नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने अनैतिक देह व्यापार निवारण अधिनियम (ITPA) की व्याख्या करते हुए एक ऐतिहासिक और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई वयस्क महिला अपनी आजीविका के लिए स्वयं सेक्स वर्क करती है और उसके कार्य में किसी दलाल, एजेंट, मानव तस्करी गिरोह या अन्य महिला की भागीदारी नहीं है, तो केवल उसके निवास स्थान को “वेश्यालय” या “कोठा” नहीं माना जा सकता।
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने करीब 298 पृष्ठों के विस्तृत निर्णय में कहा कि अनैतिक देह व्यापार निवारण अधिनियम का मूल उद्देश्य वेश्यावृत्ति को पूरी तरह समाप्त करना या हर स्थिति में उसे अपराध घोषित करना नहीं है। कानून का मुख्य मकसद महिलाओं के शोषण, मानव तस्करी, दलाली और देह व्यापार के व्यावसायीकरण पर रोक लगाना है।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि समाज में सेक्स वर्क को अक्सर केवल शोषण और अपमानजनक दृष्टिकोण से देखा जाता है, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। कानून की व्याख्या करते समय यह ध्यान रखना आवश्यक है कि किसी वयस्क महिला की गरिमा, स्वतंत्रता और उसके संवैधानिक अधिकारों का भी संरक्षण हो।
पीठ ने कहा कि यदि कोई महिला अकेले अपने घर में यह कार्य करती है, जहां किसी अन्य महिला का शोषण नहीं हो रहा है और न ही किसी बाहरी व्यक्ति द्वारा इसका संचालन या प्रबंधन किया जा रहा है, तो उस स्थान को कानूनी रूप से वेश्यालय नहीं कहा जा सकता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में केवल नैतिक आधार पर किसी महिला को अपराधी की तरह नहीं देखा जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी दोहराया कि वयस्क और सहमति-आधारित सेक्स वर्क स्वयं में अपराध नहीं है। हालांकि, मानव तस्करी, दलाली, जबरन देह व्यापार, नाबालिगों का शोषण तथा किसी अन्य व्यक्ति की वेश्यावृत्ति से आर्थिक लाभ कमाना गंभीर अपराध हैं और इनके खिलाफ कानून सख्ती से लागू रहेगा।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला सेक्स वर्क और मानव तस्करी के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित करता है। इससे कानून प्रवर्तन एजेंसियों को भी यह समझने में मदद मिलेगी कि कार्रवाई का केंद्र शोषणकारी नेटवर्क होने चाहिए, न कि वे महिलाएं जो अपनी परिस्थितियों में स्वतंत्र रूप से जीवनयापन कर रही हैं।
इस निर्णय को महिलाओं की गरिमा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानवाधिकारों के दृष्टिकोण से एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले के माध्यम से यह संदेश दिया है कि कानून का उद्देश्य शोषण और अपराध को रोकना है, न कि किसी वयस्क व्यक्ति के सम्मानजनक जीवन जीने के अधिकार को बाधित करना।
यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों की सुनवाई और कानून की व्याख्या के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जाएगा तथा देशभर में सेक्स वर्क से जुड़े कानूनी और सामाजिक विमर्श को नई दिशा देगा।