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सेकंड क्लास यात्री शब्द पर सुप्रीम कोर्ट की आपत्ति, रेलवे को बदलनी होगी शब्दावली

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रेलवे में यात्रियों के सम्मान, सुरक्षा और मुआवजा व्यवस्था को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि किसी यात्री की पहचान उसके टिकट की कीमत से नहीं की जानी चाहिए। अदालत ने रेलवे के दस्तावेजों में इस्तेमाल होने वाले “सेकंड क्लास पैसेंजर” जैसे शब्दों पर […]

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Supreme Court
Gauravshali Bharat News
  • July 17, 2026 4:10 pm IST, Published 1 hour ago

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रेलवे में यात्रियों के सम्मान, सुरक्षा और मुआवजा व्यवस्था को लेकर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया है कि किसी यात्री की पहचान उसके टिकट की कीमत से नहीं की जानी चाहिए। अदालत ने रेलवे के दस्तावेजों में इस्तेमाल होने वाले “सेकंड क्लास पैसेंजर” जैसे शब्दों पर आपत्ति जताते हुए कहा कि इस तरह की भाषा संविधान की समानता और गरिमा की भावना के अनुरूप नहीं है। न्यायालय ने सुझाव दिया कि भविष्य में श्रेणी का उल्लेख यात्री के बजाय केवल कोच या डिब्बे के संदर्भ में किया जाए।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की पीठ ने अपने फैसले में कहा कि भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में हर नागरिक समान सम्मान का अधिकारी है। ऐसे में किसी व्यक्ति को उसकी यात्रा के खर्च या टिकट की श्रेणी के आधार पर संबोधित करना उचित नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि रेलवे को अपनी शब्दावली और प्रशासनिक व्यवस्था में भी इस संवैधानिक सोच को प्रतिबिंबित करना चाहिए।

रेलवे सुरक्षा पर भी सुप्रीम कोर्ट की चिंता

सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने रेलवे की सुरक्षा व्यवस्था और कर्मचारियों की कमी पर भी गंभीर चिंता जताई। अदालत ने कहा कि रेलवे मैनुअल के कई प्रावधान तभी प्रभावी ढंग से लागू हो सकते हैं, जब पर्याप्त संख्या में प्रशिक्षित कर्मचारी उपलब्ध हों।

पीठ ने टिप्पणी की कि रेलवे स्टेशनों और ट्रेनों में मानव संसाधन बढ़ाने की आवश्यकता है। इससे न केवल यात्रियों की सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि बड़ी संख्या में युवाओं को रोजगार के अवसर भी मिलेंगे। अदालत का मानना है कि आधुनिक रेलवे प्रणाली केवल नई ट्रेनों और तकनीक से नहीं, बल्कि मजबूत मानव संसाधन से भी संचालित होती है।

टिकट नहीं मिलने से यात्री गैरकानूनी नहीं हो जाता

इस फैसले का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू रेलवे दुर्घटना मुआवजा मामलों से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी दुर्घटना के बाद मृतक के पास से रेलवे टिकट बरामद नहीं होता, तो केवल इसी आधार पर उसे बिना टिकट यात्री नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि यदि परिजन शपथपत्र के माध्यम से यह बताते हैं कि मृतक के पास वैध टिकट था और दुर्घटना के दौरान टिकट या सामान गुम हो गया, तो ऐसे बयान को प्रारंभिक साक्ष्य माना जाना चाहिए। केवल टिकट की अनुपस्थिति के आधार पर मुआवजा खारिज करना न्यायसंगत नहीं होगा।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का फैसला पलटा

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट दोनों के फैसलों को निरस्त कर दिया। मामला वर्ष 2015 का था, जब रायपुर निवासी चंद्रकांत ठक्कर अहमदाबाद जाने के दौरान चलती ट्रेन से गिर गए थे और उनकी मृत्यु हो गई थी।

उनकी पत्नी ने दावा किया कि मृतक के पास वैध टिकट था, लेकिन दुर्घटना के बाद उनका सामान और टिकट दोनों गायब हो गए। ट्रिब्यूनल ने टिकट का प्रमाण न होने के आधार पर मुआवजा देने से इनकार कर दिया था। बाद में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भी यही फैसला बरकरार रखा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड से यह स्पष्ट है कि मृतक ट्रेन में यात्रा कर रहे थे और उनकी मौत रेलवे अधिनियम के तहत “अप्रिय घटना” की श्रेणी में आती है। इसलिए केवल टिकट बरामद न होने के कारण मुआवजे से वंचित करना न्यायसंगत नहीं है।

पत्नी को मिलेगा ब्याज सहित मुआवजा

सर्वोच्च न्यायालय ने मृतक की पत्नी को 8 लाख रुपये का मुआवजा ब्याज सहित देने का निर्देश दिया। अदालत ने कहा कि यदि रेलवे की टिकट जांच प्रक्रिया का सही तरीके से पालन किया जाता और उसका रिकॉर्ड सुरक्षित रहता, तो ऐसे विवाद उत्पन्न ही नहीं होते।

भीड़भाड़ और यात्रियों की जिम्मेदारी

फैसले में अदालत ने रेलवे में बढ़ती भीड़भाड़ पर भी चिंता व्यक्त की। न्यायालय ने कहा कि भीड़ नियंत्रण और सुरक्षा सुनिश्चित करना रेलवे प्रशासन की जिम्मेदारी है, लेकिन यात्रियों को भी अपनी सुरक्षा के प्रति सजग रहना होगा। कोर्ट ने लोगों से अपील की कि वे चलती ट्रेन पकड़ने, फुटबोर्ड पर यात्रा करने या अन्य जोखिमपूर्ण व्यवहार से बचें। अदालत के अनुसार सुरक्षित यात्रा तभी संभव है जब रेलवे प्रशासन और यात्री दोनों अपनी-अपनी जिम्मेदारियों का ईमानदारी से पालन करें।

यह निर्णय केवल एक मुआवजा विवाद का समाधान नहीं है, बल्कि भारतीय रेलवे की कार्यप्रणाली, प्रशासनिक भाषा और यात्री अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण संदेश भी देता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी भी नागरिक की गरिमा सर्वोपरि है और सरकारी संस्थानों की भाषा भी संविधान के समानता के सिद्धांत के अनुरूप होनी चाहिए। साथ ही अदालत ने यह भी संकेत दिया कि रेलवे सुरक्षा, पर्याप्त स्टाफ, पारदर्शी टिकट जांच और संवेदनशील प्रशासन ही भविष्य में ऐसी घटनाओं और विवादों को कम कर सकते हैं।

 

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