नयी दिल्ली: सर्वोच्च न्यायालय ने CBSE की नई त्रिभाषा नीति को लेकर दायर जनहित याचिकाओं पर गंभीर रुख अपनाया है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के तहत कक्षा 9वीं और 10वीं में तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य किए जाने के फैसले को चुनौती मिलने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और CBSE को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की विशेष पीठ ने की। अदालत ने दोनों पक्षों को चार सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि इस नीति के दूरगामी प्रभावों और छात्रों पर पड़ने वाले असर को गंभीरता से समझना जरूरी है।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल त्रिभाषा नीति पर अंतरिम रोक नहीं लगाई है, लेकिन इस मुद्दे को महत्वपूर्ण मानते हुए विस्तृत सुनवाई के लिए जुलाई में अगली तारीख तय की है। माना जा रहा है कि आगामी सुनवाई में छात्रों के शैक्षणिक दबाव और नीति की व्यवहारिकता पर विस्तार से चर्चा हो सकती है।
नई व्यवस्था के अनुसार, 1 जुलाई 2026 से CBSE से संबद्ध स्कूलों में कक्षा 9वीं और 10वीं के छात्रों के लिए तीन भाषाएं पढ़ना अनिवार्य किया जाएगा। इनमें से कम से कम दो भाषाएं भारतीय मूल की होनी चाहिए। छात्र विदेशी भाषा का विकल्प तभी चुन सकेंगे जब बाकी दो भाषाएं भारतीय हों।
इस नीति के खिलाफ छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों के एक वर्ग ने आपत्ति जताई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों पर अतिरिक्त भाषाओं का दबाव डालना मानसिक तनाव बढ़ा सकता है। उनका तर्क है कि शिक्षा प्रणाली में बड़े बदलाव लागू करने से पहले छात्रों की क्षमता, स्कूलों की तैयारी और क्षेत्रीय भाषाई परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
वहीं शिक्षा नीति के समर्थकों का कहना है कि भारतीय भाषाओं को बढ़ावा देने और बहुभाषी शिक्षा को मजबूत बनाने के लिए यह कदम आवश्यक है। उनका मानना है कि इससे छात्रों में भाषाई विविधता और सांस्कृतिक समझ विकसित होगी।
अब इस मामले पर सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई पर टिकी है, जहां शिक्षा नीति और छात्रों के हितों के बीच संतुलन को लेकर अहम बहस देखने को मिल सकती है।