नई दिल्ली: देश की प्रमुख सार्वजनिक क्षेत्र की तेल एवं गैस कंपनी ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन (ओएनजीसी) गहरे समुद्री क्षेत्रों में तेल और गैस की खोज को नई गति देने की तैयारी कर रही है। कंपनी अपनी रणनीति में बदलाव करते हुए अत्याधुनिक ड्रिलशिप की उपलब्धता सुनिश्चित करने के विकल्प तलाश रही है। इसके तहत ड्रिलशिप खरीदने के साथ किसी अंतरराष्ट्रीय कंपनी के साथ संयुक्त उद्यम बनाने की संभावनाओं पर भी विचार किया जा रहा है।
ओएनजीसी के लिए यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि गहरे पानी में तेल और गैस की खोज के लिए सामान्य अपतटीय रिग की तुलना में विशेष तकनीक और अत्याधुनिक उपकरणों की जरूरत होती है। ड्रिलशिप ऐसे विशेष जहाज होते हैं, जिनका इस्तेमाल समुद्र की गहराई में स्थित संभावित तेल एवं गैस भंडार तक पहुंचने के लिए कुओं की खुदाई में किया जाता है।
कंपनी यह कदम अपने ‘मिशन समुद्र मंथन’ कार्यक्रम के तहत उठाने जा रही है। इसके लिए ओएनजीसी ने वैश्विक स्तर पर समुद्री रिग और ड्रिलिंग परिसंपत्तियों की विशेषज्ञता रखने वाले सलाहकार की नियुक्ति के लिए रुचि पत्र (ईओआई) जारी किया है। प्रस्तावित सलाहकार का काम संभावित ड्रिलशिप मालिकों और अंतरराष्ट्रीय साझेदारों की पहचान करना होगा।
सलाहकार उपलब्ध ड्रिलशिप परिसंपत्तियों का तकनीकी और व्यावसायिक मूल्यांकन भी करेगा। इसके अलावा उनकी कीमत, उपयोगिता और संभावित सौदे की व्यवहारिकता का आकलन करने के साथ बातचीत की प्रक्रिया में ओएनजीसी को सहयोग देने की जिम्मेदारी भी होगी। कंपनी का लक्ष्य ऐसी ड्रिलशिप क्षमता तैयार करना है, जिस पर उसे लंबे समय तक प्राथमिकता के आधार पर पहुंच मिल सके।
ओएनजीसी के सामने दो प्रमुख विकल्प हैं। पहला, कंपनी अपनी जरूरत के मुताबिक ड्रिलशिप का स्वामित्व हासिल करे। दूसरा, किसी वैश्विक विशेषज्ञ कंपनी के साथ संयुक्त उद्यम बनाकर इस क्षमता को विकसित किया जाए। दोनों विकल्पों का तकनीकी और आर्थिक आकलन किया जा रहा है।
इस पहल को केंद्र सरकार की हालिया अपतटीय खोज नीति से भी जोड़कर देखा जा रहा है। सरकार ने ‘समुद्र मंथन-राष्ट्रीय अपतटीय जांच योजना’ को मंजूरी दी है। इस योजना के तहत वर्ष 2030-31 तक 84,084 करोड़ रुपये खर्च करने का प्रावधान है। इसका मुख्य उद्देश्य देश के समुद्री क्षेत्रों, खासकर गहरे और अति-गहरे पानी वाले इलाकों में तेल एवं गैस की खोज को बढ़ावा देना है।
सरकार की योजना का एक बड़ा लक्ष्य घरेलू तेल और गैस उत्पादन बढ़ाना तथा आयात पर निर्भरता कम करना है। इसके तहत गहरे पानी में खोजी गतिविधियों के लिए वित्तीय सहायता भी उपलब्ध कराई जाएगी। सहायता खोजी कुओं की लागत के 50 प्रतिशत तक सीमित होगी और प्रति कुआं अधिकतम 675 करोड़ रुपये तक की मदद दी जा सकेगी।
कार्यक्रम में लगभग 60 गहरे पानी वाले खोजी कुओं की खुदाई का लक्ष्य रखा गया है। इसके अलावा बड़े स्तर पर भूकंपीय सर्वेक्षण, अपतटीय बुनियादी ढांचे का विकास और तेल-गैस क्षेत्र के लिए विनिर्माण तथा सेवा क्षमता विकसित करने की योजना भी शामिल है। इससे समुद्री ऊर्जा क्षेत्र में घरेलू क्षमता बढ़ाने की उम्मीद है।
गहरे समुद्र में खोज के लिए ड्रिलशिप की उपलब्धता एक अहम चुनौती है। इस तरह के जहाज अत्यधिक जटिल तकनीक से लैस होते हैं और इन्हें गहरे पानी में कठोर परिस्थितियों के बीच काम करने के लिए डिजाइन किया जाता है। भारत में फिलहाल अत्याधुनिक ड्रिलशिप के निर्माण की क्षमता सीमित है। ऐसे में विदेशों से ड्रिलशिप खरीदना या अनुभवी वैश्विक कंपनियों के साथ साझेदारी करना व्यावहारिक विकल्प हो सकता है।
ओएनजीसी की नई रणनीति से कंपनी को गहरे समुद्री क्षेत्रों में खोज अभियान को अधिक नियमित और योजनाबद्ध तरीके से चलाने में मदद मिल सकती है। यदि ड्रिलशिप की स्थायी या प्राथमिकता वाली उपलब्धता सुनिश्चित होती है, तो खोजी कुओं की खुदाई के लिए बाहरी संसाधनों पर निर्भरता घट सकती है।
ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से भी यह पहल महत्वपूर्ण है। घरेलू तेल और गैस उत्पादन बढ़ने से आने वाले वर्षों में आयात पर दबाव कम करने में मदद मिल सकती है। ओएनजीसी का ड्रिलशिप स्वामित्व या संयुक्त उद्यम का प्रस्ताव इसी व्यापक लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।