देश में एक बार फिर यह बहस तेज हो गई है कि सरकार बनाने का दावा पेश करते समय बहुमत का परीक्षण कहाँ होना चाहिए राजभवन में या विधानसभा के फ्लोर पर। यह विवाद ऐसे समय में उठा है जब सरकार गठन को लेकर राजनीतिक दल अपने-अपने दावे पेश कर रहे हैं और राज्यपाल की भूमिका चर्चा के केंद्र में है।
संवैधानिक व्यवस्था और सुप्रीम कोर्ट के कई ऐतिहासिक फैसलों के अनुसार, किसी भी सरकार का वास्तविक बहुमत केवल विधानसभा के भीतर ही साबित माना जाता है, न कि राजभवन में समर्थन पत्र दिखाकर।
बोम्मई जजमेंट: बहुमत परीक्षण का आधार
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक S. R. Bommai vs Union of India Judgment में स्पष्ट कहा गया था कि किसी सरकार के बहुमत का परीक्षण सदन के फ्लोर पर होना चाहिए। अदालत ने माना था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में निर्वाचित विधानसभा ही बहुमत तय करने का सर्वोच्च मंच है। यही कारण है कि समय-समय पर अदालतें फ्लोर टेस्ट कराने के निर्देश देती रही हैं।
1996 में सबसे बड़े दल को मिला था मौका
साल 1996 में तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने लोकसभा चुनाव के बाद सबसे बड़े दल के नेता अटल बिहारी बाजपेयी को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित किया था।
हालांकि, भाजपा उस समय सदन में बहुमत साबित नहीं कर पाई और केवल 13 दिनों में सरकार गिर गई। इसके बाद राजनीतिक और संवैधानिक बहस और तेज हुई कि केवल “सबसे बड़ा दल” होना सरकार गठन के लिए पर्याप्त आधार नहीं हो सकता।
बाद में राष्ट्रपति के.आर. नारायणन ने सरकार गठन की प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण बदलाव किया। उन्होंने समर्थन पत्रों और गठबंधन सहयोगियों के लिखित समर्थन को महत्व देना शुरू किया ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि सरकार बनाने का दावा करने वाले दल के पास वास्तव में बहुमत जुटाने की संभावना है।
इसके बाद से राज्यपाल और राष्ट्रपति द्वारा समर्थन पत्र मांगने की परंपरा अधिक मजबूत हुई।
सरकारिया और पुंछी आयोग ने ने सरकार गठन को लेकर एक स्पष्ट प्राथमिकता क्रम सुझाया था।
मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में विजय न तो स्पष्ट बहुमत की स्थिति में दिखाई दे रहे हैं और न ही अभी तक ऐसा कोई गठबंधन सामने आया है जो सरकार गठन के लिए आवश्यक संख्या जुटाता हो। संभवतः यही वजह है कि राज्यपाल ने अभी तक उन्हें सरकार बनाने के लिए आमंत्रित नहीं किया है।
अब उनके सामने सबसे बड़ा विकल्प अदालत का दरवाजा खटखटाने का हो सकता है। हालांकि, कानूनी लड़ाई के साथ-साथ राजनीतिक समर्थन जुटाना भी उनके लिए बेहद जरूरी होगा।
भारतीय लोकतंत्र में सरकार गठन केवल सबसे बड़े दल की दावेदारी का मामला नहीं है, बल्कि सदन में वास्तविक बहुमत साबित करने की क्षमता सबसे महत्वपूर्ण होती है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले, संवैधानिक परंपराएं और आयोगों की सिफारिशें सभी इसी सिद्धांत को मजबूत करती हैं कि अंतिम फैसला विधानसभा के फ्लोर पर ही होता है।