Published 1 hour ago

नई दिल्ली : दिल्ली शिक्षक विश्वविद्यालय और संस्कृत संवर्धन प्रतिष्ठान (Samskrit Promotion Foundation) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित द्विदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी “वैदिक वाङ्मय में शिक्षा” का दूसरा एवं अंतिम दिन भारतीय ज्ञान परंपरा, वैदिक शिक्षा, आचार्य परंपरा तथा आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में भारतीय दृष्टिकोण की प्रासंगिकता पर गंभीर विमर्श के साथ संपन्न हुआ। कार्यक्रम में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों से जुड़े शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं तथा विद्वानों ने भाग लेकर वैदिक शिक्षा के दार्शनिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक आयामों पर अपने विचार रखे।

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संगोष्ठी के प्रथम सत्र में केंद्रीय तिब्बती उच्च शिक्षा संस्थान, सारनाथ के कुलपति प्रो. वांगचुक दोरजी नेगी ने कहा कि भारतीय शिक्षा की मूल आत्मा गुरु-शिष्य परंपरा में निहित है। उन्होंने कहा कि भगवान बुद्ध के काल से ही गुरु और शिष्य के बीच ज्ञान का जीवंत संवाद भारतीय शिक्षा प्रणाली की सबसे बड़ी विशेषता रहा है। उन्होंने आचार्य परंपरा के स्वरूप, उसके विकास और वर्तमान समय में उसकी उपयोगिता पर प्रकाश डाला।

इसके बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभागाध्यक्ष प्रो. भारतेंदु पाण्डेय ने “आचार्य परंपरा का सातत्य” विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि गुरु-शिष्य परंपरा केवल ज्ञान का हस्तांतरण नहीं, बल्कि जीवन मूल्यों के संवहन का माध्यम है। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा में आचार्य की केंद्रीय भूमिका को रेखांकित किया।

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के भारतीय अध्ययन केंद्र से जुड़े प्रो. रामनाथ झा ने “वैदिक शिक्षा का स्वरूप, उद्देश्य एवं दार्शनिक आधार” विषय पर अपने विचार रखते हुए कहा कि वैदिक शिक्षा केवल सूचना या ज्ञान अर्जित करने का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मबोध, नैतिकता, धर्म, लोकमंगल और व्यक्तित्व निर्माण की समग्र प्रक्रिया है। उन्होंने कहा कि भारतीय शिक्षा अनुभव-आधारित ज्ञान को सर्वोच्च महत्व देती है।

दिल्ली शिक्षक विश्वविद्यालय के अकादमिक संकाय के डॉ. राजेश प्रसाद सिंह ने “आचार्य का आचार्यत्व” विषय पर व्याख्यान देते हुए आदर्श शिक्षक के गुणों, उत्तरदायित्वों और नैतिक मूल्यों की विस्तृत चर्चा की। उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के आलोक में शोधोन्मुख एवं विद्यार्थी-केंद्रित शिक्षा व्यवस्था की आवश्यकता पर बल दिया।

प्रख्यात लेखक एवं पत्रकार मोहन सिंह ने “वैदिक वाङ्मय में शिक्षा का उद्देश्य” विषय पर कहा कि वैदिक शिक्षा का अंतिम लक्ष्य केवल रोजगार नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण, सामाजिक उत्तरदायित्व, नैतिकता और राष्ट्र निर्माण है। उनके अनुसार शिक्षा व्यक्ति में सह-अस्तित्व और विश्वबंधुत्व की भावना विकसित करती है।

रांची विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. सरोज शर्मा ने “भारतीय ज्ञान परंपरा में विद्वानों का योगदान” विषय पर कहा कि भारतीय बौद्धिक परंपरा ने गर्गी, मैत्रेयी, घोषा और लोपामुद्रा जैसी विदुषियों के माध्यम से ज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं की महत्त्वपूर्ण भूमिका को स्थापित किया है। उन्होंने भारतीय परंपरा की समावेशी सोच पर प्रकाश डाला।

अंतिम तकनीकी सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ. आयुष शर्मा ने “वैदिक वाङ्मय में विज्ञान एवं गणित के शैक्षिक संकेत” विषय पर कहा कि वैदिक साहित्य में वैज्ञानिक चिंतन, गणितीय अवधारणाओं और प्रकृति-आधारित ज्ञान के अनेक सूत्र उपलब्ध हैं, जिनका आधुनिक अनुसंधान एवं शिक्षा में प्रभावी उपयोग किया जा सकता है।

समापन समारोह में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के वैदिक विज्ञान केंद्र के समन्वयक प्रो. विजय कुमार पाण्डेय ने भारतीय ज्ञान परंपरा को वर्तमान शिक्षा व्यवस्था का सुदृढ़ आधार बताते हुए वैदिक चिंतन को व्यवहारिक जीवन से जोड़ने का आह्वान किया।

दिल्ली विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग के आचार्य प्रो. दया शंकर तिवारी ने कहा कि भारतीय भाषाओं और संस्कृत के माध्यम से ज्ञान परंपरा को सशक्त बनाया जा सकता है। वहीं श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. श्रीनिवास वर्कहेड़ी ने भारतीय शिक्षा की मूल आत्मा को पुनर्स्थापित करने के लिए गुरुकुलीय मूल्यों और आधुनिक शिक्षा के समन्वय पर बल दिया।

श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मुरली मनोहर पाठक ने अपने प्रेरक उद्बोधन में कहा कि वैदिक शिक्षा व्यवस्था आज भी वैश्विक स्तर पर मानवता के समक्ष उपस्थित नैतिक एवं सांस्कृतिक चुनौतियों का प्रभावी समाधान प्रस्तुत करने में सक्षम है। उन्होंने कहा कि भारतीय शिक्षा की मूल आत्मा को पुनर्स्थापित करने के लिए गुरुकुलीय मूल्यों और आधुनिक शिक्षा के समन्वय की आवश्यकता है। उनके अनुसार, भारतीय ज्ञान परंपरा और आधुनिक शिक्षा का संतुलित समन्वय ही नई पीढ़ी को संस्कार, ज्ञान और नवाचार से समृद्ध बना सकता है। उन्होंने शिक्षण संस्थानों से इस दिशा में ठोस प्रयास करने का आह्वान किया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्कृत संवर्धन प्रतिष्ठान के अकादमिक निदेशक एवं संगोष्ठी के संरक्षक प्रो. चन्द्र किरण सलूजा ने की। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ने का महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करती है और इस दिशा में यह संगोष्ठी एक सार्थक अकादमिक पहल सिद्ध हुई है।

कार्यक्रम का सफल संचालन डॉ. राजेश प्रसाद सिंह ने किया, जबकि अंत में दिल्ली शिक्षक विश्वविद्यालय के डॉ. संजीव राय ने सभी अतिथियों, विद्वानों, प्रतिभागियों और आयोजकों के प्रति आभार व्यक्त किया। दो दिवसीय इस राष्ट्रीय संगोष्ठी में देशभर के विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों, शोध संस्थानों, शिक्षकों, शोधार्थियों और विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी रही। आयोजन ने भारतीय ज्ञान परंपरा, वैदिक शिक्षा और समकालीन शिक्षा के बीच सार्थक संवाद स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक आधार प्रदान किया।

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