नई दिल्ली: देश की सर्वोच्च अदालत ने अस्थायी और कैजुअल कर्मचारियों के हक में एक बहुत बड़ा और बेहद संवेदनशील फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा है कि “पेंशन कोई खैरात, दया या इनाम नहीं है, बल्कि यह कर्मचारी की वर्षों की कड़ी मेहनत की कमाई है, जो संविधान के अनुच्छेद 300A के तहत संपत्ति के अधिकार की तरह एक संवैधानिक अधिकार है।”
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ए.जी. मसीह की पीठ ने पटना हाईकोर्ट के उस पुराने आदेश को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें डाक विभाग में दशकों तक नाइट गार्ड के रूप में सेवाएं देने वाले अस्थायी कर्मियों को पेंशन देने से मना कर दिया गया था।
सरकार एक ‘आदर्श नियोक्ता’ (Model Employer) है: राज्य या कोई भी सरकारी विभाग अपनी प्रशासनिक ढिलाई और सुस्ती का खामियाजा उन गरीब कर्मचारियों को भुगतने के लिए मजबूर नहीं कर सकता, जिन्होंने अपनी पूरी जिंदगी विभाग की सेवा में खपा दी।
समान काम तो समान हक: विभाग अगर किसी अस्थायी कर्मी से परमानेंट स्टाफ की तरह ही काम ले रहा है, उसे महंगाई भत्ता (DA) और मकान किराया भत्ता (HRA) दे रहा है, तो इसका सीधा मतलब है कि उसका काम स्थायी प्रकृति का था। ऐसे में उसे पेंशन से वंचित रखना सरासर नाइंसाफी है।
संविधान की दुहाई: कोर्ट ने याद दिलाया कि संविधान के नीति निदेशक तत्व (Directive Principles – अनुच्छेद 38, 39 और 43) राज्य को सामाजिक-आर्थिक न्याय और हर श्रमिक को एक सम्मानजनक जीवन देने की जिम्मेदारी सौंपते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार (डाक विभाग) को बेहद सख्त निर्देश जारी किए हैं:
3 महीने के भीतर भुगतान: विभाग तुरंत इन पूर्व कर्मचारियों या उनके कानूनी वारिसों की पेंशन और रिटायर्ड बेनिफिट्स (सेवानिवृत्ति लाभ) की गणना करे और अगले 3 महीने के अंदर पूरा भुगतान करे।
6% सालाना ब्याज का जुर्माना: अदालत ने कड़ी चेतावनी दी है कि अगर तय समय (तीन महीने) के भीतर भुगतान नहीं किया गया, तो विभाग को पूरी बकाया राशि पर 6% वार्षिक दर से ब्याज भी देना होगा।