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दिल्ली-रांची प्रदर्शन में इतना बड़ा फर्क, मेटा ने मांगा डेटा

नई दिल्ली/रांची। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर किसी पोस्ट की पहुंच और उसे मिलने वाले व्यूज का अंतर एक बार फिर चर्चा में है। दिल्ली के जंतर-मंतर और झारखंड की राजधानी रांची में हुए छात्र आंदोलनों से जुड़े इंस्टाग्राम पोस्ट के व्यूज में कथित तौर पर बड़ा अंतर सामने आने के बाद मेटा की कार्यप्रणाली […]

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  • August 14, 2026 11:30 pm IST, Published 3 minutes ago

नई दिल्ली/रांची। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर किसी पोस्ट की पहुंच और उसे मिलने वाले व्यूज का अंतर एक बार फिर चर्चा में है। दिल्ली के जंतर-मंतर और झारखंड की राजधानी रांची में हुए छात्र आंदोलनों से जुड़े इंस्टाग्राम पोस्ट के व्यूज में कथित तौर पर बड़ा अंतर सामने आने के बाद मेटा की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। मामला सामने आने के बाद सरकार ने भी इसकी जानकारी जुटानी शुरू कर दी है।

दरअसल, सोशल मीडिया पर यह चर्चा उस समय तेज हुई जब दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन से संबंधित पोस्ट को लाखों व्यूज मिलने की बात सामने आई, जबकि रांची में हुए आंदोलन से जुड़े पोस्ट अपेक्षाकृत कम लोगों तक पहुंचे। इसी अंतर को लेकर सोशल मीडिया यूजर्स के बीच सवाल उठने लगे कि आखिर एक जैसे मुद्दे से जुड़े पोस्ट को अलग-अलग जगहों पर इतनी अलग पहुंच कैसे मिल सकती है।

जंतर-मंतर और रांची के पोस्ट में बड़ा अंतर

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, दिल्ली के जंतर-मंतर प्रदर्शन से जुड़े एक कीवर्ड के तहत कुल 5,239 पोस्ट होने की बात कही गई। दावा है कि इन पोस्ट को बड़ी संख्या में लोगों ने देखा और कुछ पोस्ट को हजारों की संख्या में एंगेजमेंट भी मिला।

इसके उलट रांची में हुए विरोध-प्रदर्शन से जुड़े पोस्ट की संख्या और उनकी पहुंच काफी कम बताई गई। एक विश्लेषण में दावा किया गया कि दिल्ली से संबंधित पोस्टों की संख्या और व्यूज की तुलना में रांची से जुड़े पोस्ट बेहद कम लोगों तक पहुंचे।

यही अंतर अब इस पूरे मामले का सबसे अहम पहलू बन गया है। सवाल यह है कि क्या इंस्टाग्राम का एल्गोरिदम किसी खास तरह के कंटेंट को ज्यादा लोगों तक पहुंचाता है या फिर अलग-अलग पोस्ट की लोकप्रियता और यूजर्स की प्रतिक्रिया के कारण यह अंतर पैदा होता है?

सरकार ने मेटा से मांगी विस्तृत जानकारी

मामले की चर्चा बढ़ने के बाद सरकार की नजर भी इंस्टाग्राम के एल्गोरिदम और पोस्ट की पहुंच पर गई है। इलेक्ट्रॉनिक्स एवं आईटी सचिव एस. कृष्णन के हवाले से बताया गया है कि सरकार ने मेटा से इस संबंध में विस्तृत ब्यौरा मांगा है।

सरकार अब यह समझना चाहती है कि अलग-अलग आंदोलनों से जुड़े पोस्ट की पहुंच में इतना बड़ा अंतर क्यों दिखाई दे रहा है। इसके लिए पोस्ट की संख्या, व्यूज, एंगेजमेंट, अकाउंट्स और कीवर्ड सर्च से जुड़े डेटा को देखा जा सकता है।

सरकार की ओर से यह भी संकेत दिया गया है कि किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले उपलब्ध आंकड़ों का तथ्यात्मक और तकनीकी विश्लेषण जरूरी होगा। यानी फिलहाल केवल व्यूज में अंतर को देखकर यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि सोशल मीडिया एल्गोरिदम ने जानबूझकर किसी एक आंदोलन को ज्यादा या कम प्राथमिकता दी।

क्या इंस्टाग्राम का एल्गोरिदम जिम्मेदार है?

