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रेल नीर पर मचा हड़कंप! 100 गुना ब्रोमेट का दावा कितना सच?

नई दिल्ली। रेलवे यात्रियों के बीच लोकप्रिय पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर ‘रेल नीर’ को लेकर सोशल मीडिया पर इन दिनों एक दावा तेजी से वायरल हो रहा है। वायरल पोस्ट में कहा जा रहा है कि रेल नीर की एक बोतल के लैब टेस्ट में ब्रोमेट की मात्रा निर्धारित सीमा से 100 गुना अधिक पाई गई […]

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  • September 6, 2026 7:30 am IST, Published 45 minutes ago

नई दिल्ली। रेलवे यात्रियों के बीच लोकप्रिय पैकेज्ड ड्रिंकिंग वाटर ‘रेल नीर’ को लेकर सोशल मीडिया पर इन दिनों एक दावा तेजी से वायरल हो रहा है। वायरल पोस्ट में कहा जा रहा है कि रेल नीर की एक बोतल के लैब टेस्ट में ब्रोमेट की मात्रा निर्धारित सीमा से 100 गुना अधिक पाई गई है। पोस्ट में यह भी दावा किया गया है कि इससे ब्लड प्रेशर और दिमाग पर गंभीर असर पड़ सकता है। हालांकि, उपलब्ध रिपोर्टों और हालिया घटनाक्रम की पड़ताल करने पर तस्वीर सोशल मीडिया पोस्ट से काफी अलग नजर आती है।

दरअसल, अगस्त 2026 में रेल नीर की गुणवत्ता को लेकर एक स्वतंत्र टेस्ट के दावे ने विवाद खड़ा किया। Trustified नाम के एक प्रोडक्ट-टेस्टिंग चैनल ने एक रेल नीर सैंपल की लैब जांच का हवाला देते हुए ब्रोमेट की मात्रा 0.084 मिलीग्राम प्रति लीटर बताई। रिपोर्ट में पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर के लिए 0.01 मिलीग्राम प्रति लीटर की सीमा का उल्लेख किया गया। इस हिसाब से संबंधित सैंपल में मात्रा निर्धारित सीमा से करीब 8.4 गुना अधिक बताई गई, न कि 100 गुना।

वायरल पोस्ट में 100 गुना दावा क्यों सवालों में?

सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीर में बड़े अक्षरों में दावा किया गया है कि रेल नीर में ब्रोमेट की मात्रा तय सीमा से 100 गुना ज्यादा मिली। लेकिन उपलब्ध मीडिया रिपोर्टों में जिस लैब टेस्ट का हवाला दिया गया है, उसमें आंकड़ा 0.084 mg/L बताया गया है। यदि तुलना 0.01 mg/L की सीमा से की जाए तो यह अंतर 8.4 गुना बनता है।

इसलिए वायरल पोस्ट में इस्तेमाल किया गया ‘100 गुना’ आंकड़ा उपलब्ध रिपोर्ट से मेल नहीं खाता। पाठकों के लिए यह अंतर समझना जरूरी है, क्योंकि किसी खाद्य या पेय पदार्थ की सुरक्षा से जुड़ी खबर में आंकड़े को बढ़ाकर प्रस्तुत करना अनावश्यक डर पैदा कर सकता है।

आखिर ब्रोमेट क्या है?

ब्रोमेट यानी Bromate एक ऐसा रासायनिक यौगिक है जो कुछ परिस्थितियों में पानी के उपचार के दौरान बन सकता है। खासकर ओजोन से पानी को डिसइन्फेक्ट करने की प्रक्रिया में ब्रोमाइड मौजूद होने पर ब्रोमेट बनने की संभावना रहती है।

यही वजह है कि पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर की गुणवत्ता जांच में ब्रोमेट जैसे अवांछित पदार्थों की निगरानी की जाती है। लंबे समय तक अधिक मात्रा में ब्रोमेट के संपर्क को लेकर स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं वैज्ञानिक और नियामकीय स्तर पर मौजूद हैं। लेकिन किसी एक सैंपल में निर्धारित सीमा से अधिक मात्रा मिलने का दावा अपने आप यह साबित नहीं करता कि किसी ब्रांड की हर बोतल में वही समस्या है।

IRCTC ने दावे पर क्या कदम उठाया?

