नई दिल्ली। देश में मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में बड़ा बदलाव करते हुए नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) ने मेडिकल कॉलेज खोलने के नियमों में संशोधन किया है। नए नियमों के तहत अब कंपनीज एक्ट, 2013 के अंतर्गत पंजीकृत कोई भी कंपनी मेडिकल कॉलेज स्थापित कर सकेगी। पहले यह अनुमति केवल सेक्शन-8 (नॉन-प्रॉफिट) कंपनियों तक सीमित थी।
सेक्शन-8 कंपनियां ऐसी संस्थाएं होती हैं, जिनका उद्देश्य लाभ कमाना नहीं होता। इनकी आय का उपयोग केवल शिक्षा, समाज सेवा या संस्थान के विकास में किया जा सकता है और इसे मुनाफे के रूप में वितरित नहीं किया जा सकता।
साल 2019 में मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया (MCI) की जगह NMC के गठन के बाद नियमों को सख्त किया गया था और केवल सेक्शन-8 कंपनियों को मेडिकल कॉलेज खोलने की अनुमति दी गई थी। हालांकि अब NMC ने इस नियम में बदलाव करते हुए सभी प्रकार की कंपनियों के लिए रास्ता खोल दिया है।
सरकार का कहना है कि केवल नॉन-प्रॉफिट कंपनियों की शर्त के कारण कई बड़ी कंपनियां मेडिकल शिक्षा के क्षेत्र में निवेश नहीं कर पा रही थीं। इसके अलावा, मुनाफा अनौपचारिक तरीके से कमाने की प्रवृत्ति भी सामने आ रही थी। सरकार का मानना है कि कानूनी रूप से अनुमति मिलने से पारदर्शिता बढ़ेगी और सरकार को टैक्स राजस्व भी प्राप्त होगा।
मई 2017 में वेदांता इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज देश का पहला प्राइवेट लिमिटेड मेडिकल कॉलेज बना था। शुरुआत में फीस निर्धारण को लेकर विवाद हुआ था, लेकिन बाद में संस्थान को सरकारी नियमों का पालन करना पड़ा। वर्ष 2025 में इस कॉलेज की मैनेजमेंट कोटा सीट की फीस करीब 15.7 लाख रुपये थी, जो राज्य में सबसे अधिक मानी गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि नए नियम से देश में निजी मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ सकती है और मेडिकल शिक्षा में निवेश भी बढ़ेगा। हालांकि इसके साथ ही मेडिकल कॉलेजों की फीस और शिक्षा के बढ़ते व्यावसायीकरण को लेकर नई बहस भी तेज होने की संभावना है।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई फैसलों में स्पष्ट कर चुका है कि शिक्षा एक सेवा और सामाजिक दायित्व है, न कि मुनाफा कमाने का माध्यम। ऐसे में नए नियमों के बाद मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता और फीस नियंत्रण को लेकर सरकार की भूमिका अहम मानी जा रही है।