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शराब पर टैक्स बढ़ाइए, लेकिन महिला वकीलों को सम्मानजनक सुविधाएं दीजिए : सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली: देशभर की जिला और तालुका अदालतों में महिला वकीलों के लिए बुनियादी सुविधाओं की कमी पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि न्याय व्यवस्था में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के बावजूद कई अदालतों में उनके लिए शौचालय, स्वच्छ पेयजल और अन्य आवश्यक सुविधाओं का अभाव बेहद चिंताजनक है। […]

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Supreme Court
Gauravshali Bharat News
  • July 17, 2026 3:25 pm IST, Published 1 hour ago

नई दिल्ली: देशभर की जिला और तालुका अदालतों में महिला वकीलों के लिए बुनियादी सुविधाओं की कमी पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि न्याय व्यवस्था में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के बावजूद कई अदालतों में उनके लिए शौचालय, स्वच्छ पेयजल और अन्य आवश्यक सुविधाओं का अभाव बेहद चिंताजनक है। शीर्ष अदालत ने इसे केवल प्रशासनिक कमी नहीं, बल्कि गरिमापूर्ण कार्यस्थल और बुनियादी अधिकारों से जुड़ा मुद्दा बताया।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ महिला वकीलों की सुविधाओं से जुड़ी एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने टिप्पणी की कि यह सोचकर चिंता होती है कि देश की बेटियां किन परिस्थितियों में न्यायालयों में अपनी पेशेवर जिम्मेदारियां निभा रही हैं। अदालत ने अटॉर्नी जनरल से कहा कि सभी राज्यों के एडवोकेट जनरल के माध्यम से जिला और तालुका अदालतों में उपलब्ध सुविधाओं की वास्तविक स्थिति की जानकारी जुटाई जाए और सुधार के लिए ठोस कदम उठाए जाएं।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से बताया गया कि कई राज्यों, विशेषकर कर्नाटक की कई तालुका अदालतों में महिला वकीलों के लिए अलग शौचालय तक उपलब्ध नहीं हैं। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों के एडवोकेट जनरल को दो सप्ताह के भीतर तथ्यात्मक रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश दिया।

अदालत ने यह भी कहा कि जहां सुविधाओं का अभाव पाया जाए, वहां संबंधित राज्य सरकारें तुरंत प्रस्ताव तैयार करें और लोक निर्माण विभाग (PWD) के माध्यम से निर्माण कार्य शुरू कराया जाए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रिपोर्ट मिलने के चार सप्ताह के भीतर आवश्यक स्थानों पर महिला शौचालय और अन्य मूलभूत सुविधाओं के निर्माण की प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए।

‘फंड की कमी’ और महिला वकीलों की याचिका से उठा मुद्दा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने में धन की कमी का तर्क स्वीकार नहीं किया जा सकता। अदालत ने इसे महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा और गरिमापूर्ण कार्यस्थल से जुड़ा विषय बताते हुए कहा कि सरकारों को संसाधन जुटाने के लिए प्राथमिकता तय करनी होगी। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने यह भी टिप्पणी की कि यदि अतिरिक्त संसाधनों की आवश्यकता हो तो सरकार शराब और सिगरेट जैसे उत्पादों पर अतिरिक्त कर लगाने जैसे विकल्पों पर विचार कर सकती है। हालांकि यह टिप्पणी संसाधन जुटाने के संभावित उपाय के रूप में की गई।

यह मामला अधिवक्ता सारिका त्यागी और देश के विभिन्न न्यायालयों में कार्यरत महिला वकीलों के एक समूह द्वारा दायर जनहित याचिका के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। याचिकाकर्ताओं ने विभिन्न राज्यों की अदालतों का दौरा कर वहां की सुविधाओं का अध्ययन किया और एक विस्तृत रिपोर्ट अदालत के समक्ष प्रस्तुत की। याचिका में कहा गया कि कई अदालतों में महिला वकीलों के लिए अलग शौचालय, स्वच्छ पेयजल, विश्राम कक्ष और अन्य बुनियादी सुविधाओं का अभाव है, जिससे उन्हें पेशेवर कार्य के दौरान कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया कि न्याय व्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी को मजबूत बनाने के लिए सुरक्षित और सम्मानजनक कार्यस्थल उपलब्ध कराना सभी राज्य सरकारों और संबंधित संस्थाओं की जिम्मेदारी है। अदालत ने उम्मीद जताई कि राज्यों की रिपोर्ट मिलने के बाद इस दिशा में जल्द ठोस सुधारात्मक कदम उठाए जाएंगे।

 

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