गडकरी के अनुसार पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण की सफलता के बाद अब डीजल के लिए भी वैकल्पिक विकल्पों पर काम किया जा रहा है। चूंकि डीजल में सीधे इथेनॉल मिलाना तकनीकी रूप से व्यवहारिक नहीं माना जाता, इसलिए इथेनॉल से तैयार होने वाले आइसोब्यूटेनॉल के उपयोग की संभावनाओं का परीक्षण किया जा रहा है।
आइसोब्यूटेनॉल एक उन्नत जैव-ईंधन है, जो पारंपरिक जीवाश्म ईंधनों की तुलना में बेहतर ऊर्जा दक्षता और कम उत्सर्जन की क्षमता रखता है। यदि इसके प्रयोग सफल रहते हैं, तो डीजल में लगभग 15 प्रतिशत तक ब्लेंडिंग का रास्ता खुल सकता है।
इस पहल का एक बड़ा उद्देश्य किसानों की आय बढ़ाना भी है। इथेनॉल उत्पादन में उपयोग होने वाली कृषि उपज और जैविक संसाधनों की मांग बढ़ने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है। साथ ही देश के विदेशी मुद्रा व्यय में भी कमी आने की संभावना है, क्योंकि कच्चे तेल के आयात पर निर्भरता घटेगी।विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी नए ईंधन मिश्रण को व्यापक स्तर पर लागू करने से पहले वाहनों के इंजन, ईंधन प्रणाली और उत्सर्जन मानकों पर इसके प्रभावों का विस्तृत परीक्षण आवश्यक होगा।
सरकार और संबंधित एजेंसियां इसी दिशा में अध्ययन और परीक्षण कर रही हैं।यदि यह योजना सफल होती है तो भारत स्वच्छ ऊर्जा, ऊर्जा सुरक्षा और आत्मनिर्भर ईंधन व्यवस्था की दिशा में एक और महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल कर सकता है।