विवाद बढ़ने के बाद IRCTC ने संबंधित सोशल मीडिया दावे पर कानूनी कार्रवाई शुरू की। रिपोर्टों के अनुसार, IRCTC ने अपने कानूनी विभाग के माध्यम से कार्रवाई शुरू की और मामले के लिए वकील नियुक्त किया। कंपनी ने रेल नीर की गुणवत्ता व्यवस्था का बचाव करते हुए कहा कि उत्पादन और गुणवत्ता जांच निर्धारित BIS और FSSAI मानकों के अनुरूप की जाती है।

IRCTC का पक्ष यह है कि किसी एक सैंपल से पूरे रेल नीर उत्पादन या सभी बैचों की गुणवत्ता पर निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।

इसी बीच रेलवे ने बढ़ाई पानी की जांच

रेल नीर को लेकर सोशल मीडिया पर सवाल उठने के बाद रेलवे की ओर से स्टेशनों पर खाद्य और पेय पदार्थों की गुणवत्ता जांच को लेकर अभियान तेज किए जाने की खबर सामने आई। रिपोर्ट के मुताबिक रेलवे ने पानी की सुविधाओं, वेंडिंग मशीनों और स्टेशनों पर उपलब्ध पेयजल की जांच भी शुरू की। मुंबई डिवीजन में कैटरिंग इकाइयों पर भी कार्रवाई की गई।

इससे साफ है कि पानी की गुणवत्ता को लेकर उठे सवालों को रेलवे ने गंभीरता से लिया है। हालांकि, यह कार्रवाई वायरल दावे की पुष्टि नहीं मानी जा सकती।

बड़ी पड़ताल में रेल नीर को मिली थी अच्छी रेटिंग

दिलचस्प बात यह है कि Consumer Voice की जून-जुलाई 2026 की पैकेज्ड ड्रिंकिंग वॉटर तुलना में रेल नीर और किंगफिशर प्रीमियम को शीर्ष प्रदर्शन करने वाले ब्रांडों में रखा गया था। रिपोर्ट के अनुसार 10 प्रमुख पैकेज्ड वॉटर ब्रांडों का परीक्षण NABL-मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला में किया गया था और परीक्षण में ब्रोमेट समेत कई रासायनिक, माइक्रोबायोलॉजिकल और अन्य पैरामीटर शामिल थे। इस तुलना में रेल नीर ने कुल 93.55 अंक हासिल किए और शीर्ष स्थान साझा किया। रिपोर्ट ने परीक्षण किए गए सभी ब्रांडों को राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बताया था।

यह जानकारी वायरल दावे को और महत्वपूर्ण बनाती है, क्योंकि अलग-अलग परीक्षणों के नतीजों में अंतर हो सकता है। सैंपल का बैच, उत्पादन संयंत्र, निर्माण तारीख, परीक्षण की तारीख और प्रयोगशाला की प्रक्रिया जैसे कारक किसी भी जांच के परिणाम को प्रभावित कर सकते हैं।

यात्रियों को क्या करना चाहिए?

रेल नीर को लेकर सोशल मीडिया पर वायरल पोस्ट देखकर तुरंत घबराने की जरूरत नहीं है। साथ ही, पानी की गुणवत्ता से जुड़े किसी भी गंभीर लैब टेस्ट को पूरी तरह नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा। सबसे सही तरीका है कि आधिकारिक जांच, प्रमाणित प्रयोगशाला रिपोर्ट और नियामकीय एजेंसियों के निष्कर्ष सामने आने का इंतजार किया जाए।

यात्री बोतल खरीदते समय सील, निर्माण तिथि, बैच नंबर, लेबल और पैकेज की स्थिति जरूर देखें। यदि बोतल की सील टूटी हुई हो, पानी का रंग या गंध असामान्य हो या पैकेजिंग संदिग्ध लगे तो उसे इस्तेमाल न करना बेहतर है।

निष्कर्ष

रेल नीर को लेकर वायरल पोस्ट ने यात्रियों की चिंता जरूर बढ़ा दी है, लेकिन ‘ब्रोमेट 100 गुना ज्यादा’ वाला दावा उपलब्ध रिपोर्ट के आंकड़ों से पुष्ट नहीं होता। सामने आई रिपोर्ट में एक सैंपल के लिए 0.084 mg/L ब्रोमेट का दावा और 0.01 mg/L की निर्धारित सीमा के आधार पर करीब 8.4 गुना अधिक होने की बात कही गई थी। दूसरी ओर IRCTC ने दावे का विरोध करते हुए अपनी गुणवत्ता नियंत्रण व्यवस्था का बचाव किया है।

इसलिए फिलहाल पूरे रेल नीर ब्रांड को असुरक्षित घोषित करना उचित नहीं होगा। मामला एक कथित सैंपल की जांच, उसके स्वतंत्र सत्यापन और संबंधित अधिकारियों के निष्कर्ष से जुड़ा है। यात्रियों को सोशल मीडिया के सनसनीखेज दावों के बजाय प्रमाणित रिपोर्टों पर भरोसा करना चाहिए।

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