नई दिल्ली: सोशल मीडिया पर इन दिनों एक पोस्ट तेजी से वायरल हो रही है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि हाईकोर्ट ने साफ फैसला दिया है कि चौथे बच्चे के लिए महिला कर्मचारी को मेटरनिटी लीव नहीं मिलेगी। वायरल पोस्ट में इसे एक बड़े कानूनी फैसले के तौर पर पेश किया गया है। हालांकि, उपलब्ध न्यायिक फैसलों और हालिया अदालती आदेशों को देखने पर तस्वीर इतनी सीधी नहीं है। मेटरनिटी लीव का अधिकार केवल बच्चों की संख्या गिनकर तय नहीं किया जा सकता और अलग-अलग सेवा नियमों के आधार पर स्थिति अलग हो सकती है।
वायरल दावे में कितनी सच्चाई?
वायरल पोस्ट का सबसे अहम हिस्सा यह है कि इसमें “चौथे बच्चे के लिए कोई मेटरनिटी लीव नहीं मिलेगी” जैसा व्यापक दावा किया गया है। लेकिन हालिया न्यायिक मामलों में अदालतों ने तीसरी संतान के मामले में भी अलग-अलग परिस्थितियों को ध्यान में रखा है। इसलिए किसी एक फैसले को सभी सरकारी कर्मचारियों और हर चौथी गर्भावस्था पर लागू मानना सही नहीं होगा।
मेटरनिटी लीव से जुड़े मामलों में यह देखना जरूरी होता है कि महिला किस सेवा नियम के अंतर्गत आती है, संबंधित राज्य या विभाग में क्या प्रावधान हैं और बच्चे पहले से किस परिस्थिति में हैं।
सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला क्या कहता है?
मेटरनिटी लीव को लेकर सुप्रीम कोर्ट का 2025 का फैसला बेहद महत्वपूर्ण है। K. Umadevi बनाम Government of Tamil Nadu मामले में अदालत ने ऐसी महिला कर्मचारी के मामले पर विचार किया था, जिसे तीसरे बच्चे के लिए मेटरनिटी लीव से वंचित किया गया था। मामला दूसरी शादी और पहले विवाह से बच्चों की कस्टडी से जुड़ी विशेष परिस्थितियों वाला था।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि पहले विवाह से हुए दो बच्चे मां के साथ नहीं रह रहे थे और उनकी कस्टडी पिता के पास थी। इसलिए केवल बच्चों की संख्या गिनकर मेटरनिटी बेनिफिट से इनकार करना उचित नहीं था। अदालत ने मेटरनिटी बेनिफिट को महिला के प्रजनन अधिकार और बच्चे के कल्याण से भी जोड़कर देखा।
इस फैसले से यह संकेत मिलता है कि मेटरनिटी लीव के मामलों में परिस्थितियों की पूरी जांच जरूरी है।
मद्रास हाईकोर्ट के फैसलों से बदली तस्वीर
2026 में मद्रास हाईकोर्ट में मेटरनिटी लीव को लेकर कई महत्वपूर्ण मामले सामने आए हैं। जनवरी 2026 में एक मामले में अदालत ने तीसरी गर्भावस्था के लिए मेटरनिटी लीव को केवल इस आधार पर खारिज किए जाने को गलत माना। कोर्ट ने संबंधित महिला को मेटरनिटी लीव का लाभ देने का निर्देश दिया।
इसके बाद अप्रैल 2026 में शायee निशा के मामले में मद्रास हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने तीसरी गर्भावस्था के लिए मेटरनिटी लीव को लेकर महत्वपूर्ण आदेश दिया। अदालत ने राज्य सरकार के उस आदेश को चुनौती देने वाली याचिका स्वीकार की, जिसमें तीसरी गर्भावस्था के लिए छुट्टी को 12 सप्ताह तक सीमित किया गया था।
इससे साफ है कि तीसरी संतान के मामले में भी कानून और न्यायालयों का दृष्टिकोण परिस्थितियों तथा लागू नियमों पर निर्भर करता है।
फिर 12 सप्ताह वाली व्यवस्था क्या है?
