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गर्म रातें, कमजोर मानसून और जल संकट के त्रिकोण पर खड़ा भारत

भारत में मानसून केवल एक मौसम नहीं है, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था, कृषि, जल संसाधनों, खाद्य सुरक्षा और करोड़ों लोगों के जीवन का आधार है। भारतीय किसान मानसून का इंतजार केवल बारिश के लिए नहीं करते, बल्कि अपनी पूरी आजीविका के लिए करते हैं। यही कारण है कि जब भारतीय मौसम विभाग (IMD) मानसून […]

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Gauravshali Bharat News
  • June 21, 2026 1:17 pm IST, Published 1 hour ago

भारत में मानसून केवल एक मौसम नहीं है, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था, कृषि, जल संसाधनों, खाद्य सुरक्षा और करोड़ों लोगों के जीवन का आधार है। भारतीय किसान मानसून का इंतजार केवल बारिश के लिए नहीं करते, बल्कि अपनी पूरी आजीविका के लिए करते हैं। यही कारण है कि जब भारतीय मौसम विभाग (IMD) मानसून के सामान्य से कमजोर रहने की आशंका जताता है, तो उसका प्रभाव केवल मौसम विभाग के आंकड़ों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह पूरे देश की आर्थिक और सामाजिक चिंताओं का विषय बन जाता है।

वर्ष 2026 के मानसून को लेकर जारी ताजा अनुमानों ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या भारत उस जलवायु युग में प्रवेश कर चुका है जहां मौसम की पुरानी धारणाएं और पारंपरिक अनुभव तेजी से अप्रासंगिक होते जा रहे हैं। पहले जहां मानसून के दौरान लगभग 92 प्रतिशत वर्षा का अनुमान व्यक्त किया गया था, वहीं बाद में इसे घटाकर 90 प्रतिशत कर दिया गया। पहली नजर में यह अंतर छोटा लग सकता है, लेकिन भारतीय कृषि, जो आज भी बड़ी मात्रा में वर्षा पर निर्भर है, उसके लिए यह अंतर अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इस बार मानसून की चिंता केवल कम बारिश तक सीमित नहीं है। इसके पीछे एल नीनो, बढ़ता वैश्विक तापमान, समुद्री सतह के तापमान में वृद्धि,हिमालयी पारिस्थितिकी में बदलाव, शहरीकरण और जल संसाधनों के अनियंत्रित दोहन जैसे अनेक कारक एक साथ काम कर रहे हैं। यही कारण है कि आज जलवायु परिवर्तन का संकट केवल वैज्ञानिक बहस का विषय नहीं रह गया है, बल्कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता का प्रश्न बन चुका है।

एल नीनो: प्रशांत महासागर से भारत तक संकट की लहर

भारत के मानसून पर सबसे अधिक प्रभाव डालने वाली वैश्विक मौसमी घटनाओं में एल नीनो प्रमुख है। यह घटना तब उत्पन्न होती है जब पूर्वी और मध्य प्रशांत महासागर का पानी सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। समुद्र की सतह का यह अतिरिक्त तापमान वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण को प्रभावित करता है और दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में मौसम के पैटर्न बदल जाते हैं।

भारत में एल नीनो का इतिहास काफी पुराना है। 1877, 1899, 1918, 1972, 1982, 1987, 2002, 2009, 2015 और 2023 जैसे कई वर्ष एल नीनो से प्रभावित रहे हैं। इनमें से अनेक वर्षों में भारत ने गंभीर सूखे, खाद्यान्न संकट और आर्थिक चुनौतियों का सामना किया। 2002 का सूखा भारतीय कृषि इतिहास की बड़ी घटनाओं में गिना जाता है। 2009 में भी एल नीनो ने मानसून को कमजोर किया था, जिससे कई राज्यों में फसल उत्पादन प्रभावित हुआ।

लेकिन आज की स्थिति पहले से अलग है। तब एल नीनो एक प्राकृतिक मौसमी चक्र था, जबकि अब वह मानव-जनित जलवायु परिवर्तन के साथ मिलकर और अधिक खतरनाक रूप धारण कर रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि जैसे-जैसे पृथ्वी गर्म हो रही है, एल नीनो घटनाओं की तीव्रता और उनके प्रभाव बढ़ते जा रहे हैं।

बदल रहा है मानसून का चरित्र

भारत में सबसे बड़ी चिंता यह नहीं है कि बारिश कम हो रही है, बल्कि यह है कि बारिश का स्वरूप बदल रहा है। पहले मानसून अपेक्षाकृत नियमित और संतुलित होता था। वर्षा कई सप्ताहों और महीनों में फैली रहती थी, जिससे मिट्टी में नमी बनी रहती थी और जलाशयों को भरने का समय मिलता था।

अब स्थिति अलग है। कई क्षेत्रों में पूरे महीने की बारिश कुछ घंटों या कुछ दिनों में हो जाती है। इसके बाद लंबे समय तक सूखे जैसी स्थिति बनी रहती है। परिणामस्वरूप बाढ़ और सूखा दोनों एक साथ दिखाई देते हैं।

हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, असम और केरल में पिछले कुछ वर्षों के दौरान हुई अतिवृष्टि और विनाशकारी बाढ़ इसका उदाहरण हैं। दूसरी ओर राजस्थान, बुंदेलखंड, मराठवाड़ा और कर्नाटक के कई क्षेत्र जल संकट से जूझते रहते हैं।

इस परिवर्तन का अर्थ यह है कि केवल कुल वर्षा का आंकड़ा पर्याप्त नहीं है। वर्षा कब, कितनी देर और कितनी तीव्रता से होती है, यह अधिक महत्वपूर्ण होता जा रहा है।

बढ़ती गर्मी और गर्म रातों का नया संकट

जलवायु परिवर्तन पर चर्चा के दौरान अक्सर दिन के तापमान पर ध्यान दिया जाता है, लेकिन वैज्ञानिक अब “गर्म रातों” को कहीं अधिक गंभीर खतरा मान रहे हैं।

भारत में पिछले चार दशकों के जलवायु आंकड़ों से पता चलता है कि अत्यधिक गर्म रातों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। दिल्ली, लखनऊ, पटना, जयपुर, अहमदाबाद, नागपुर और हैदराबाद जैसे शहरों में रात का तापमान पहले की तुलना में काफी अधिक रहने लगा है।

दिन की गर्मी के बाद रात शरीर को आराम और पुनर्स्थापन का अवसर देती है। लेकिन जब रातें भी गर्म बनी रहती हैं, तो शरीर लगातार तनाव में रहता है। इससे हृदय रोग, श्वसन रोग, मानसिक तनाव, अनिद्रा और मृत्यु दर तक बढ़ सकती है।

वैज्ञानिक अनुमानों के अनुसार यदि कार्बन उत्सर्जन वर्तमान गति से जारी रहा, तो 2050 तक दिल्ली में अत्यधिक गर्म रातों की संख्या तीन गुना तक बढ़ सकती है। दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद और पुणे जैसे महानगर “अर्बन हीट आइलैंड” प्रभाव का सामना कर रहे हैं।

कंक्रीट, डामर, ऊंची इमारतें और हरित क्षेत्रों की कमी दिन की गर्मी को अवशोषित कर रात भर वातावरण में छोड़ती हैं। परिणामस्वरूप शहर आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में कई डिग्री अधिक गर्म हो जाते हैं। दिल्ली में यमुना का सिकुड़ता प्रवाह, बेंगलुरु में झीलों का गायब होना, चेन्नई में जलाशयों का संकट और मुंबई में तटीय पारिस्थितिकी का क्षरण इस व्यापक पर्यावरणीय असंतुलन की अभिव्यक्तियां हैं।

पीने का पानी का सबसे बड़ा संघर्ष

संयुक्त राष्ट्र लगातार चेतावनी दे रहा है कि भविष्य के संघर्ष तेल से अधिक पानी को लेकर हो सकते हैं। भारत विश्व की लगभग 18 प्रतिशत आबादी का घर है, लेकिन उसके पास विश्व के केवल 4 प्रतिशत मीठे जल संसाधन हैं। बढ़ती आबादी, शहरीकरण और औद्योगिकीकरण ने जल पर दबाव कई गुना बढ़ा दिया है।

दिल्ली हर वर्ष गर्मियों में पानी के संकट का सामना करती है। यमुना नदी प्रदूषण और अत्यधिक दोहन से जूझ रही है। भूजल स्तर लगातार नीचे जा रहा है।

बेंगलुरु, जिसे कभी “झीलों का शहर” कहा जाता था, अब हजारों टैंकरों पर निर्भर हो गया है। अनेक झीलें अतिक्रमण और प्रदूषण की भेंट चढ़ चुकी हैं।

चेन्नई 2019 में लगभग “डे ज़ीरो” की स्थिति तक पहुंच गया था, जब शहर के प्रमुख जलाशय लगभग सूख गए थे। कुछ वर्षों बाद वही शहर विनाशकारी बाढ़ से जूझता दिखाई दिया। यह विरोधाभास बताता है कि जल संकट केवल पानी की कमी नहीं, बल्कि जल प्रबंधन की विफलता भी है।

वही पर दुनिया के सर्वाधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में गिने जाने वाले चेरापूंजी और मासिनराम का उदाहरण और भी चिंताजनक है। जहां कभी रिकॉर्ड वर्षा होती थी, वहीं अब कई महीनों तक पेयजल की कमी देखने को मिलती है। कारण यह है कि तीव्र वर्षा का अधिकांश पानी तेजी से बहकर निकल जाता है। जल संरक्षण संरचनाओं की कमी के कारण वर्षा का लाभ पूरे वर्ष नहीं मिल पाता। यह तथ्य बताता है कि केवल अधिक वर्षा होना जल सुरक्षा की गारंटी नहीं है।

