भाजपा के राष्ट्रीय महासचिवों में अरुण सिंह और राधामोहन सिह राज्यसभा सदस्य हैं। वहीं विनोद तावडे पहले ही राज्यसभा पहुंच चुके हैं और तरुण चुघ को भी राज्यसभा भेजने की घोषणा हो चुकी है। ऐसे में सुनील बंसल का नाम सूची में न होना राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान आकर्षित कर रहा है।
पार्टी सूत्रों और राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि भाजपा नेतृत्व सुनील बंसल के लिए संगठन में और बड़ी भूमिका तय कर सकता है। माना जा रहा है कि उन्हें भविष्य में राष्ट्रीय सह संगठन महामंत्री अथवा सीधे राष्ट्रीय संगठन महामंत्री जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है।
भाजपा संगठन में राष्ट्रीय संगठन महामंत्री का पद अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है। यह पद संगठन और विचारधारा के बीच समन्वय का प्रमुख केंद्र होता है तथा परंपरागत रूप से इस पद पर RSS से जुड़े प्रचारकों की नियुक्ति होती रही है। वर्तमान में यह जिम्मेदारी B. L. Santosh के पास है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि विभिन्न राज्यों में संगठन विस्तार और चुनावी रणनीति में सुनील बंसल की भूमिका को देखते हुए पार्टी उन्हें भविष्य के नेतृत्व ढांचे में और महत्वपूर्ण स्थान दे सकती है। हालांकि इस संबंध में भाजपा या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की ओर से कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया गया है।
फिलहाल यह स्पष्ट है कि राज्यसभा की दौड़ से बाहर रहना सुनील बंसल के राजनीतिक महत्व में कमी का संकेत नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे संगठन में संभावित बड़ी जिम्मेदारी की तैयारी के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले वर्षों में भाजपा के संगठनात्मक ढांचे में होने वाले बदलाव इस चर्चा को नई दिशा दे सकते हैं।