यहां एक और महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है। जून 2026 के एक अन्य मद्रास हाईकोर्ट मामले में अदालत ने तमिलनाडु के संशोधित Fundamental Rule 101(A) के आधार पर तीसरे बच्चे के लिए मेटरनिटी लीव को 12 सप्ताह तक सीमित माना। यह फैसला राज्य सरकार द्वारा मार्च 2026 में किए गए नियम संशोधन और सुप्रीम कोर्ट के संबंधित फैसले के संदर्भ में आया था।
यानी एक ही विषय पर अलग-अलग परिस्थितियों में अलग कानूनी सवाल सामने आ सकते हैं। इसलिए यह कहना कि “अब चौथे बच्चे के लिए पूरे देश में मेटरनिटी लीव पूरी तरह खत्म हो गई है”, उपलब्ध फैसलों से साबित नहीं होता।
मेटरनिटी लीव और चाइल्ड केयर लीव एक नहीं
मेटरनिटी लीव को चाइल्ड केयर लीव यानी CCL से भी अलग समझना चाहिए। मेटरनिटी लीव गर्भावस्था, प्रसव के बाद महिला के स्वास्थ्य और नवजात बच्चे की शुरुआती देखभाल से संबंधित है। वहीं CCL का उद्देश्य बच्चे की देखभाल के लिए कर्मचारी को छुट्टी उपलब्ध कराना है।
एक 2026 के मामले में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण ने भी स्पष्ट किया कि चाइल्ड केयर लीव को मेटरनिटी लीव के विकल्प के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
क्या चौथे बच्चे के लिए छुट्टी बिल्कुल नहीं मिलेगी?
इस सवाल का जवाब हर महिला कर्मचारी के लिए एक जैसा नहीं है।
यदि किसी कर्मचारी के सेवा नियमों में बच्चों की संख्या के आधार पर मेटरनिटी लीव की सीमा निर्धारित है, तो उस नियम का प्रभाव पड़ सकता है। वहीं किसी अन्य कानून, राज्य नियम या न्यायालय के फैसले के कारण स्थिति अलग हो सकती है।
मेटरनिटी बेनिफिट एक्ट और सरकारी सेवा नियमों को भी एक ही चीज नहीं माना जा सकता। किस कर्मचारी पर कौन सा नियम लागू होगा, यह उसके रोजगार और संस्थान की प्रकृति पर निर्भर करता है।
वायरल पोस्ट को देखकर जल्दबाजी में न बनाएं राय
सोशल मीडिया पोस्ट में अक्सर किसी अदालत के फैसले की एक लाइन को बड़े दावे के साथ प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन न्यायिक आदेशों में मामले की पूरी पृष्ठभूमि, संबंधित नियम और महिला की परिस्थितियां महत्वपूर्ण होती हैं।
मेटरनिटी लीव से जुड़े हालिया मामलों में अदालतों ने महिला के स्वास्थ्य, बच्चे के हित, प्रजनन अधिकार और लागू सेवा नियमों के बीच संतुलन बनाने पर जोर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले में भी मेटरनिटी बेनिफिट को व्यापक सामाजिक कल्याण के उद्देश्य से जोड़कर देखा गया है।
इसलिए वायरल दावे “चौथे बच्चे के लिए किसी भी महिला को मेटरनिटी लीव नहीं मिलेगी” को सामान्य और सार्वभौमिक कानूनी नियम के रूप में समझना सही नहीं होगा। मेटरनिटी लीव का अधिकार संबंधित महिला की नौकरी, लागू सेवा नियम, बच्चों की स्थिति और अदालतों द्वारा दिए गए निर्देशों पर निर्भर कर सकता है।
महिलाओं और सरकारी कर्मचारियों को सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर अपनी छुट्टी का अधिकार तय करने के बजाय अपने विभाग के लागू नियम और संबंधित आधिकारिक आदेश जरूर देखने चाहिए। हालिया न्यायिक फैसले यह भी दिखाते हैं कि सिर्फ बच्चों की संख्या के आधार पर हर मामले में एक जैसा निष्कर्ष निकालना कानूनी रूप से सही नहीं है।