राजन ने कहा कि पिछले कई वर्षों से निजी क्षेत्र का निवेश अपेक्षित गति से नहीं बढ़ा है। इसके साथ ही प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के आंकड़ों में भी कमजोरी देखी गई है। उनका तर्क है कि विदेशी कंपनियों द्वारा नई उत्पादन इकाइयों और विनिर्माण परियोजनाओं में बड़े पैमाने पर निवेश नहीं दिख रहा, जिससे आर्थिक वृद्धि के दावों पर सवाल खड़े होते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि वैश्विक परिस्थितियां भारत की अर्थव्यवस्था के लिए नई चुनौतियां पैदा कर सकती हैं। विशेष रूप से पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में संभावित वृद्धि का असर महंगाई, व्यापार और आर्थिक गतिविधियों पर पड़ सकता है।
पूर्व गवर्नर के अनुसार, भारत को विकसित राष्ट्र बनने के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए दीर्घकालिक और स्पष्ट आर्थिक रणनीति की जरूरत है। उन्होंने जोर दिया कि केवल विकास दर के आंकड़ों पर निर्भर रहने के बजाय निवेश, रोजगार, आय वृद्धि और उत्पादकता जैसे संकेतकों पर भी समान ध्यान दिया जाना चाहिए।