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर किसी पोस्ट की पहुंच कई कारकों पर निर्भर करती है। इनमें पोस्ट पर शुरुआती प्रतिक्रिया, लाइक, कमेंट, शेयर, सेव, वीडियो देखने का समय, यूजर्स की रुचि और अकाउंट की गतिविधि जैसे कई पहलू शामिल हो सकते हैं।

आमतौर पर जिस कंटेंट पर शुरुआती समय में ज्यादा यूजर प्रतिक्रिया देते हैं, उसके आगे अधिक लोगों तक पहुंचने की संभावना बढ़ सकती है। इसी तरह किसी पोस्ट की पहुंच कम होने का अर्थ हमेशा यह नहीं होता कि उसे जानबूझकर दबाया गया है।

इस मामले में भी एल्गोरिदम की भूमिका को लेकर कई संभावनाएं सामने आ रही हैं। एक संभावना यह है कि दिल्ली से जुड़े पोस्ट को शुरुआत में अधिक एंगेजमेंट मिला हो, जिसके कारण वे ज्यादा यूजर्स तक पहुंचे हों। दूसरी संभावना यह हो सकती है कि दोनों स्थानों के यूजर्स के व्यवहार और कंटेंट शेयरिंग पैटर्न में अंतर रहा हो।

इसलिए मेटा से मांगा गया डेटा इस बहस में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

5,239 पोस्ट और करोड़ों यूजर्स का आंकड़ा

वायरल दावों में कहा गया है कि ‘दिल्ली सीजेपी प्रोटेस्ट’ जैसे कीवर्ड से जुड़े कुल पोस्ट की संख्या 5,239 थी। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के करोड़ों यूजर्स की तुलना में यह संख्या बहुत छोटी दिखाई देती है, लेकिन किसी बड़े आंदोलन के दौरान कुछ हजार पोस्ट भी तेजी से वायरल होकर व्यापक चर्चा पैदा कर सकते हैं।

दावे के मुताबिक, संबंधित पोस्टों को बड़ी संख्या में लोगों ने देखा और कई पोस्ट पर हजारों की संख्या में एंगेजमेंट आया। इससे यह सवाल भी उठता है कि पोस्ट की संख्या और उसकी पहुंच के बीच कितना संबंध होता है।

किसी आंदोलन से जुड़े पोस्ट की संख्या कम होने के बावजूद यदि एक पोस्ट को लाखों व्यूज मिल जाएं, तो उसका प्रभाव हजारों सामान्य पोस्टों से ज्यादा हो सकता है। इसलिए केवल पोस्ट की संख्या के आधार पर सोशल मीडिया पर किसी मुद्दे की लोकप्रियता तय करना उचित नहीं माना जा सकता।

डेटा विश्लेषण से सामने आएगी असली तस्वीर

बताया गया है कि एक न्यूज चैनल द्वारा जंतर-मंतर और रांची के आंदोलनों से संबंधित न्यूज डेटा का विश्लेषण किया गया। इसमें दावा किया गया कि दिल्ली से जुड़े पोस्टों की पहुंच रांची के मुकाबले काफी ज्यादा थी।

हालांकि, सोशल मीडिया डेटा के विश्लेषण में यह देखना जरूरी है कि पोस्ट कब किए गए, कितने अलग-अलग अकाउंट्स से किए गए, पोस्ट का फॉर्मेट क्या था, उनमें वीडियो या तस्वीर का इस्तेमाल हुआ या नहीं और उन्हें कितने समय तक यूजर्स ने देखा।

इसी तरह यह भी महत्वपूर्ण है कि तुलना समान अवधि और समान मानकों के आधार पर की गई हो। अगर दोनों आंदोलनों के पोस्ट के बीच समय, पोस्टिंग की संख्या या कंटेंट फॉर्मेट में बड़ा अंतर है, तो व्यूज में अंतर स्वाभाविक रूप से आ सकता है।

मेटा की प्रतिक्रिया से साफ होगी स्थिति

अब निगाहें मेटा की ओर हैं। सरकार को दिए जाने वाले डेटा और तकनीकी स्पष्टीकरण से यह समझने में मदद मिल सकती है कि दिल्ली और रांची से जुड़े पोस्ट की पहुंच में इतना अंतर किन कारणों से आया।

फिलहाल उपलब्ध जानकारी के आधार पर एल्गोरिदम पर किसी तरह का अंतिम आरोप लगाना उचित नहीं होगा। जांच और डेटा विश्लेषण के बाद ही स्पष्ट तस्वीर सामने आएगी।

सोशल मीडिया के दौर में किसी आंदोलन या सार्वजनिक मुद्दे की पहुंच केवल जमीन पर मौजूद भीड़ से तय नहीं होती। इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर कुछ ही घंटों में कोई पोस्ट लाखों लोगों तक पहुंच सकता है, जबकि दूसरा समान मुद्दे वाला पोस्ट सीमित यूजर्स तक रह सकता है। ऐसे में एल्गोरिदम की पारदर्शिता और डेटा की सही व्याख्या बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

निष्कर्ष: दिल्ली और रांची के प्रदर्शनों से जुड़े इंस्टाग्राम पोस्ट की कथित पहुंच में अंतर ने सोशल मीडिया एल्गोरिदम को लेकर नई बहस छेड़ दी है। सरकार द्वारा मेटा से जानकारी मांगे जाने के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि उपलब्ध आंकड़े इस अंतर की वजह के तौर पर क्या तस्वीर सामने रखते हैं।

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