नयी दिल्ली: देश की सबसे बड़ी स्कूली परीक्षा संस्था Central Board of Secondary Education यानि CBSE इस समय गंभीर सवालों के घेरे में है। 2026 की 10वीं और 12वीं बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम घोषित होने के बाद छात्रों और अभिभावकों की प्रतिक्रिया ने शिक्षा व्यवस्था को झकझोर दिया है। इस बार जो आंकड़े सामने आए हैं, वे केवल असंतोष नहीं बल्कि परीक्षा मूल्यांकन प्रणाली पर भरोसे के संकट की ओर इशारा करते हैं।
पहली बार ऐसा देखने को मिला है कि इतनी बड़ी संख्या में छात्रों ने अपनी उत्तर पुस्तिकाओं की स्कैन कॉपी देखने की मांग की है। यह केवल सामान्य पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया नहीं रही, बल्कि इसे कई लोग छात्रों के “विश्वास संकट” के रूप में देख रहे हैं।
इस साल CBSE की 10वीं और 12वीं की परीक्षाओं में लगभग 17.68 लाख छात्र शामिल हुए। बोर्ड ने करीब 98.60 लाख उत्तर पुस्तिकाओं का मूल्यांकन किया। मूल्यांकन के लिए इस बार बड़े स्तर पर ऑन-स्क्रीन मार्किंग (OSM) प्रणाली का इस्तेमाल किया गया। यानी परीक्षकों ने कॉपियों को डिजिटल स्क्रीन पर देखकर नंबर दिए।
परिणाम घोषित होने के तुरंत बाद बोर्ड ने मार्क्स वेरिफिकेशन, स्कैन कॉपी और पुनर्मूल्यांकन के लिए ऑनलाइन प्रक्रिया शुरू की। लेकिन बोर्ड को शायद अंदाजा नहीं था कि छात्रों की प्रतिक्रिया इतनी बड़ी होगी हो सकती है कि सिर्फ शुरुआती तीन घंटों में ही 1.26 लाख से अधिक आवेदन दर्ज हो गए। वेबसाइट पर इतना ट्रैफिक बढ़ गया कि सर्वर की गति धीमी पड़ गई और कई छात्रों को लॉगिन करने में परेशानी आने लगी। बाद में बोर्ड को लाइव डेटा अपडेट तक रोकना पड़ा।
अब तक 4 लाख से अधिक छात्र अपनी कॉपियों की जांच या स्कैन कॉपी के लिए आवेदन कर चुके हैं। कुल 11.31 लाख उत्तर पुस्तिकाओं के सत्यापन और स्कैन कॉपी की मांग दर्ज की गई है। यह संख्या कुल परीक्षार्थियों के लगभग 23 प्रतिशत के बराबर है। सरल शब्दों में कहें तो हर चौथा छात्र अपने रिजल्ट से पूरी तरह संतुष्ट नहीं दिख रहा।
छात्रों को शक क्यों हो रहा है?
जानकारों का कहना है कि इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। पिछले कुछ वर्षों में बोर्ड परीक्षाओं का स्वरूप तेजी से बदला है। डिजिटल मूल्यांकन, AI आधारित मॉनिटरिंग और तेज परिणाम प्रक्रिया को आधुनिक सुधार के रूप में पेश किया गया, लेकिन छात्रों के एक वर्ग को लगता है कि इससे मानवीय संवेदनशीलता कम हुई है।
कई छात्रों का कहना है कि जिन विषयों में उन्हें अच्छे अंक आने की उम्मीद थी, वहां अपेक्षा से काफी कम नंबर मिले। कुछ छात्रों ने सोशल मीडिया पर अपनी स्कैन कॉपियां साझा करते हुए दावा किया कि उत्तर सही होने के बावजूद अंक कम दिए गए या कुछ सवालों का मूल्यांकन ही नहीं हुआ।
हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन इन घटनाओं ने बहस को और तेज कर दिया है।
ऑन-स्क्रीन मार्किंग क्या है?
CBSE ने कॉपियों की जांच के लिए OSM यानी ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रणाली लागू की थी। इस प्रक्रिया में उत्तर पुस्तिकाओं को स्कैन कर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर परीक्षकों के पास भेजा जाता है। बोर्ड का दावा है कि इससे कॉपियों के खोने, गड़बड़ी और पक्षपात जैसी समस्याएं कम होती हैं।
लेकिन शिक्षाविदों का एक वर्ग मानता है कि लंबे समय तक स्क्रीन पर कॉपियां जांचने से परीक्षक जल्दी थक सकते हैं। इससे मूल्यांकन की गुणवत्ता प्रभावित होने की आशंका रहती है। वहीं कुछ जानकारों ने यह भी कहा कि डिजिटल जांच में “उत्तर की प्रस्तुति” को समझना कई बार कठिन हो जाता है।
फिलहाल CBSE की ओर से दोबारा परीक्षा कराने जैसी कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। बोर्ड ने केवल यह कहा है कि छात्रों को निर्धारित प्रक्रिया के तहत अपनी कॉपियां देखने और पुनर्मूल्यांकन का पूरा अधिकार है।
हालांकि शिक्षा जगत में इस बात की चर्चा जरूर शुरू हो गई है कि यदि बड़ी संख्या में मूल्यांकन संबंधी त्रुटियां सामने आती हैं, तो बोर्ड पर अतिरिक्त दबाव बढ़ सकता है। कुछ छात्र संगठनों और अभिभावक समूहों ने स्वतंत्र ऑडिट की मांग भी उठानी शुरू कर दी है।
छात्रों पर मानसिक दबाव भी बढ़ा
बोर्ड परीक्षा केवल अंक नहीं बल्कि छात्रों के भविष्य, कॉलेज प्रवेश और करियर से जुड़ी होती है। ऐसे में यदि छात्रों को लगता है कि उनके साथ निष्पक्ष मूल्यांकन नहीं हुआ, तो इसका सीधा असर उनके मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है।
वहीं मौजूदा समय में रिजल्ट के बाद बढ़ती चिंता, तनाव और आत्मविश्वास में कमी जैसे मामले सामने आ रहे हैं। अभिभावकों में भी असमंजस की स्थिति है, क्योंकि उन्हें समझ नहीं आ रहा कि गलती छात्र की तैयारी में है या मूल्यांकन प्रक्रिया में।
कहीं बड़ा संकेत तो नहीं
यह मामला केवल एक बोर्ड परीक्षा तक सीमित नहीं है। यह पूरे देश की परीक्षा प्रणाली के लिए चेतावनी है। डिजिटल तकनीक का उपयोग जरूरी है, लेकिन उसके साथ पारदर्शिता और जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।
अब सभी की नजर CBSE की अगली कार्रवाई पर है। यदि बोर्ड छात्रों की शिकायतों का संतोषजनक समाधान नहीं कर पाया, तो भविष्य में परीक्षा प्रणाली पर भरोसा और कमजोर हो सकता है। वहीं यदि बोर्ड पारदर्शी तरीके से समीक्षा करता है, तो यह शिक्षा व्यवस्था में सुधार का अवसर भी बन सकता है।