पटना, बिहार। भारतीय रसोई में हल्दी का इस्तेमाल लगभग हर घर में होता है। भोजन को रंग और स्वाद देने के साथ-साथ हल्दी को पारंपरिक रूप से औषधीय गुणों के लिए भी जाना जाता है। लेकिन बिहार की राजधानी पटना के दानापुर बाजार से सामने आई एक रिपोर्ट ने इस रोजमर्रा के मसाले की गुणवत्ता और सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, खाद्य सुरक्षा विभाग की जांच के दौरान हल्दी के लगभग 70 प्रतिशत नमूनों में निर्धारित मानक से अधिक सीसा (लेड) पाया गया है।
न्यूज़24 की रिपोर्ट में किए गए इस दावे ने उपभोक्ताओं के बीच चिंता बढ़ा दी है। हालांकि, जांच की विस्तृत आधिकारिक रिपोर्ट, कुल नमूनों की संख्या और संबंधित विक्रेताओं के बारे में पूरी जानकारी की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है।
हल्दी की जांच में सामने आई गंभीर तस्वीर
प्रकाशित रिपोर्टों के मुताबिक, खाद्य सुरक्षा विभाग ने दानापुर की मसाला मंडी में लगभग एक दर्जन दुकानों से हल्दी के 35 नमूने एकत्र किए। इनकी जांच पोर्टेबल एक्स-रे फ्लोरेसेंस मशीन से की गई। लगभग 28 नमूनों में लेड क्रोमेट की मौजूदगी दर्ज की गई, जबकि करीब 70 प्रतिशत नमूनों में इसकी मात्रा निर्धारित सीमा से अधिक होने की बात सामने आई।
यह जांच स्थानीय बाजार से लिए गए नमूनों तक सीमित थी। इसलिए इसके परिणामों को पटना या बिहार में बिकने वाली सभी प्रकार की हल्दी पर लागू नहीं किया जा सकता।
आखिर हल्दी में क्यों मिलाया जाता है लेड क्रोमेट?
हल्दी को आकर्षक और चमकीला पीला रंग देने के लिए कुछ कारोबारी लेड क्रोमेट जैसे हानिकारक रसायनों की मिलावट करते हैं। इससे हल्दी की बाहरी चमक बढ़ सकती है और खराब गुणवत्ता वाली हल्दी भी देखने में अच्छी लग सकती है।
वैज्ञानिक अध्ययनों में भी हल्दी की आपूर्ति व्यवस्था के विभिन्न स्तरों पर सीसे की मिलावट की समस्या सामने आ चुकी है। यह स्थिति मसालों की गुणवत्ता की नियमित जांच और आपूर्ति व्यवस्था में निगरानी की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
सेहत के लिए कितना खतरनाक है सीसा?
सीसा एक विषैला भारी धातु तत्व है। लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से मस्तिष्क, तंत्रिका तंत्र, गुर्दों और हृदय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। बच्चों और गर्भवती महिलाओं के लिए इसका जोखिम विशेष रूप से गंभीर माना जाता है।
बच्चों में सीसे का संपर्क मस्तिष्क के विकास, सीखने की क्षमता और व्यवहार को प्रभावित कर सकता है। समस्या यह है कि शरीर में सीसा पहुंचने के बाद शुरुआती चरण में स्पष्ट लक्षण दिखाई देना जरूरी नहीं है।
हालांकि, दूषित हल्दी के सेवन से होने वाला वास्तविक स्वास्थ्य जोखिम उसमें मौजूद सीसे की मात्रा, सेवन की अवधि और व्यक्ति की उम्र सहित कई कारकों पर निर्भर करता है।
खाद्य सुरक्षा विभाग ने दुकानदारों को किया सतर्क
दानापुर में चलाए गए अभियान के दौरान खाद्य सुरक्षा अधिकारियों ने विक्रेताओं को हल्दी की गुणवत्ता और मिलावट से जुड़े संभावित स्वास्थ्य खतरों के बारे में जानकारी दी।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, अभियान में खाद्य संरक्षा विभाग के अभिहित पदाधिकारी सुदामा चौधरी और खाद्य संरक्षा पदाधिकारी डॉ. सुदिन कुमार सुमन सहित विभागीय टीम मौजूद रही। अधिकारियों ने दुकानदारों से सुरक्षित और प्रमाणित स्रोतों से ही हल्दी खरीदने तथा खाद्य सुरक्षा मानकों का पालन करने की अपील की। नियमों के उल्लंघन पर कानूनी कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई।
हल्दी खरीदते समय किन बातों का रखें ध्यान?
दानापुर में सामने आए जांच परिणामों के बाद उपभोक्ताओं के लिए भी सावधानी बरतना जरूरी है। अत्यधिक चमकीले पीले रंग वाली हल्दी खरीदते समय सतर्क रहें। हालांकि, केवल रंग देखकर मिलावट की निश्चित पहचान नहीं की जा सकती।
पैकिंग वाली हल्दी खरीदते समय निर्माता का नाम, एफएसएसएआई लाइसेंस नंबर, निर्माण और समाप्ति की तारीख जरूर देखें। विश्वसनीय विक्रेताओं और गुणवत्ता जांच की जानकारी उपलब्ध कराने वाले उत्पादों को प्राथमिकता दें।
साबुत हल्दी खरीदकर घर पर पिसवाना भी एक विकल्प है, लेकिन इससे सीसे की अनुपस्थिति की गारंटी नहीं मिलती। किसी उत्पाद की सुरक्षा की विश्वसनीय पुष्टि प्रयोगशाला जांच से ही हो सकती है।
एफएसएसएआई के मानक क्या कहते हैं?
भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) के निर्धारित गुणवत्ता मानकों के अनुसार, हल्दी और हल्दी पाउडर में लेड क्रोमेट की मिलावट प्रतिबंधित है। हल्दी के नमूनों में इसकी जांच का परिणाम नकारात्मक होना चाहिए।
दानापुर की घटना ने खाद्य पदार्थों की नियमित जांच, मसालों की आपूर्ति व्यवस्था में पारदर्शिता और बाजार में गुणवत्ता नियंत्रण की आवश्यकता को फिर सामने ला दिया है।
विशेषज्ञों के शोध से यह भी स्पष्ट होता है कि मिलावट की समस्या केवल खुदरा दुकानों तक सीमित नहीं है। प्रसंस्करण, पॉलिशिंग और थोक आपूर्ति के स्तर पर भी निगरानी महत्वपूर्ण है।
ऐसे में आवश्यक है कि संदिग्ध नमूनों की प्रयोगशाला जांच हो, दूषित उत्पादों की आपूर्ति के स्रोतों का पता लगाया जाए और उपभोक्ताओं को प्रमाणित जांच परिणामों की जानकारी उपलब्ध कराई जाए।
दानापुर में हुई जांच उपभोक्ताओं और कारोबारियों, दोनों के लिए खाद्य सुरक्षा को गंभीरता से लेने का संकेत है। रोजाना इस्तेमाल होने वाले मसालों की गुणवत्ता सुनिश्चित करना सार्वजनिक स्वास्थ्य की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।