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सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला

राजस्व रिकॉर्ड में नाम चढ़ने से मालिकाना हक नहीं मिलता, म्यूटेशन सिर्फ टैक्स वसूली के लिए नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने संपत्ति के मालिकाना हक को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि राजस्व रिकॉर्ड में किसी संपत्ति का म्यूटेशन यानी दाखिल-खारिज या नामांतरण होने से किसी व्यक्ति को मालिकाना […]

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  • August 24, 2026 8:45 am IST, Published 31 minutes ago

राजस्व रिकॉर्ड में नाम चढ़ने से मालिकाना हक नहीं मिलता, म्यूटेशन सिर्फ टैक्स वसूली के लिए

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने संपत्ति के मालिकाना हक को लेकर एक अहम फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि राजस्व रिकॉर्ड में किसी संपत्ति का म्यूटेशन यानी दाखिल-खारिज या नामांतरण होने से किसी व्यक्ति को मालिकाना हक हासिल नहीं होता और न ही किसी दूसरे व्यक्ति का अधिकार खत्म होता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसी संपत्ति के टाइटल का फैसला केवल राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज नाम के आधार पर नहीं किया जा सकता। इसके लिए बिक्री दस्तावेज, विरासत, कब्जे और अन्य उपलब्ध साक्ष्यों की भी जांच जरूरी है।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का आदेश रद्द

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें राजस्व रिकॉर्ड की प्रविष्टि को आधार बनाकर संपत्ति विवाद का फैसला किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राजस्व रिकॉर्ड में किसी अन्य व्यक्ति के पक्ष में नाम दर्ज हो जाने मात्र से यह नहीं माना जा सकता कि संपत्ति में अपने अधिकार को स्वेच्छा से छोड़ दिया गया है। यदि कोई पक्ष ऐसा दावा करता है, तो उसे स्वतंत्र और ठोस साक्ष्यों के जरिए यह साबित करना होगा।

राजस्व रिकॉर्ड का उद्देश्य टैक्स वसूली

पीठ ने कहा कि यह स्थापित कानूनी स्थिति है कि राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज प्रविष्टि न तो मालिकाना हक पैदा करती है और न ही उसे खत्म करती है। इसका मुख्य उद्देश्य भूमि से जुड़े राजस्व, लगान या टैक्स की वसूली को व्यवस्थित करना है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि नायब तहसीलदार राजस्व रिकॉर्ड में एक व्यक्ति की जगह दूसरे व्यक्ति का नाम दर्ज कर सकता है, लेकिन इस प्रक्रिया को संपत्ति के अधिकार का हस्तांतरण या अधिकारों का त्याग नहीं माना जा सकता।

असली मालिकाना हक सिविल कोर्ट तय करेगा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संपत्ति के वास्तविक टाइटल और मालिकाना हक का फैसला सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आता है। राजस्व अधिकारी केवल रिकॉर्ड को व्यवस्थित और अपडेट कर सकते हैं।

इसलिए केवल म्यूटेशन के आधार पर किसी व्यक्ति को संपत्ति का मालिक नहीं माना जा सकता।

राजस्व प्रविष्टि खंडन योग्य साक्ष्य

अदालत ने मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 117 का उल्लेख करते हुए कहा कि राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज प्रविष्टि को एक खंडन योग्य साक्ष्य माना जा सकता है। यानी इसे अन्य सबूतों के आधार पर गलत साबित किया जा सकता है।

अदालत ने यह भी दोहराया कि म्यूटेशन की प्रविष्टि का अपने आप में कोई निर्णायक अनुमानात्मक मूल्य नहीं है। इसका उद्देश्य उस व्यक्ति को भूमि का राजस्व चुकाने में सक्षम बनाना है, जिसके नाम पर प्रविष्टि की गई है।

सिर्फ म्यूटेशन की तारीख से तय नहीं होगी सीमा अवधि

सुप्रीम कोर्ट ने एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू पर भी स्पष्टता दी। अदालत ने कहा कि किसी कानूनी दावे की सीमा अवधि केवल उस तारीख से शुरू नहीं मानी जा सकती, जिस दिन राजस्व रिकॉर्ड में म्यूटेशन की प्रविष्टि की गई थी।

इस फैसले से संपत्ति विवादों में राजस्व रिकॉर्ड और वास्तविक मालिकाना हक के बीच अंतर को लेकर कानूनी स्थिति और स्पष्ट हो गई है।

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