हिमालय का संकट और भारत का भविष्य

हिमालय को एशिया का जल टावर कहा जाता है। गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु जैसी नदियों का जीवन हिमालयी हिमनदों पर निर्भर है। लेकिन वैज्ञानिक रिपोर्टें संकेत देती हैं कि हिमालयी ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं। प्रारंभिक वर्षों में इससे बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है, लेकिन लंबे समय में नदियों के जल प्रवाह पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। हिमालय में बढ़ते भूस्खलन, बादल फटना और ग्लेशियल झीलों का विस्तार भविष्य के बड़े संकटों की चेतावनी हैं।

विकसित देशों की अनकही कहानी

आज जो जलवायु संकट दिखाई दे रहा है, उसके लिए सबसे अधिक जिम्मेदारी विकसित देशों की है। औद्योगिक क्रांति के बाद अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस और अन्य पश्चिमी देशों ने कोयला, तेल और गैस का बड़े पैमाने पर उपयोग किया। वैश्विक कार्बन उत्सर्जन का अधिकांश हिस्सा इन्हीं देशों से आया। लेकिन आज जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक प्रभाव भारत, बांग्लादेश, नेपाल, अफ्रीका और छोटे द्वीपीय देशों पर पड़ रहा है। यही कारण है कि विकासशील देश “जलवायु न्याय” की मांग कर रहे हैं, अर्थात जिन्होंने प्रदूषण किया है, उन्हें समाधान की लागत में अधिक योगदान देना चाहिए।

ईरान-अमेरिका तनाव और खाद्य सुरक्षा

जलवायु संकट के साथ भू-राजनीतिक संकट भी जुड़ गया है। पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव वैश्विक ऊर्जा और उर्वरक बाजार को प्रभावित कर सकता है। भारत उर्वरकों का बड़ा आयातक है। यदि ईरान-अमेरिका तनाव या क्षेत्रीय संघर्ष बढ़ता है, तो उर्वरकों और ऊर्जा की कीमतों में वृद्धि हो सकती है। कमजोर मानसून, महंगे उर्वरक और बढ़ती गर्मी का संयुक्त प्रभाव कृषि उत्पादन को प्रभावित कर सकता है। इससे खाद्य मुद्रास्फीति और आर्थिक दबाव बढ़ने की आशंका है।

समाधान क्या है?

भारत के सामने जलवायु परिवर्तन, जल संकट और अनिश्चित मानसून जैसी चुनौतियाँ निश्चित रूप से गंभीर हैं, लेकिन इनके समाधान के लिए अवसरों की भी कमी नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जलवायु परिवर्तन को केवल पर्यावरण मंत्रालय का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास नीति का केंद्रीय विषय बनाना होगा और आवश्यकता इस बात की है कि जल प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षण को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जाए। वर्षा जल संचयन को केवल सलाह तक सीमित न रखकर अनिवार्य व्यवस्था के रूप में लागू करना होगा, ताकि बारिश के पानी का अधिकतम उपयोग हो सके। इसके साथ ही भूजल पुनर्भरण को राष्ट्रीय मिशन का स्वरूप देकर तेजी से घटते जलस्तर को नियंत्रित करने की दिशा में ठोस प्रयास करने होंगे।

देशभर में तालाबों, झीलों, बावड़ियों और पारंपरिक जल संरचनाओं के पुनर्जीवन पर विशेष ध्यान देना होगा, क्योंकि यही जल संरक्षण की हमारी ऐतिहासिक और प्रभावी विरासत रही है। तेजी से फैलते शहरीकरण के बीच शहरों में हरित क्षेत्रों का विस्तार भी आवश्यक है, जिससे तापमान नियंत्रण और पर्यावरण संतुलन बनाए रखा जा सके। कृषि क्षेत्र में जलवायु अनुकूल खेती, कम पानी वाली फसलें और आधुनिक सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा देना समय की मांग है। साथ ही जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने के लिए सौर और पवन ऊर्जा के विस्तार को नई गति देनी होगी।

स्थानीय स्तर पर हीट एक्शन प्लान लागू कर लोगों को लू और बढ़ती गर्मी से बचाने की प्रभावी व्यवस्था करनी होगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जलवायु परिवर्तन को केवल पर्यावरण का विषय न मानकर विकास, अर्थव्यवस्था, कृषि, स्वास्थ्य और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी केंद्रीय नीति के रूप में देखा जाए। तभी भारत भविष्य की चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना कर सकेगा।

आज प्रश्न केवल इतना नहीं है कि इस वर्ष मानसून कितना कमजोर रहेगा। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या भारत बदलती जलवायु के इस नए युग के लिए तैयार है? यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दशकों में पानी, भोजन, ऊर्जा और पर्यावरण से जुड़े संकट विकास की पूरी अवधारणा को चुनौती दे सकते हैं। जलवायु परिवर्तन भविष्य की नहीं, वर्तमान की लड़ाई है और यह लड़ाई अब हमारे खेतों, शहरों, नदियों और घरों तक पहुंच चुकी है।

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